कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४४४ ) बीजक कबीरदास ।
रामकृष्ण जे हैं तिनकी आशा छोड़िकै पढ़ि गुणिकै किरतिमकहे अपनी बनाई
मूर्त्ति अथवा किरतम माया तिनको दास कहावै हैं ॥ ११ ॥
कर्म करहिं कर्महिको धावैं । जो पूछैत्याहि कर्म हढ़ावैं ॥१२॥
निःकर्मीकै निंदा करहीं । कर्म करै ताही चित धरहीं ॥१३॥
अस भक्ती भगवतकी लावैं।हिरणाकुशको पंथ चलावैं ॥१४॥
कर्म नाना प्रकारके करै हैं औ कर्मफल जो स्वर्गादिकनको भोग ताहीको
धावैं हैं औ जो कोई मुक्तिहूकी बात पूछै है ताको कर्मही हढ़ावै हैं ॥ १२ ॥
निःकर्मी जे साधु हैं तिनकी तौ निन्दा करै हैं औ कोई कर्मकरै है ताको सत्कार
करै हैं ॥ १३ ॥ सो या रीतिते भगवत्की भक्ति करै हैं या कहै हैं
कि ईश्वर तो अजा गल थनकी नाईं है वाते कौन कामहोय है । औ कोई
हिरणाकुशको पंथ तामसी मत चलावै हैं कहै हैं कि हमहीब्रह्महैं ऐसो दैत्यनको
ज्ञानहै तामें प्रमाण ॥ “ईश्वरोऽहमहंभोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी आढ्यो-
भिजनवानस्मि कोन्योऽस्ति सदृशो मया ॥ १४ ॥
देखहुकुमतिनरकपरगासा।बिनुलखि अंतरकिरतिमदासा १५
सो या कुमतिनको प्रकाशतो देखौ बिनु अन्तरके लखे कि हम कौनके हैं या
बिनाजाने किरतिम जो माया ताके दास है रहे हैं रक्षक को न माने रक्षा कौनकरै १५
जाके पूजै पाप न ऊड़ै । नाम सुमिरितैं भवमें बूड़ै ॥ १६ ॥
पापपुण्यकेहाथहिपासा । मारिजक्तसबकीनविनासा॥१७॥
ये बहनी दोउ बहिनिनछाड़ै।यहगृह जारै वहगृहमाड़ै॥१८॥
औ जैने देवताके पूजै न पापछूटै ना मुक्तिहोइ तेई देवतन को पूजैहैं उन-
हींको नाम सुमिरि सुमिरि संसारमें बूड़े हैं ॥ १६ ॥ औ नाना प्रकारके कर्म
बताइकै पाप पुण्य रूप फांसी डारिकै जगत्को विनाश करिदेत भये ॥ १७ ॥
औ कोई बिप्र जे हैं ते बहनी कहे संसारमें बहनवारी जो विद्या अविद्या माया
पाप पुण्य रूप ताको बहिनिन कहे ढोवनवारो जो बिप्र सो ऊपरते छांड़िकै यह
गृह जारिकै कहे छांड़िकै वहगृह कहे वहांके महन्त भये ध्यान लगायकै बैठे ॥ १८॥