कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(४४६) बीजक कबीरदास ।
औ वादविवाद नानाप्रकारके करैहैं परंतु संसार समुद्रको पारनहीं पावैहैं ॥२६॥
सो हंसजो जीव है सो देहको त्यागिकै न्यारो हैजाइ है ताकी जाति कोई कहै
तो वह कौन बर्णहै ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र ॥ २७ ॥ औ वह आत्मा कि,
श्याम है कि सुपेत है कि लालहै किपियरहै कि अवर्ण है कि वर्ण में है कि गर्म है
कि शीतल है ॥ २८ ॥
हिन्दू तुरुक कि बूढ़ाबारा। नारिपुरुष मिलिकरहु विचारा २९
कहिये काहि कहा नहिं माना। दासकबीर सोई पहिचाना ३०
साखी । वहिआ है वहि जातुहै, करगहि ऐंचहु ठौर ।
समुझाये समुझै नहीं, दे धक्का दुइ और ॥ ३१ ॥
पुनि हिन्दू है कि, तुरुकहै कि बूढ़ा है कि लडिकाहै या नारि पुरुष मि-
लिकै सबजने बिचारकरो ॥ २९ ॥ सो या बात कासों कहौं कोई नहीं मानैहै
सबके रक्षक जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनको दासकबीर कहै हैं कि, मैं
सोई पहिचान्यों है कि उनको अंशजीव है वे स्वामी हैं ॥ ३० ॥ या जीव
औरे २ में लगिकै बहत आयो है औ बहा जाइ है सो करगहि कहे एकबे-
उपदेशकरिके और ऐंचौ हौं कि साहब में लागु समुझावत आयो हैं औ समु-
झावतहौं जो समुझाये न समुझै तो लाचार हैकै दुइ धक्का और महूं दैदेउँ कि
बहा जाय ॥ ३१ ॥
इति विप्रमतीसी सम्पूर्णा ।