कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( ४१० ) बीजक कबीरदास ।
लख चौरासी जीव योनिमें सायर जात वह्यो ।
कहै कबीर सुनौहो संतौ श्वान कि पूंछ गह्यो ॥ ४ ॥
खसम बिन तेलीके बैलभयो ।
बैठत नाहिं साधुकी संगति नाधे जन्म गयो ॥ १ ॥
बहि बहि मरै पचै निज स्वारथ यमके दंड सह्यो ।
धन दारा सुत राज काज हित माथे भार गह्यो ॥ २ ॥
श्री कबीरजी जीवकों उपदेश करै हैं हे जीव ! तेरे मालिक जे रामचन्द्र हैं
तिनहीं बिना तैं तेलीको बैल भयो जे साधु तेरो स्वरूप बताइदेइँ ऐसे साधु-
नकी सङ्गति में कबौं नहीं बैठै तेलीके बैलकी नाईं नाधे नाधे जन्म व्यतीत
भयो जन्मतै मरत रह्यो ॥ १ ॥ जब कांधे जुवां नाधि जायहै तब निज
तेलीके निमित्त ढोइ ढोइ मरै है जो ना रेंगै तौ तेली डंडा मारै है तैसे यह
जीव धन दारा सुत राज काजके हित नाना कर्म करै है इंद्रियसुख लियेँ
बहि बहि कहे नाना कर्मनको भारा ढोइ होइकै पचै है अरु अंतमें यमदंड
मारै हैं सो सहै है याही रीति जन्म जन्म यमदंड सहौ है ॥ २ ॥
खसमहिं छोड़ि विषय रँग माते पापके वीजवयो ।
झूंठ मुक्ति नर आश जिवनकी प्रेतको जूठ खयो ॥३॥
खसम जे साहब तिनको त्यागि विषय रंगमें मात्यों औ पापकों बीज
बोवत भयो अर्थात् जो नारी अपने खसमको छोड़ि और पुरुषमें लगै है तौ
वाको बड़ो पाप होयहै सोतैं खसमको छोड़िकै नाना देवतनकी उपासनामें लगि
जात भयो मातिगयो सो तैं महापाप के बीजबोयो औ नरन को ज्यावनवारी जौं
मुक्तिकी जो हमको उपास्य देवता प्राप्त होयँगे तौ हम जीतै रहेंगे हमारो
जनन मरण न होयगो सो वह मुक्ति झूठी है जौने शरीरते उनके लोकको
जायगो सो तन नाश ह्वै जाइगो जब फेरि सृष्टि समय होइगो तब वाई देवनकें
साथ फिरि आवैगो जनन मरण न छूटैगो सो ऐसी झूठी मुक्तिके वास्तें
शब्द । ( ४११ )
तें प्रेतनको जूठ खाय है कहे भैरव भूत आदिकन के बलिदान खाय है उनके
दिये तपौना शराब पियै है ॥ ३ ॥
लख चौरासी जीव योनिमें सायर जात वह्यो ।
कहै कबीर सुनौहो संतौ इवान कि पूंछ गह्यो ॥ ४ ॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि हे संतो! जीवौ सुनो तुम परम पुरुष पर जे श्रीरामचन्द्र
हैं ते तुम्हारे रक्षक संसार सागरते पार कै देनवारे जहाज तिनको छोडि श्वान
जे हैं ई सब क्षुद्रदेवता तिनकी पूंछ गहे चौरासी लक्ष योनि समुद्र संसारमें
बहो जाय है सो श्वान की पूंछ गहेते कैसे संसार समुद्रते पार जाउगे ॥ ४ ॥
इति एकसै सात शब्द समाप्त ।
अथ एकसै आठ शब्द ॥ १०८ ॥
अब हमभयलवहिरजलमीना।पुरुवजन्मतपकामदकीना१
तवमैं अच्छलो मनबैरागी।तजलो कुटुम्ब राम रटलागी॥२॥
तजलो काशी भै मतिभोरी।प्राणनाथ कहु का गति मोरी ३
हम चलिगैल तुम्हारे शरणा।कतहुं न देखो हरिको चरणा ४
हमहिं कु सेवक तुमहि अयाना।दुइ महँदोषकाहिभगवाना५
हम चलिगैल तुम्हारे पासा।दास कबिर भल कैलनिरासा ६
श्री कबीरजी कहैं हैं कि, जब मैं साहबके पास गयो तब यह बिनती
कियो कि तबतो संसार के जलकें मीनरहे अब जबते हम संसारके बहिरैं
तिहारे प्रेमजलके मीनभये प्रथम हम पूर्व जन्ममें पंचांगोपासना तपस्या बहुत
करी पुनि जब जन्मलियो तब हम को पूर्वजन्म की सुधि बनीरही वह तप-
स्याको मद कहे अहंकार हमको बहुत रहै सो वही तपस्याके प्रभावते ॥ १ ॥
तब हमको अच्छो मनमें वैराग्य रहै रघुनाथजीमें भक्ति भई तब कुटुम्बकों
छोड़िकै राम राम रट लगावत भयो ॥ २ ॥ तब प्राणनाथ मैं काशी छोड़ि-
दियो औ मेरी मति भोरी भई कहे पूर्वजन्म के तपके मदते निर्गुणरस
( ४१२ ) बीजक कबीरदास ।
रूपा भक्ति मोकों न होत भई केवल ज्ञानै करिकै रामनामकी रटनि लगाइकै
बिचरत भयों कि, मिलिही जायँगे तब हे प्राणनाथ! मेरी कहा गति होत भई
सों कहौहौं ॥ ३ ॥ हम तुम्हारे शरण तो चलिगये कहे तुम्हारे नाममें रट
लगावत भयो पै तुम्हारे चरणन को न देखत भयो अर्थात् दर्शन न पायौं
॥ ४ ॥ सो हे भगवन्! षट् ऐश्वर्य संपन्न धौं हमहीं कुसेवक रहे जो तिहारों
दर्शन न पायो धौं तुम्हीं अयान रहे हमको न जानत रहे जो हमको नहीं
मिले दुइमें काको दोष है ॥ ५ ॥ अब दास कबीर जो मैंहों ताको भली
भांतिते जब निराश करि दियो कि, कौनेउ भांतिकी जब आश न रहिगई न
ज्ञान करिकै न योग करिकै न भक्ति करिकै केवल सुधारसरूपा निर्गुणा
भक्ति जब मोको दियों तब हम तुम्हारे पास चलि आये याते कबीरजी या
देखायो कि, जब सब बातते निराश है जाय हैं तब साहबके पास जाइहैं॥६॥
इति एकसै आठ शब्द समाप्त ।
अथ एकसै नव शब्द ॥ १०९ ॥
लोग बोलैं दुरिगये कबीरा।या मत कोइ कोई जानैं धीर॥१॥
दशरथ सुत तिहुं लोकहि जाना। राम नामको मर्म आना २
जेहि जिय जानि परा जस लेखा।रजु को कहै उरग जोपेखा३
यद्यपि फल उत्तमगुण जाना।हरीहत्यागिमनमुक्तिनमाना४
हरि अधार जस मीनहिं नीरा।औरयतनकछुकहहिंकबीरा५
लोग बोलैं दुरि गये कबीरा । या मत कोइ कोई जानैं धीरा १
श्री कबीरजी कहै हैं कि, सब लोग बोलै हैं कि, कबीर बहुत दूरि गये
बहुत पहुंचे हैं सो या मत कोई जे धीरे धीरे साधनमें कियनमें समुझनमें
अभ्यास करै हैं सो जानै हैं कौन मत सो आगे कहै हैं ॥ १ ॥
दशरथ सुत तिहुं लोकहि जाना।राम नामको मर्म आना२॥
शब्द । (४१३)
सो दशरथसुतको तौ तीनौलोक जानैहैं पै रामनामको मर्म कोउ कोउ जानैहैं
अर्थात् कबहूं दशरथ सुत कबहूं नारायण कबहूं व्यापक ब्रह्मही अवतार लेइ
हैं नित्य साकेत विहारी परम पुरुष पर जे श्रीरामचन्द्रहैं जिनके नामते ब्रह्म ईश्वर
वेद शास्त्र सब निकसै हैं तौने रामनामको तौ मर्म आनहै ॥ २ ॥
जेहि जिय जानि परा जस लेख्वा। रजुको कहै उरगको पेखा ३
यद्यपि फलउत्तमगुणजाना। हरिहित्यागिमनमुक्ति न माना४
जाको यह रामनाम जैसो जानि पर्यो है सो तैसे लेख्यो है कोई रघुनाथ-
जी को दशरथके पुत्र मानै है कोई नारायण को अवतार मानै है कोई ब्रह्मको
अवतार मानै है तिन्हीं को नाम रामनाम मानैहै सो जैसे रसरीको उरग
कहै हैं बिना समुझे ऐसे रामनाम जो साहबको है सो भ्रम छोड़िकै बिचारै तौ
तौ साहिबको बोध करैहैं ॥ ३ ॥ सो यद्यपि उत्तम गुण जानेके फल होयहै
कि विष्णु लोक प्राप्तभये परन्तु परम पुरुषपर जे श्रीरामचन्द्र तिनके पास
भये बिना हम मुक्ति नहीं मानै हैं ॥ ४ ॥
हरिअधारजसमीनहिंनीरा।औरयतनकछुकहैकबीरा ॥५॥
सो जैसे मीनको आधार अंबुहै बिना जल मीन नहीं रहि सकै है तैसे
श्रीरामचन्द्र सबके आधारहैं सो तिन्हीं को जो आधार मानै तो जैसे मीन
सर्वत्र जलही देखै है द्विभुजरूप श्रीरामचन्द्रको सर्वत्र देखै औ उनहींमें रहै तौ
श्री कबीरजी कहैंहैं कि और यतन सब थोरई है तामें प्रमाण श्री गोसाईंजी कों
॥ दोहा ॥ “ सो अनन्य अस जाहिके, मति न टरै हनुमन्त । मैं सेवक सचरा-
चर, रूप राशि भगवंत ” ॥ १ ॥ तामें प्रमाण कबीरजीको ॥ “ नैनन आगे
ख्याल घनेरा । अरध उरध बिच लगन लगी है क्या संध्या क्या रैनि सबेरा ।
जेहि कारण जग भरमत डोलै सो साहब घट लिया बसेरा । पूरी रह्यो अस-
मान धरणिमें जितदेखो तित साहब मेरा । तसबी एक दियो मेरे साहब कह
कबीर दिलही बिच फेरा ” ॥ ५ ॥
इति एकसै नव शब्द समाप्त ।
( ४१४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ एकसै दश शब्द ॥ ११० ॥
अपनो कर्म न मेटो जाई ।
कर्म लिखा मिटै धौं कैसे जो युग कोटि सिराई॥ १ ॥
गुरु वशिष्ठ मिलि लगन शोधाई सूर्य मंत्र यक दीन्हा।
जो सीता रघुनाथ विआही पल यक संच न कीन्हा २
नारद मुनिको बदन छपायो कीन्हो कपिसों रूपा।
शिशुपालहुके भुजा उपारे आपुन बौद्ध स्वरूपा ॥३ ॥
तीनि लोकके करता कहिये वालि बध्यो बरियाई ।
एक समय ऐसी बनि आई उनहूँ अवसर पाई॥४॥
पार्वती को बांझ न कहिये ईश न कहिय भिखारी ।
कह कबीर करता की वातैं कर्मकि बात निनारी ॥५॥
श्रीमन्नारायण वैकुण्ठते केतन्यो अवतार लियो तेऊ कर्मकी मर्यादा राखिबोई
कियो सो जे साहब उत्पत्ति पालन संहार करै हैं तेतो कर्मकी मर्यादा राखि-
बोई कियो और की कहा गतिहै सो बिना परमपुरुषपर श्रीरामचन्द्रके नामलि-
ये कर्मकीगतिकाहूकी मेटी नहीं मेटि जाइहै श्री रामनामते कर्मकी गति मिटि
जाइहै साहब मेटि देइहै तामें दोउ प्रमाण॥ “राम नाम मणि विषय ब्यालके।
मेटत कठिन कुअंक भालके” ॥१॥ “सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माशुच”इतिगीतायां॥ “सकृदेवप्रपन्नायतवास्मी-
तिच याचते।अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम”॥इति रामायणे॥औ कबीरजी
ऊकौ प्रमाण ॥ “पहिले बुरा कमाइकै, बांधी विषकै मोट । कोटि कर्म मिट
पलकमैं, आवै हरिकी ओट ॥ ” और और पदको अर्थ स्पष्टै है ॥ १–५ ॥
इति एकसै दश शब्द समाप्त ।
शब्द । (४१५)
अथ एकसै ग्यारह शब्द ॥ १११ ॥
है कोई पंडित गुरुज्ञानी उलटि वेदको बूझै ।
पानीमें पावक जरै अंधे आंखी सूझै ॥ १ ॥
गैयातो नाहरको खायो हरिना खायो चीता ।
कागा लगरै फांदिकै बटेरन वाजै जीता ॥ २ ॥
मूसा तो मंजारै खायो स्यारै खायो श्वाना ।
आदिके उपदेश जानै तासु बेसै बाना ॥ ३ ॥
एकै तो दादुर सो खायो पांचौ जे भूवंगा ।
कहै कबीर पुकारिकै हैं दोऊ यक संगा ॥ ४ ॥
हैं कोई गुरु ज्ञानी पंडित उलटि वेदको बूझै ।
पानीमें पावक जरै अंधे आंखी सूझै ॥ १ ॥
ऐसो गुरुज्ञानी पंडित कोई नहीं है जो उलटिकै वेदको अर्थ बूझै अर्थात
गायत्रीते वेद भयो है प्रणवते गायत्री भई है प्रणव राम नामते उत्पन्न भयो है
सो कहैंहैं पानी जो है बानी तामें पावक जरैहै कहे ब्रह्माग्नि बीज रामनामहै सो
सर्वत्र पूर्ण है सो अंधेके आंखीमें कैसे सूझै उलटिकै वेदको बूझै तौ जानै कि
सबको मूल रामनामहै ॥ १ ॥
गैया तो नाहर को खायो हरिना खायो चीता ।
कागा लगरै फांदिकै बटेरन वाज जीता ॥ २ ॥
गैया जो गायत्री तौनेके नाना अर्थ करि कहीं सूर्यमें लगावैंहैं कहीं ब्रह्ममें
लगावैं हैं सोई अर्थ जो गैया सो सांच गायत्रीको तात्पर्यार्थ साहब तिनको ज्ञान
जो नाहर ताको खायलियो औ हरिनाजो अद्वैत ज्ञान कि हरिनहीं है प्रणवको
अर्थकियो कि जीव नहीं है एक ब्रह्मही है सो मैं हौं या जो हरिना सो साहबकों
( ४१६ ) बीजक कबीरदास ।
ज्ञान जो चीता ताको खाय लियो चीता साहबकें ज्ञानकों कहते कह्यो कि
जब साहबको ज्ञान होइहै तब अद्वैत ज्ञान नहीं रहिजाइ है औ काग जो अज्ञान
सो साहबको ज्ञान जो लगर शिकारी पक्षी कागा को खानवारो ताको कागा
खाय लियो औ असत् शास्त्रके अनेक प्रकारके जे अर्थ तेई हैं बटेर ते सब
शास्त्र जे साहबके बतावनवारे तेई हैं बाज ताको जीतलियो अर्थात् तामसी जे हैं
ते तामस शास्त्रको प्रचार करि सत् शास्त्रको लोप करिदियो ॥ २ ॥
मूसातो मंजारै खायो स्यारै खायो श्वाना ।
आदिको उपदेश जानै तासु बेसै बाना ॥ ३ ॥
एकै तो दादुर सो खायो पांचौ जे भूवंगा ।
कहै कबीर पुकारिकै हैं दोऊ एक संगा ॥ ४ ॥
मूसा जो है वितंडाबाद सो साहबको उपदेश जो मंजार ताको खायलियो
औ स्यार जो माया सो जीवके स्वरूप ज्ञानते जो होइहै स्वानुभवानंद सोई
है श्वान ताको खाइ लियो सो कबीरजी कहै हैं जो कोई आदिको उपदेश
जो है रामनाम जानै ताहीको वेष बानाहै और सब पाखंडई है ॥ ३ ॥
एकही दादुर जो मन सो दादुरके खाय लेनवारो पांचभुवंग जे रति नेष्ठा
भाव प्रेम रस ते ताको खाइलियो सोई एक एकके विरोधी रहे तिनको खाइ
लीन्हे सो कबीरजी कहैंहैं जीव साहब एकै संगके हैं आपने स्वरूपको न समु-
झ्यो या न विचार्यो कि मैं साहबको हौं ताते संसारी है गयो है जो साहब
मुख अर्थ विचारतो तौ एकही संग को है ॥ ४ ॥
इति एकसै ग्यारह शब्द समाप्त ।
अथ एकसै बारह शब्द ॥ ११२ ॥
झगरा एक बढ़ो जियजाना।जो निरुवारै सो निरवान ॥१॥
ब्रह्म बड़ा की जहँते आया।वेद बड़ा की जिन उपजाया॥२॥
इहमनबड़ाकीजेहिमनमाना।रामबड़ाकी रामहिं जाना॥३॥
भ्रमिभ्रमिकविरा फिरैउदासा।तीर्थबड़ाकीतीर्थक दास ॥४॥
शब्द । ( ४१७ )
हे जीवौ ! यह झगड़ा बड़ो है ताको बिचार करो जो कोई यह झगड़ा
निरुवारै सोई निर्वाण कहे मुक्त है। सो कहै हैं भला जौन ब्रह्म जीव आपने मनतें
अनुभव करि लियो है सो बड़ा है कि जहांते जीव आयो है लोक प्रकाशते सो
बड़ों है। सो ब्रह्म बड़ा नहीं है। वा लोकःप्रकाश बड़ाहै जहांते जीव आयो है। औ
जौने वेदकी आज्ञाते नाना ईश्वर मानि लियो है सो बड़ा है कि रामनाम
ते वेद उपजाहै सोबड़ाहै अर्थात रामनाम बड़ा है जाते वेद भयो है। औ मन
बड़ा है कि जाको मन आपनेते बड़ा मान्यो है सो बड़ाहै अर्थात् जो मन
बचनके परे है सोई बड़ो है जाको मन मान्यो है। औ श्री रामचन्द्र काहूको उप-
देश करै नहीं आवैं श्री रामचन्द्रके जाननवारे रामको बतायकै जीवनको उप-
देश कै उद्धार कै देइहैं याते रामदास बड़े हैं। औ तीर्थ बड़े कि जे तीर्थकों
बिधि सहित न्हाइहैं ते बड़े अर्थात् जे तीर्थके दास बने हैं ते बड़े हैं
सो हे कायाके बीरौ जीवौ ! भ्रमि भ्रमिं काहे को उदास फिरौ हौ या बात
को बिचारौ ॥ १ ॥ ४ ॥
इति एकसै बारह शब्द समाप्त ।
अथ एकसै तेरह शब्द ॥ ११३ ॥
झूठे जनि पतिआहु हो सुन संत सुजाना ।
घटही में ठगपूरहै मति खोउ अयाना ॥ १ ॥
झूठेका मंडान है धरती असमाना ।
दशौ दिशा जेहि फंद है जिउ घेरे आना ॥ २ ॥
योग यज्ञ जप संयमा तीरथ ब्रत दाना ।
नवधावेद किताब है झूठेका वाना ॥ ३ ॥
काहूको शब्दै फुरै काहूकरमाती ।
मान बड़ाई लैरहै हिंदू तुरुक दुजाती ॥ ४ ॥
२७
( ४१८ ) बीजक कबीरदास ।
वातकथै असमानकी मुद्दति नियरानी ।
बहुत खुदी दिल राखते बूड़े बिन पानी ॥ ५ ॥
कहै कबीर कासों कहों सिगरो जग अंधा ।
सांचेसों भाजै फिरैं झूठे सों बंधा ॥ ६ ॥
हे संत सुजान! जों तुम सुजान होउ तौ वा झूठेसों न पतिआहु मेरी बात
सुनौ वह ठग जो है तिहांरो अनुभव धोखा ब्रह्म सो तेरे घटही में है धोखामें
परि आपनो स्वरूप जो साहबको दास ताको मति खोउ ॥ १ ॥ धरतीमें
कहे नीचेके लोकनमें औ असमानमें कहे ऊपरके लोकन में वही झूठे ब्रह्मका
मंडानहै औ दशौ दिशा जे हैं छः शास्त्र औ चारिवेद तिनमें वहीको
फंदहै वही के फंदते इनको जो है यथार्थ अर्थ सो कोई नहीं जानैहैं जीवके
आनिकै घेरि लियो है अर्थात शास्त्रन वदनमें अर्थ बदलि बदलि वही झूठे
ब्रह्मको उपदेश कैकै गुरुवा लोग भुलाइ दियो है सब में वही धोखही ब्रह्म
देखावैहै ॥ २ ॥ योग यज्ञ जप संयम तीर्थ व्रतदान नवधा सगुणाभक्ति
औ वेदकिताब इनसब में झूठे कहे वही धोखा ब्रह्मका बाना कहे बिरदावली
गुरुवा लोग सबकी मनावै हैं कि, या साधन कीन्हे अंतःकरण शुद्ध होय है तब
ब्रह्म कों प्राप्त होइहैं ॥ ३ ॥ औ काहूको शब्दै फुरै है कहे वेद शास्त्र
किताब कुरान पढ़िकै उनको अर्थ बदलि बदलिकै शास्त्रार्थ करिकै औरकों
हरावै है उनहींको हिन्दू तुरुके दूनों जाति मान बड़ाई करैहैं औ वोई मान
बड़ाई लैरहै हैं । पंडित मोलबीलोग औ कोई जे बैरागी हैं संन्यासी हैं
फकीर हैं औलियाहैं ते काहूको बेटादियो काहूको जागा दियो कहूं जलमें
हीठि गयो कहूं आकाशाते उड़ि गये कहूं दश पांच वर्ष कोठरी चुनाइकै आये
कहूं भूत भविष्य वर्तमान जानिलियो इत्यादिक नाना प्रकारकी करामात देखा-
इकै हिन्दू तुरुक दूनों दीनन सों मान बड़ाई लैके रहै हैं ॥ ४ ॥
शब्द । (४१९)
औ परम पुरुष श्री रामचन्द्र अल्लाह साकेत जाहूतकें रहनवारे तिनको तौ
जानैं नहीं हैं आसमान जोहै शून्य धोखा ब्रह्म तौने की बातैं कथैं हैं कि हमहीं
ब्रह्महैं औ हमहीं बेचून बेचिगूग बेसुवा बेनिमून हैं औ उनके जिन्दगीकी मुद्दति
नियरेही है केतनौ यहै कथत कथत मरिगये केतौ मरेंगे केतौ मरे जायहे यह नहीं
बिचौरहैं कि जो खुदा होते ब्रह्म होते तौ मरि कैसे जाते सो बहुत खुदी दिलमें
रखते हैं कि खुदखाविन्द हमहीं हैं औ जो बहुत खुबी पाठ होइ तौ यह अर्थ कि
हमहीं सबते खूब कहे अच्छे हैं पै बिना पानी झूरहीमें बूडि गये अर्थात् मरिही गये
वहजो ब्रह्म खुदाको ज्ञान कियो कि हमहीं हैं सो ज्ञान झूरही ठहरयो वामें
कछु रस न ठहरयो मरतमें वह रक्षा तनकऊ न कियो जौं कहो जे साहब
खुदाको जानैंहैं ते कब जिये हैं तेऊतो मरिही जायहैं तो तुमही रामायणमें सुनै
होउगे कि जे ते भर प्रजा हैं जे ते भर भालु बांदरहैं तिनकों श्रीरामचन्द्र
सदेह आपने धामको लैगये औ श्री हनुमान्जीको बिभीषणको छोड़िगये ते
अबलों बने हैं औ कागभुशुण्ड नारद अगस्त्य बशिष्ठजी रामोपासक हैं ते अब-
लो बने हैं जो कहो अब केतो राम भक्तको मरत देखै हैं तौ जे साधनमें हैं
औ परमपुरुष श्री रामचन्द्रको नीकी भांति नहीं जानै हैं औ श्री रामचन्द्रकी
प्राप्ति नहीं भई ते शरीर छोड़िकै वह लोकको क्रमतें जाइहैं शरीर छोड़िकै फिरि
अवतार लेइहैं पुनि ज्ञान होइ है तब जाइहै औ जे परमपुरुष श्री रामचन्द्रको
अच्छी भांति जानि लियोहै औ तहांको प्राप्त होइ गये हैं तिनको शरीर छोड़ि-
बो ऐसो किं यहां गुप्त ह्वै गये पुनि कहुं प्रगट ह्वैके उपदेश करिकै जीवनकों
तारबो वे साहबको प्राप्तई हैं जब चाहैं हैं तब साहब के रहे हैं जब चाहैं हैं तब
प्रगट ह्वैके जीवनको उपदेश करिकै तारैहैं सो श्री कबीरजी प्रगटई देखाइदियो
कि काशीमें शरीर छोड़्यो मथुरा में उपदेश कियो औ चारिउ युग उपदेश
करतई हैं औ मुसल्माननके अली शरीर छोड़्यो पुनि लौटिकै आयकै संदूकमें
अपनी लाश राखिकै ऊंटमें लादिकै लैगये सो द्वै पहारके बीच ह्वै निकसे जाइ
सो वहींमें अटकाइ दियो सो अबलों वह संदूक अटकी है सो इनको चोला
छांड़िबो यहि भांति कोहै जैसे सांप केचुरि छांड़िदेइहैं ॥ ५ ॥
( ४२० ) बीजक कबीरदास ।
सो कबीरजी कहै हैं कि मैं कासों कहौं सिगरो संसार आंधर ह्वै रह्योहैं
सांच जे परम पुरुष श्री रामचन्द्र सर्वत्र पूर्णहैं तिनसों भागो फिरै है उनको
नहीं देखैहै औ झूठा जो है धोखा ब्रह्म ताही में बँधि रह्योहै औ यथार्थ अर्थमें
चार्यों वेद छहउ शास्त्र तात्पर्य्यकैकै परम पुरुष श्री रामचन्द्रको बर्णन करै हैं
सो मैं आपने सर्व सिद्धांत में स्पष्ट करिकै लिखि दियो है ॥ ६ ॥
इति श्रीमहाराजाधिराज श्रीमहाराजा श्री राजा बहादुर
श्री सीतारामचन्द्र कृपा पात्राधिकारि विश्वनाथ
सिंह जू देव कृत तिलक शब्द समाप्त ।
इति ।
सूचना-मूल ग्रन्थमें ११५ शब्दहैं सो न जाने किस कारणसे महाराजने उसे छोड
दिया है । सो दोनों शब्द प्रस्तावनामें दे दियाहै पाठक वहांसे देख लें ।
अथ चौंतीसी ।
ओंकार ।
ओंकार आदिहि जो जानै।लिखिकै मेटि ताहि फिर मानै॥
वे ओंकार कहै सब कोई।जिनहुँ लखा सो बिरला सोई॥१॥
चौंतीसी ।
कका कमल किरणिमें पावै।शशि विगासित संपुटनहिं आवै॥
तहां कुसुंभ रंग जो पावै । औगह गहकै गगन रहावै ॥ १ ॥
खखा चाहै खोरि मनावै । खसमहिं छोडि दशौ दिशि धावै॥
खसमहिं छोड़ि क्षमा ह्वै रहई।होय अखीन अक्षय पद गहई२
गगा गुरुके वचनै मानै। दूसर शब्द करै नहिं कानै ॥
तहां विहंग कतहूं नहिं जाई। औगह गहकै गगन रहाई॥३॥
घघा घट विनशे घट होई । घटहीमें घट राखु समोई ॥
जो घट घटै घटै फिरि आवै। घटही में फिरि घटै समावै॥४॥
( ४२२ ) बीजक कबीरदास ।
ङङा निरखत निशि दिन जाई।निरखत नैन रहा रटलाई ॥
निमिष एक लौं निरखै पावै । ताहि निमिषमें नैन छिपावै ५॥
चचा चित्र रचो बहु भारी।चित्रहि छोड़ि चेतु चित्र कारी ॥
जिन यह चित्र विचित्र उखेला।चित्र छोड़ि तू चेतु चितेला ६
छछा आहि छत्र पति पासा।छकिकै रहसि मेटि सब आसा॥
मैं तोहीं छिन छिनसमुझाया।खसमछोड़िकसआपबंधाया ७
जजा या तन जीयत जारो। यौवन जारि युक्ति जो पारो ॥
जो कुछ जानिजानि पर जरै । घटहि ज्योति उजियारी करै ८
झझा अरुझि सरुझि कित जाना।हीठत ढूँढ़त जाहि पराना॥
कोटि सुमेरु ढूंढ़ि फिरि आवै।जो गढ़ गढ़ा गढ़हि सो आवै ९
ञञा निरखत नगर सनेहू । करु आपन निरवारु सँदेहू ॥
नाहिं देखी नाहिं आपभजाऊ।जहां नहीं तहँ तन मनलाऊ १०
टटा विकट बात मन माहीं । खोलि कपाट महलमें जाहीं ॥
रहै लटपटे जुटि तेहि माहीं।होहिं अटल ते कतहुं नजाहीं ११
ठठा ठौर दूरि ठग नीरे । नितके निठुर कीन मन धीरे ॥
जेहिठगठगसवलोगसयाना।सो ठगचीन्हिठौरपहिचाना १२
डडा डर कीन्हे डर होई । डरहीमें डर राखु समोई ॥
जो डर डरै डरै फिरि आवै।डरहीमें पुनि डरहि समावै॥ १३॥
ढढा ढूंढतई कत जाना । ढीगर डोलहि जाइ लोभाना ॥
जहां नहीं तहँ सब कछु जानी।जहां नहीतहँले पहिचानी १४
णणा दूरि बसौ रे गाऊं । रे णणा टूटै तेरा नाऊं ॥
मुये यते जिय जाही घना।मुये यतादिक केतिक गना॥ १५॥
चौंतीसी। ( ४२३ )
तता अति त्रियो नहिं जाई। तन त्रिभुवनमें राखु छपाई ॥
जो तन त्रिभुवनमाहँ छपावै। तत्त्वहि मिलि सो तत्त्व जो पावै १६
थथा थाह थहो नहिं जाई । यह थीरे वह थीर रहाई ॥
थोरे थोरे थिरहो भाई। बिन थंभे जस मन्दिर जाई ॥ १७ ॥
ददा देखौ बिनशन हारा । जस देखौ तस करौ विचारा ॥
दशौ द्वारमें तारी लावै। तब दयालको दर्शन पावै ॥१८॥
धधा अर्ध माहँ अँधियारी । जस देखै तस करै विचारी ॥
अधो छोड़ि ऊरध मन लावै। अपा मेटि कै प्रेम बढ़ावै ॥१९॥
नाना वो चौथेमें जाई । रामका गद्दह है खरखाई ॥
नाह छोड़ि किय नरक बसेरा। अजौं मूढ़ चित चेतु सवेरा २०
पपा पाप करै सब कोई । पापके घेरे धर्म नहिं होई ॥
पपा कहै सुनौरे भाई । हमरेसे ये कछू न पाई ॥ २१ ॥
फफा फल लागो बड़ दूरी । चाखै सतगुरु देव न तूरी ॥
फफा कहै सुनौ रे भाई। स्वर्ग पताल कि खबरि न पाई२२
बबा बर वर कर सब कोई।बर वर किये काज नहिं होई ॥
बबा बात कहै अरथाई।फलका मर्म न जानेहु भाई ॥२३॥
भभा भर्म रहा भरि पूरी । भभरेते है नियरे दूरी ॥
भभा कहै सुनौरे भाई । भभरे आवै भभरे जाई ॥ २४ ॥
ममा सेये मर्म न पाई । हमरे ते इन मूल गवाँई ॥
ममा मूल गहल मन माना।मर्मी होहि सो मर्महि जाना॥२५
यया जगत रहा भरि पूरी । जगतहु ते ययाहै दूरी ॥
यया कहै सुनौरे भाई । हमरे सेये जै जै पाई ॥ २६ ॥
( ४२४ ) बीजक कबीरदास ।
ररा रारि रहा अरु झाई । राम कहै दुख दारिद जाई ॥
ररा कहै सुनौरे भाई । सतगुरु पूछि कै सेवहु जाई ॥२७॥
लला तुतेरे बात जनाई । तुतेरे पावै परचै पाई ॥
अपना तुतुर और को कहई । एकै खेत दुनों निरबहई ॥२८॥
ववा वह वह कह सब कोई । वह वह कहे काज नहिं होई ॥
ववा कहै सुनहुरे भाई । स्वर्ग पतालकी खबरि न पाई २९
शशा शरद देखै नहिं कोई । शर शीतलता एकहि होई ॥
शशा कहै सुनौ रे भाई । शून्य समान चला जग जाई॥३०॥
षषा षर षर कह सब कोई । षर षर कहे काज नहिं होई ॥
षषा कहै सुनहुरे भाई । राम नाम लै जाहु पराई ॥ ३१ ॥
ससा सरा रचो बरिआई । सर बेधे सब लोग तवाई ॥
ससाके घर सुन गुन होई । यतनी बात न जानै कोई ३२
हहा होइ होत नहिं जानै । जबहीं होइ तबै मन मानै ॥
है तौ सही लहै सब कोई। जब वा होइ तब या नहिं होई ३३
क्षक्षा क्षण परलै मिटि जाई । क्षेव परे तब को समुझाई ॥
क्षेव परे कोउ अंत न पाया। कह कबीर अगमन गोहराया ३४
उँकार आदिहि जो जानै। लिखिकै मेटि ताहि फिरि मानै॥
वै उँकार कहौ सब कोई। जिनहुँ लखा सो विरला सोई॥१॥
ओंकारको आदि जो रामनाम ताको जो कोई जानै पिंडाण्ड ब्रह्माण्डको
चाहे लिखिकै कहे उत्पत्तिकै मेटै कहे नाशकरै फिरि मानै कहे पालनकरै ।
सो वह ओंकारको तो सबै कोई कहै हैं परन्तु जिन बाको लखाहै सो कोई
बिरलाहै । तांके लखिबेको प्रकारहौं कहौंहौं । अकार लक्ष्मणको स्वरूप उकार
शत्रुघ्नको स्वरूप मकार भरतको स्वरूप अर्द्धमात्रा श्रीरामचन्द्रको स्वरूप
संपूर्ण प्रणव श्री जानकीजीको स्वरूप । यहि रीतिते जो कोई प्रणवको जानै
सो बिरला है ! कौनी रीतिते जपकै त्रिकुटीमें अकार कंठमें उकार हृदय में
मकार नाभिमें अर्द्धमात्रा गैबगुफामें संपूर्ण प्रणव ऐसो एक एक मात्राकों
अर्थ बिचारत घंटानादकी नाईं जप करनवारो बिरला है साहबमुख यह
अर्थ हम दिग्दर्शन करादियो है और बिस्तार ते अर्थ हमारे रहस्य त्रयग्रन्थमें
है और सब जगत्मुखअर्थ है ॥ १ ॥
कका कमल किरणिमैं पावै।शशि बिकसितसंपुटनाहिंआवै॥
तहां कुसुम्भ रंग जो पावै । औगह गहैके गगन रहावै ॥२॥
क कहिये सुखको सो कका कहे सुखको सुख जो साहब तिनको किरणिं
जो अर्द्धमात्रा ताको नाभि कमलमें ध्यान करि जीव जानै । औ शशि जो चंद्र
नाड़ी तौनेको अमृत सींचिकै विकसित कियेरहै संपुटित न होनपावै । औ तहैं
कुसुंभ रङ्ग जो प्रेम ताको पावै तौ अगह जो साहब जे मन वचन करिकै नहीं
गहे जाइँ तिनको गहिकै गगन जो हृदय आकाश तामें राखै । याके आवरण कें
मंत्र औ ध्यानको प्रकार हमारे “शान्तशतक” में लिख्यो है । ककार सुखको कहै
हैं तामें प्रमाण । “कः प्रजापति रुद्दिष्टः को वायुरिति शब्दितः॥कश्चात्मनि सं-
माख्यातः कस्सामान्य .उदाहृतः ॥ १ ॥ कं शिरो जलमाख्यातं कं सुखेऽपि
प्रकीर्त्तितम् ॥ पृथ्वियां कुः समाख्यातः कुः शब्देऽपि प्रकीर्त्तितः ” ॥ २ ॥
खखा चाहै खोरि मनावै । खसमहिं छोड़ि दशहु दिशि धावै॥
खसमहिं छोड़ि क्षमा है रहई।होइ अखीन अक्षयपद गहई ३
खा जो चैतन्याकाश ताहूको चैतन्याकाश अर्थात् ब्रह्महूंको ब्रह्म जो साहब
ताको जो चाहै तौ अपनी खोरि जो चूकसो मनावै कहे बकसावै । कौन चूक ?
१-'क' ब्रह्मा, वायु, आत्मा और साधारणको कहतेहैं ।
'कं' शिर, पानी, और सुखको कहतेहैं । शब्द और भूमिको 'कु' कहतेहैं ।
( ४२६ ) बीजक कबीरदास ।
जौन खसम जे साहब हैं तिनको छोड़िकै जो दशौ दिशामें धावै है कहै
नाना उपासना करै है सो या चूकबकसाबै । औ ख जो चैतन्याकाश सम कहै
सर्वत्र पूर्ण ऐसो जो धोखा ब्रह्म ताको छोड़िकै तैं क्षमा ह्वैरहु ब्रह्मको बाद विवाद
न करु होइ अखीन कहे आपनो स्वरूप जानिकै कि मैं साहबको हौं अक्षय हौं
ब्रह्महूमें लीन भये मेरो जीवत्व नहीं जायहै ऐसो हंस रूप ह्वैकै अक्षय पद जे
साहब तिनको गहु ख कहे आकाशतामें प्रमाण ॥ “खमिन्द्रिये खमाकाशेखः
स्वर्गऽपिमकीर्तितः” ॥ ३ ॥
गगा गुरुके बचनै मानै । दूसर शब्द करै नहिं कानै ।
तहां विहङ्गम कतहुं न जाई।औगहि गहिकै गगन रहाई॥४॥
ग जो है साहबको गीत ताको गा कहे ते ग्वैयाहै । सो हेजीव ! तैं गुरु जे
साहब हैं तिनके वचन मानु कौनबचन ? कि ॥ “अजहूं लेउ छँड़ाइ कालसे जो
घट सुरति सँभारै ” ॥ और दूसर शब्द न कान करु जो घट सुरति सँभारैगौ
तौ बिहङ्गम जो जीवात्मा सो कतौं न जाइगो । औगह कहे अवगाह जे साहब
हैं तिनको गहिकै गगन जो हृदयाकाश ताही में रहैगो । अर्थात् जो साहबको
गुण गान करैगो तौ तेरो मन जो सर्वत्र डोलै है सो कतौं न जाइगो तामें
प्रमाण॥“गो गणेशः समुद्दिष्टो गंधर्वो गः प्रकीर्त्तितः। गं गीतं गाचगाथा स्याद्गौ-
श्चधेनुस्सरस्वती ” ॥ ४ ॥
घघा घट बिनशे घट होई । घटहीमें घट राखु समोई ॥
जो घट घटै घटै फिरि आवै । घटहीमें फिरि घटै समावै॥५॥
घ जो घट है ताको घा जो नाश है सो करन वारो अर्थात् जनन मरण वारे
हे घघा जीव ! घट जे पांचौ शरीर ताके बिनशे घट जो है हंस शरीर सो होइहै ?
कैसे होइहै ताको साधन कहै हैं “घटही में घट राखु समोई ” कहे स्थूल
सूक्ष्ममें, सूक्ष्म कारणमें,कारण महाकारण कैवल्यमें, कैवल्य हंसस्वरूपमें, समोइ
राखुःअर्थात् एक एक में लीन कै देइ । जो यही रीतिते घट जे पांचौ शरीर
तिनको घटै घटै फिरि आवै तौ घट जो है हृदयाकाश ताहीमें घट जो हंस शरीर सो
१-ख । इन्द्रिय, आकाश, स्वर्गको कहते हैं ।
२-ग गणेश, गन्धर्व, ' गं ' गीत, ' ग ' गाथा, ' गौ ' गाय और सरस्वतीको
कहते हैं ।
चौंतीसी । ( ४२७ )
समावै अर्थात् जीतै । यहीशरीर में हंसस्वरूप पायजाय । घ घातको कहै हैं ॥
“घोधटेऽपिसमाख्यातःकिंकिणीवा प्रकीर्त्तितः । घा हनूमति विख्यातोघृंमूर्द्धनि-
प्रकीर्त्तितः ” ॥ ५ ॥
ङङन निरखत निशिदिन जाई।निरखत नय न रहत रतनाई
निमिष एक लौं निरखै पावै। ताहि निमिषमें नयन छिपावै६
ङ कहै भयानक ङा कहै बिषय बांछा । सो ङङा भयानक बिषय बांछा निर-
खत कहै बिचारत तोको दिनौ राति जाइहै वाहीके निरखत में कहै बिचारतमें नय
जो नीति सो नहीं रहत रतनाई जो अनुराग बिषयमें सोई रहि जाइहै।कैसीहै वह बि-
षय कि एक निमिष लौं निरखै पावै कहै वामें लगे तौ तौनैन .निमिषमें भोगोपरान्त
नयन छिपावैहै नहीं नीक लागैहै । अर्थात् रूपको देख्यो फिरिनयनमें नीर भारि
आवैहै नहीं नीक लागैहै । सुगन्ध बहुत सूंघ्यो उपरांत नाक बरि उठैहै, अच्छो
भोजन कियो तृप्त भये पर बिरस परि जाइहै, गान बहुत सुन्यो फिरि बक
वाधि लगै है । स्पर्श बहुत सुन्दर स्त्री कियो फिरि वीर्य पात भये, नहीं
नीकालागै है, गरम लागन लगै है । सो ये सब तृप्तिके उपरांत जो निमिष है
तौने निमिष नहीं नीक लगै है । ङ विषय बांछाको कहैंहैं तामेंप्रमाण ॥
“ङकारो भैरवः ख्यातो ङो ध्वनावपि कीर्त्तितः ॥ ङकारस्मरणे प्रोक्तो ङकारो
बिषयस्पृहा” ॥ ६ ॥
च चा चित्र रचो बहु भारी। चित्र छोड़ि तू चेतु चित्र कारी ॥
जिन यह चित्र विचित्र उखेला।चित्र छोड़ तू चेतु चितेला ७
च कहै मन काहेते कि, मनको देवता चंद्रमा यांते मनको कही । औ
दूसर चा चोरको कही सो तेरोमन जो चोर सो तेरे स्वरूपको चोराय लीन्हों
साहबको भुलायदीन्हो सो यह जगतरूपचित्र जो रच्योहैं चित्रविचित्र सो तू
१-‘घ’ घड़ा अथवा घुँघुरू को कहते हैं ‘घा’ हनुमान् और ‘घृ’ शिरको कहते हैं ।
२-‘ङ’ भैरवको किसीकी याद करनेको और भोगकी इच्छाको कहते हैं ‘ङा’
शब्दकरनेको कहते हैं ।
( ४२८ ) बीजक कबीरदास ।
छोड़िदे हे जीव ! चित्रकारी जो मन ताकों चेतकरु वही तेरे स्वस्वरूप को
भुलाय दियोहै च चंद्रमा को चोरको कहैहैं ॥ "चेश्चंद्रश्च समाख्यातास्तस्करे
मास्करेमतः" ॥ ७ ॥
छछा आहि छत्र पति पासा।छकि किन रहै छोड़ि सबआशा।
मैं तोहीं क्षण क्षण समुझाया।खसमछोड़िकसआपुवँधाया ८
छ कहै निर्मल जीव तैं आपने स्वरूपको भूलिकै साहबको भूलिगयो ताते
छाकेह छेदरू ही द्वैगयो तेरे स्वरूपकी क्षयद्वैगई सो तैं तो छत्रपती जे परमपुरुष
श्रीरामचन्द्र तिनको आहि तिनके पास जायकै ई सब नाना देवनकी आशा छोड़िकै
छकिरहु।या बात मैं तोको क्षणक्षण समुझायो परन्तु तुमखसमजे साहबहैं तिनको
छोड़िकै तैं काहेको जगत् में अपनपौ बँधाया।छनिर्मल को औ छेद छ को कहै हैं
तामें प्रमाण॥ "निर्मले छस्समाख्यातस्तरणिश्छः प्रकीर्त्तितः॥ छेदे च छः समा-
ख्यातो विद्वद्भिः शब्दशासने" ॥ ८ ॥
जजा ई तन जियतहि जारो। यौवन जारि युक्ति जो पारो ॥
घटहि ज्योति उजियारी करो।जो कछु जानि जानि पर जरै ९
ज कहिये वेगवंतको औ जा कहिये जघनको सो हे जीव ! वेगवारो जोम-
नहै सोई तेरो जघनहै ताहीते बागत फिरै है अर्थात् जननमरण होतरहैहै । सो
यातनको कहै मन रूप तनको तैं जीतै में कहै यही शरीरको साधनकरके
जा रिदे मरेते न जरैगो दूसर शरीर देइगो। यौवन कहे युवाअवस्थाको जारिकै
बहुयुक्ति को पारो कहे धारणकरो फिरि वृद्धावस्थामें साधनकरिबेकी सामर्थ्य
नहीं रहैहै ताते युवै अवस्थामें इन्द्रिनको विषय साधनकरि जारु कौनी तरहते
जारु कि जो कछु पदार्थ जगत्में जानि राख्यो है ते जानिपरैं कि जरिगये
अर्थात् मनको संकल्प विकल्प छूटि जाइ तबहीं ज्योति जो मनहै सोघटमें
साहबकी ओर उजियारी करैहै । ज्योति मनको कहैहैं तामेंप्रमाण ॥ “जीवरू-
१-'च' चंद्रमा सूर्य, और चोरको कहतेहैं ।
२-'छ' निर्मल, छेद, सूर्य और नावको कहते है ।
चौंतीसी । ( ४२९ )
पयकअंतरबासा । अंतरज्योति कीनपरकासा ॥ औ जकार वेगवारे को औ
जघनको कहै हैं "वेगिनि जैः समाख्यातो जघने जः प्रकीर्त्तितः" ॥ ९ ॥
झझा अरुझि सुरुझि कित जाना।हीठत ढूंढ़त जाहि पराना।
कोटि सुमेरु ढूंढि फिरि आवै।जो गढ़ गढ़ा गढ़हि सो पावै १०
झ कहिये झंझापवनको, औ झा कहिये नष्टको सो तैं विषयझंझामें परिकै नष्ट
होइगये । सो यामें अरुझिकै तैं कहां सुरुझिकै जैहै । झ कहिये पीठिको झा
कहिये विषयबयारिको सो विषयबयारिमें अरुझिकै साहबको पीठिदै कै सुरुझिकै
कितजान चाहैहै । हिठत ढूंढत तेरो परान जाइहै । नाना उपासना नानामतक-
रै है । अथवा हीठत ढूंढत तेरोपरान जाइहै नानामतनमें, पै तोको विषय बयारि
न छांड़ेगी वाहीमें अरुझो रहैगो । कोटिसुमेरुकहे कोटिन ब्रह्माण्ड भटकि आवै
परन्तु जौन मन शरीरगढ़को गढ़ा है कहे बनावा तौनैनको औगढ़कहे शरीरको
तपावैगो याते तैं बिषयबयारिको छांड़ साहबके सम्मुख होइ । झ झंझावातको औ
नष्टको कहै हैं तामें प्रमाण ॥ "झंझावाते झकारःस्यान्नष्टे झस्समुदाहृतः" ॥१०॥
ञञा निरखत नगर सनेहू । आपन करु निरुवारु सदेहू ॥
नहिं देखोनहिं आपु भजाऊ।जहां नहीं तहँ तन मन लाऊ॥११॥
ञ कहिये सोइबेको ञा कहिये झर्झर ध्वनिको । सो झर्झरनाक बजावत
ऐसो सोवत कहे आपने स्वरूपको भूलो जीव नाना मतनमें बाद विवाद करत
नगर जो जगत् औ शरीर ताहीको निरखै है औ वाहीमें सनेह करै है आपने
जो संदेहकी मैं साहबकोहौं कि और को हौं ताको तो निरवारु करु नयबातते
नहीं देखी जेहिमें साहब मिलै हैं औ न आप भजाऊ कहे न अपनपौ जाने कि
मैं कौनकोहौं जिन जिन मतनमें न साहिबै जानिपरै न आपने स्वरूप जानि-
परै तामें तैं तनमनको लगाये है । औ ञशयनको औ झर्झरध्वनिको कहै हैं
तामें प्रमाण ॥ "ञकारः शयने प्रोक्तो ञकारो झर्झरध्वनौ" ॥ ११ ॥
१-‘ज’ वेगवाले और जाँघ को कहते हैं ।
२-‘झ’ आँधी और खोजानेको हकते हैं ।
३-‘ञ’ सोने ( शयनकरने ) और झर्झर शब्दमें कहाजाता है ।