कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४२२ ) बीजक कबीरदास ।
ङङा निरखत निशि दिन जाई।निरखत नैन रहा रटलाई ॥
निमिष एक लौं निरखै पावै । ताहि निमिषमें नैन छिपावै ५॥
चचा चित्र रचो बहु भारी।चित्रहि छोड़ि चेतु चित्र कारी ॥
जिन यह चित्र विचित्र उखेला।चित्र छोड़ि तू चेतु चितेला ६
छछा आहि छत्र पति पासा।छकिकै रहसि मेटि सब आसा॥
मैं तोहीं छिन छिनसमुझाया।खसमछोड़िकसआपबंधाया ७
जजा या तन जीयत जारो। यौवन जारि युक्ति जो पारो ॥
जो कुछ जानिजानि पर जरै । घटहि ज्योति उजियारी करै ८
झझा अरुझि सरुझि कित जाना।हीठत ढूँढ़त जाहि पराना॥
कोटि सुमेरु ढूंढ़ि फिरि आवै।जो गढ़ गढ़ा गढ़हि सो आवै ९
ञञा निरखत नगर सनेहू । करु आपन निरवारु सँदेहू ॥
नाहिं देखी नाहिं आपभजाऊ।जहां नहीं तहँ तन मनलाऊ १०
टटा विकट बात मन माहीं । खोलि कपाट महलमें जाहीं ॥
रहै लटपटे जुटि तेहि माहीं।होहिं अटल ते कतहुं नजाहीं ११
ठठा ठौर दूरि ठग नीरे । नितके निठुर कीन मन धीरे ॥
जेहिठगठगसवलोगसयाना।सो ठगचीन्हिठौरपहिचाना १२
डडा डर कीन्हे डर होई । डरहीमें डर राखु समोई ॥
जो डर डरै डरै फिरि आवै।डरहीमें पुनि डरहि समावै॥ १३॥
ढढा ढूंढतई कत जाना । ढीगर डोलहि जाइ लोभाना ॥
जहां नहीं तहँ सब कछु जानी।जहां नहीतहँले पहिचानी १४
णणा दूरि बसौ रे गाऊं । रे णणा टूटै तेरा नाऊं ॥
मुये यते जिय जाही घना।मुये यतादिक केतिक गना॥ १५॥