कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौंतीसी । ( ४२९ )
पयकअंतरबासा । अंतरज्योति कीनपरकासा ॥ औ जकार वेगवारे को औ
जघनको कहै हैं "वेगिनि जैः समाख्यातो जघने जः प्रकीर्त्तितः" ॥ ९ ॥
झझा अरुझि सुरुझि कित जाना।हीठत ढूंढ़त जाहि पराना।
कोटि सुमेरु ढूंढि फिरि आवै।जो गढ़ गढ़ा गढ़हि सो पावै १०
झ कहिये झंझापवनको, औ झा कहिये नष्टको सो तैं विषयझंझामें परिकै नष्ट
होइगये । सो यामें अरुझिकै तैं कहां सुरुझिकै जैहै । झ कहिये पीठिको झा
कहिये विषयबयारिको सो विषयबयारिमें अरुझिकै साहबको पीठिदै कै सुरुझिकै
कितजान चाहैहै । हिठत ढूंढत तेरो परान जाइहै । नाना उपासना नानामतक-
रै है । अथवा हीठत ढूंढत तेरोपरान जाइहै नानामतनमें, पै तोको विषय बयारि
न छांड़ेगी वाहीमें अरुझो रहैगो । कोटिसुमेरुकहे कोटिन ब्रह्माण्ड भटकि आवै
परन्तु जौन मन शरीरगढ़को गढ़ा है कहे बनावा तौनैनको औगढ़कहे शरीरको
तपावैगो याते तैं बिषयबयारिको छांड़ साहबके सम्मुख होइ । झ झंझावातको औ
नष्टको कहै हैं तामें प्रमाण ॥ "झंझावाते झकारःस्यान्नष्टे झस्समुदाहृतः" ॥१०॥
ञञा निरखत नगर सनेहू । आपन करु निरुवारु सदेहू ॥
नहिं देखोनहिं आपु भजाऊ।जहां नहीं तहँ तन मन लाऊ॥११॥
ञ कहिये सोइबेको ञा कहिये झर्झर ध्वनिको । सो झर्झरनाक बजावत
ऐसो सोवत कहे आपने स्वरूपको भूलो जीव नाना मतनमें बाद विवाद करत
नगर जो जगत् औ शरीर ताहीको निरखै है औ वाहीमें सनेह करै है आपने
जो संदेहकी मैं साहबकोहौं कि और को हौं ताको तो निरवारु करु नयबातते
नहीं देखी जेहिमें साहब मिलै हैं औ न आप भजाऊ कहे न अपनपौ जाने कि
मैं कौनकोहौं जिन जिन मतनमें न साहिबै जानिपरै न आपने स्वरूप जानि-
परै तामें तैं तनमनको लगाये है । औ ञशयनको औ झर्झरध्वनिको कहै हैं
तामें प्रमाण ॥ "ञकारः शयने प्रोक्तो ञकारो झर्झरध्वनौ" ॥ ११ ॥
१-‘ज’ वेगवाले और जाँघ को कहते हैं ।
२-‘झ’ आँधी और खोजानेको हकते हैं ।
३-‘ञ’ सोने ( शयनकरने ) और झर्झर शब्दमें कहाजाता है ।