कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१० ) बीजक कबीरदास ।
लख चौरासी जीव योनिमें सायर जात वह्यो ।
कहै कबीर सुनौहो संतौ श्वान कि पूंछ गह्यो ॥ ४ ॥
खसम बिन तेलीके बैलभयो ।
बैठत नाहिं साधुकी संगति नाधे जन्म गयो ॥ १ ॥
बहि बहि मरै पचै निज स्वारथ यमके दंड सह्यो ।
धन दारा सुत राज काज हित माथे भार गह्यो ॥ २ ॥
श्री कबीरजी जीवकों उपदेश करै हैं हे जीव ! तेरे मालिक जे रामचन्द्र हैं
तिनहीं बिना तैं तेलीको बैल भयो जे साधु तेरो स्वरूप बताइदेइँ ऐसे साधु-
नकी सङ्गति में कबौं नहीं बैठै तेलीके बैलकी नाईं नाधे नाधे जन्म व्यतीत
भयो जन्मतै मरत रह्यो ॥ १ ॥ जब कांधे जुवां नाधि जायहै तब निज
तेलीके निमित्त ढोइ ढोइ मरै है जो ना रेंगै तौ तेली डंडा मारै है तैसे यह
जीव धन दारा सुत राज काजके हित नाना कर्म करै है इंद्रियसुख लियेँ
बहि बहि कहे नाना कर्मनको भारा ढोइ होइकै पचै है अरु अंतमें यमदंड
मारै हैं सो सहै है याही रीति जन्म जन्म यमदंड सहौ है ॥ २ ॥
खसमहिं छोड़ि विषय रँग माते पापके वीजवयो ।
झूंठ मुक्ति नर आश जिवनकी प्रेतको जूठ खयो ॥३॥
खसम जे साहब तिनको त्यागि विषय रंगमें मात्यों औ पापकों बीज
बोवत भयो अर्थात् जो नारी अपने खसमको छोड़ि और पुरुषमें लगै है तौ
वाको बड़ो पाप होयहै सोतैं खसमको छोड़िकै नाना देवतनकी उपासनामें लगि
जात भयो मातिगयो सो तैं महापाप के बीजबोयो औ नरन को ज्यावनवारी जौं
मुक्तिकी जो हमको उपास्य देवता प्राप्त होयँगे तौ हम जीतै रहेंगे हमारो
जनन मरण न होयगो सो वह मुक्ति झूठी है जौने शरीरते उनके लोकको
जायगो सो तन नाश ह्वै जाइगो जब फेरि सृष्टि समय होइगो तब वाई देवनकें
साथ फिरि आवैगो जनन मरण न छूटैगो सो ऐसी झूठी मुक्तिके वास्तें