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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 476

( ४२८ ) बीजक कबीरदास ।

छोड़िदे हे जीव ! चित्रकारी जो मन ताकों चेतकरु वही तेरे स्वस्वरूप को
भुलाय दियोहै च चंद्रमा को चोरको कहैहैं ॥ "चेश्चंद्रश्च समाख्यातास्तस्करे
मास्करेमतः" ॥ ७ ॥
छछा आहि छत्र पति पासा।छकि किन रहै छोड़ि सबआशा।
मैं तोहीं क्षण क्षण समुझाया।खसमछोड़िकसआपुवँधाया ८
छ कहै निर्मल जीव तैं आपने स्वरूपको भूलिकै साहबको भूलिगयो ताते
छाकेह छेदरू ही द्वैगयो तेरे स्वरूपकी क्षयद्वैगई सो तैं तो छत्रपती जे परमपुरुष
श्रीरामचन्द्र तिनको आहि तिनके पास जायकै ई सब नाना देवनकी आशा छोड़िकै
छकिरहु।या बात मैं तोको क्षणक्षण समुझायो परन्तु तुमखसमजे साहबहैं तिनको
छोड़िकै तैं काहेको जगत् में अपनपौ बँधाया।छनिर्मल को औ छेद छ को कहै हैं
तामें प्रमाण॥ "निर्मले छस्समाख्यातस्तरणिश्छः प्रकीर्त्तितः॥ छेदे च छः समा-
ख्यातो विद्वद्भिः शब्दशासने" ॥ ८ ॥
जजा ई तन जियतहि जारो। यौवन जारि युक्ति जो पारो ॥
घटहि ज्योति उजियारी करो।जो कछु जानि जानि पर जरै ९
ज कहिये वेगवंतको औ जा कहिये जघनको सो हे जीव ! वेगवारो जोम-
नहै सोई तेरो जघनहै ताहीते बागत फिरै है अर्थात् जननमरण होतरहैहै । सो
यातनको कहै मन रूप तनको तैं जीतै में कहै यही शरीरको साधनकरके
जा रिदे मरेते न जरैगो दूसर शरीर देइगो। यौवन कहे युवाअवस्थाको जारिकै
बहुयुक्ति को पारो कहे धारणकरो फिरि वृद्धावस्थामें साधनकरिबेकी सामर्थ्य
नहीं रहैहै ताते युवै अवस्थामें इन्द्रिनको विषय साधनकरि जारु कौनी तरहते
जारु कि जो कछु पदार्थ जगत्में जानि राख्यो है ते जानिपरैं कि जरिगये
अर्थात् मनको संकल्प विकल्प छूटि जाइ तबहीं ज्योति जो मनहै सोघटमें
साहबकी ओर उजियारी करैहै । ज्योति मनको कहैहैं तामेंप्रमाण ॥ “जीवरू-
१-'च' चंद्रमा सूर्य, और चोरको कहतेहैं ।
२-'छ' निर्मल, छेद, सूर्य और नावको कहते है ।