कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४२४ ) बीजक कबीरदास ।
ररा रारि रहा अरु झाई । राम कहै दुख दारिद जाई ॥
ररा कहै सुनौरे भाई । सतगुरु पूछि कै सेवहु जाई ॥२७॥
लला तुतेरे बात जनाई । तुतेरे पावै परचै पाई ॥
अपना तुतुर और को कहई । एकै खेत दुनों निरबहई ॥२८॥
ववा वह वह कह सब कोई । वह वह कहे काज नहिं होई ॥
ववा कहै सुनहुरे भाई । स्वर्ग पतालकी खबरि न पाई २९
शशा शरद देखै नहिं कोई । शर शीतलता एकहि होई ॥
शशा कहै सुनौ रे भाई । शून्य समान चला जग जाई॥३०॥
षषा षर षर कह सब कोई । षर षर कहे काज नहिं होई ॥
षषा कहै सुनहुरे भाई । राम नाम लै जाहु पराई ॥ ३१ ॥
ससा सरा रचो बरिआई । सर बेधे सब लोग तवाई ॥
ससाके घर सुन गुन होई । यतनी बात न जानै कोई ३२
हहा होइ होत नहिं जानै । जबहीं होइ तबै मन मानै ॥
है तौ सही लहै सब कोई। जब वा होइ तब या नहिं होई ३३
क्षक्षा क्षण परलै मिटि जाई । क्षेव परे तब को समुझाई ॥
क्षेव परे कोउ अंत न पाया। कह कबीर अगमन गोहराया ३४
उँकार आदिहि जो जानै। लिखिकै मेटि ताहि फिरि मानै॥
वै उँकार कहौ सब कोई। जिनहुँ लखा सो विरला सोई॥१॥
ओंकारको आदि जो रामनाम ताको जो कोई जानै पिंडाण्ड ब्रह्माण्डको
चाहे लिखिकै कहे उत्पत्तिकै मेटै कहे नाशकरै फिरि मानै कहे पालनकरै ।
सो वह ओंकारको तो सबै कोई कहै हैं परन्तु जिन बाको लखाहै सो कोई