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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 463

शब्द । (४१५)
अथ एकसै ग्यारह शब्द ॥ १११ ॥
है कोई पंडित गुरुज्ञानी उलटि वेदको बूझै ।
पानीमें पावक जरै अंधे आंखी सूझै ॥ १ ॥
गैयातो नाहरको खायो हरिना खायो चीता ।
कागा लगरै फांदिकै बटेरन वाजै जीता ॥ २ ॥
मूसा तो मंजारै खायो स्यारै खायो श्वाना ।
आदिके उपदेश जानै तासु बेसै बाना ॥ ३ ॥
एकै तो दादुर सो खायो पांचौ जे भूवंगा ।
कहै कबीर पुकारिकै हैं दोऊ यक संगा ॥ ४ ॥
हैं कोई गुरु ज्ञानी पंडित उलटि वेदको बूझै ।
पानीमें पावक जरै अंधे आंखी सूझै ॥ १ ॥
ऐसो गुरुज्ञानी पंडित कोई नहीं है जो उलटिकै वेदको अर्थ बूझै अर्थात
गायत्रीते वेद भयो है प्रणवते गायत्री भई है प्रणव राम नामते उत्पन्न भयो है
सो कहैंहैं पानी जो है बानी तामें पावक जरैहै कहे ब्रह्माग्नि बीज रामनामहै सो
सर्वत्र पूर्ण है सो अंधेके आंखीमें कैसे सूझै उलटिकै वेदको बूझै तौ जानै कि
सबको मूल रामनामहै ॥ १ ॥
गैया तो नाहर को खायो हरिना खायो चीता ।
कागा लगरै फांदिकै बटेरन वाज जीता ॥ २ ॥
गैया जो गायत्री तौनेके नाना अर्थ करि कहीं सूर्यमें लगावैंहैं कहीं ब्रह्ममें
लगावैं हैं सोई अर्थ जो गैया सो सांच गायत्रीको तात्पर्यार्थ साहब तिनको ज्ञान
जो नाहर ताको खायलियो औ हरिनाजो अद्वैत ज्ञान कि हरिनहीं है प्रणवको
अर्थकियो कि जीव नहीं है एक ब्रह्मही है सो मैं हौं या जो हरिना सो साहबकों