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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 461

शब्द । (४१३)
सो दशरथसुतको तौ तीनौलोक जानैहैं पै रामनामको मर्म कोउ कोउ जानैहैं
अर्थात् कबहूं दशरथ सुत कबहूं नारायण कबहूं व्यापक ब्रह्मही अवतार लेइ
हैं नित्य साकेत विहारी परम पुरुष पर जे श्रीरामचन्द्रहैं जिनके नामते ब्रह्म ईश्वर
वेद शास्त्र सब निकसै हैं तौने रामनामको तौ मर्म आनहै ॥ २ ॥
जेहि जिय जानि परा जस लेख्वा। रजुको कहै उरगको पेखा ३
यद्यपि फलउत्तमगुणजाना। हरिहित्यागिमनमुक्ति न माना४
जाको यह रामनाम जैसो जानि पर्यो है सो तैसे लेख्यो है कोई रघुनाथ-
जी को दशरथके पुत्र मानै है कोई नारायण को अवतार मानै है कोई ब्रह्मको
अवतार मानै है तिन्हीं को नाम रामनाम मानैहै सो जैसे रसरीको उरग
कहै हैं बिना समुझे ऐसे रामनाम जो साहबको है सो भ्रम छोड़िकै बिचारै तौ
तौ साहिबको बोध करैहैं ॥ ३ ॥ सो यद्यपि उत्तम गुण जानेके फल होयहै
कि विष्णु लोक प्राप्तभये परन्तु परम पुरुषपर जे श्रीरामचन्द्र तिनके पास
भये बिना हम मुक्ति नहीं मानै हैं ॥ ४ ॥
हरिअधारजसमीनहिंनीरा।औरयतनकछुकहैकबीरा ॥५॥
सो जैसे मीनको आधार अंबुहै बिना जल मीन नहीं रहि सकै है तैसे
श्रीरामचन्द्र सबके आधारहैं सो तिन्हीं को जो आधार मानै तो जैसे मीन
सर्वत्र जलही देखै है द्विभुजरूप श्रीरामचन्द्रको सर्वत्र देखै औ उनहींमें रहै तौ
श्री कबीरजी कहैंहैं कि और यतन सब थोरई है तामें प्रमाण श्री गोसाईंजी कों
॥ दोहा ॥ “ सो अनन्य अस जाहिके, मति न टरै हनुमन्त । मैं सेवक सचरा-
चर, रूप राशि भगवंत ” ॥ १ ॥ तामें प्रमाण कबीरजीको ॥ “ नैनन आगे
ख्याल घनेरा । अरध उरध बिच लगन लगी है क्या संध्या क्या रैनि सबेरा ।
जेहि कारण जग भरमत डोलै सो साहब घट लिया बसेरा । पूरी रह्यो अस-
मान धरणिमें जितदेखो तित साहब मेरा । तसबी एक दियो मेरे साहब कह
कबीर दिलही बिच फेरा ” ॥ ५ ॥
इति एकसै नव शब्द समाप्त ।