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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 475

चौंतीसी । ( ४२७ )
समावै अर्थात् जीतै । यहीशरीर में हंसस्वरूप पायजाय । घ घातको कहै हैं ॥
“घोधटेऽपिसमाख्यातःकिंकिणीवा प्रकीर्त्तितः । घा हनूमति विख्यातोघृंमूर्द्धनि-
प्रकीर्त्तितः ” ॥ ५ ॥
ङङन निरखत निशिदिन जाई।निरखत नय न रहत रतनाई
निमिष एक लौं निरखै पावै। ताहि निमिषमें नयन छिपावै६
ङ कहै भयानक ङा कहै बिषय बांछा । सो ङङा भयानक बिषय बांछा निर-
खत कहै बिचारत तोको दिनौ राति जाइहै वाहीके निरखत में कहै बिचारतमें नय
जो नीति सो नहीं रहत रतनाई जो अनुराग बिषयमें सोई रहि जाइहै।कैसीहै वह बि-
षय कि एक निमिष लौं निरखै पावै कहै वामें लगे तौ तौनैन .निमिषमें भोगोपरान्त
नयन छिपावैहै नहीं नीक लागैहै । अर्थात् रूपको देख्यो फिरिनयनमें नीर भारि
आवैहै नहीं नीक लागैहै । सुगन्ध बहुत सूंघ्यो उपरांत नाक बरि उठैहै, अच्छो
भोजन कियो तृप्त भये पर बिरस परि जाइहै, गान बहुत सुन्यो फिरि बक
वाधि लगै है । स्पर्श बहुत सुन्दर स्त्री कियो फिरि वीर्य पात भये, नहीं
नीकालागै है, गरम लागन लगै है । सो ये सब तृप्तिके उपरांत जो निमिष है
तौने निमिष नहीं नीक लगै है । ङ विषय बांछाको कहैंहैं तामेंप्रमाण ॥
“ङकारो भैरवः ख्यातो ङो ध्वनावपि कीर्त्तितः ॥ ङकारस्मरणे प्रोक्तो ङकारो
बिषयस्पृहा” ॥ ६ ॥
च चा चित्र रचो बहु भारी। चित्र छोड़ि तू चेतु चित्र कारी ॥
जिन यह चित्र विचित्र उखेला।चित्र छोड़ तू चेतु चितेला ७
च कहै मन काहेते कि, मनको देवता चंद्रमा यांते मनको कही । औ
दूसर चा चोरको कही सो तेरोमन जो चोर सो तेरे स्वरूपको चोराय लीन्हों
साहबको भुलायदीन्हो सो यह जगतरूपचित्र जो रच्योहैं चित्रविचित्र सो तू
१-‘घ’ घड़ा अथवा घुँघुरू को कहते हैं ‘घा’ हनुमान् और ‘घृ’ शिरको कहते हैं ।
२-‘ङ’ भैरवको किसीकी याद करनेको और भोगकी इच्छाको कहते हैं ‘ङा’
शब्दकरनेको कहते हैं ।