कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 465, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( ४१७ )
हे जीवौ ! यह झगड़ा बड़ो है ताको बिचार करो जो कोई यह झगड़ा
निरुवारै सोई निर्वाण कहे मुक्त है। सो कहै हैं भला जौन ब्रह्म जीव आपने मनतें
अनुभव करि लियो है सो बड़ा है कि जहांते जीव आयो है लोक प्रकाशते सो
बड़ों है। सो ब्रह्म बड़ा नहीं है। वा लोकःप्रकाश बड़ाहै जहांते जीव आयो है। औ
जौने वेदकी आज्ञाते नाना ईश्वर मानि लियो है सो बड़ा है कि रामनाम
ते वेद उपजाहै सोबड़ाहै अर्थात रामनाम बड़ा है जाते वेद भयो है। औ मन
बड़ा है कि जाको मन आपनेते बड़ा मान्यो है सो बड़ाहै अर्थात् जो मन
बचनके परे है सोई बड़ो है जाको मन मान्यो है। औ श्री रामचन्द्र काहूको उप-
देश करै नहीं आवैं श्री रामचन्द्रके जाननवारे रामको बतायकै जीवनको उप-
देश कै उद्धार कै देइहैं याते रामदास बड़े हैं। औ तीर्थ बड़े कि जे तीर्थकों
बिधि सहित न्हाइहैं ते बड़े अर्थात् जे तीर्थके दास बने हैं ते बड़े हैं
सो हे कायाके बीरौ जीवौ ! भ्रमि भ्रमिं काहे को उदास फिरौ हौ या बात
को बिचारौ ॥ १ ॥ ४ ॥
इति एकसै बारह शब्द समाप्त ।
अथ एकसै तेरह शब्द ॥ ११३ ॥
झूठे जनि पतिआहु हो सुन संत सुजाना ।
घटही में ठगपूरहै मति खोउ अयाना ॥ १ ॥
झूठेका मंडान है धरती असमाना ।
दशौ दिशा जेहि फंद है जिउ घेरे आना ॥ २ ॥
योग यज्ञ जप संयमा तीरथ ब्रत दाना ।
नवधावेद किताब है झूठेका वाना ॥ ३ ॥
काहूको शब्दै फुरै काहूकरमाती ।
मान बड़ाई लैरहै हिंदू तुरुक दुजाती ॥ ४ ॥
२७