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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 766 में से

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पृष्ठ 464

( ४१६ ) बीजक कबीरदास ।
ज्ञान जो चीता ताको खाय लियो चीता साहबकें ज्ञानकों कहते कह्यो कि
जब साहबको ज्ञान होइहै तब अद्वैत ज्ञान नहीं रहिजाइ है औ काग जो अज्ञान
सो साहबको ज्ञान जो लगर शिकारी पक्षी कागा को खानवारो ताको कागा
खाय लियो औ असत् शास्त्रके अनेक प्रकारके जे अर्थ तेई हैं बटेर ते सब
शास्त्र जे साहबके बतावनवारे तेई हैं बाज ताको जीतलियो अर्थात् तामसी जे हैं
ते तामस शास्त्रको प्रचार करि सत् शास्त्रको लोप करिदियो ॥ २ ॥
मूसातो मंजारै खायो स्यारै खायो श्वाना ।
आदिको उपदेश जानै तासु बेसै बाना ॥ ३ ॥
एकै तो दादुर सो खायो पांचौ जे भूवंगा ।
कहै कबीर पुकारिकै हैं दोऊ एक संगा ॥ ४ ॥
मूसा जो है वितंडाबाद सो साहबको उपदेश जो मंजार ताको खायलियो
औ स्यार जो माया सो जीवके स्वरूप ज्ञानते जो होइहै स्वानुभवानंद सोई
है श्वान ताको खाइ लियो सो कबीरजी कहै हैं जो कोई आदिको उपदेश
जो है रामनाम जानै ताहीको वेष बानाहै और सब पाखंडई है ॥ ३ ॥
एकही दादुर जो मन सो दादुरके खाय लेनवारो पांचभुवंग जे रति नेष्ठा
भाव प्रेम रस ते ताको खाइलियो सोई एक एकके विरोधी रहे तिनको खाइ
लीन्हे सो कबीरजी कहैंहैं जीव साहब एकै संगके हैं आपने स्वरूपको न समु-
झ्यो या न विचार्यो कि मैं साहबको हौं ताते संसारी है गयो है जो साहब
मुख अर्थ विचारतो तौ एकही संग को है ॥ ४ ॥
इति एकसै ग्यारह शब्द समाप्त ।
अथ एकसै बारह शब्द ॥ ११२ ॥
झगरा एक बढ़ो जियजाना।जो निरुवारै सो निरवान ॥१॥
ब्रह्म बड़ा की जहँते आया।वेद बड़ा की जिन उपजाया॥२॥
इहमनबड़ाकीजेहिमनमाना।रामबड़ाकी रामहिं जाना॥३॥
भ्रमिभ्रमिकविरा फिरैउदासा।तीर्थबड़ाकीतीर्थक दास ॥४॥