कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१२ ) बीजक कबीरदास ।
रूपा भक्ति मोकों न होत भई केवल ज्ञानै करिकै रामनामकी रटनि लगाइकै
बिचरत भयों कि, मिलिही जायँगे तब हे प्राणनाथ! मेरी कहा गति होत भई
सों कहौहौं ॥ ३ ॥ हम तुम्हारे शरण तो चलिगये कहे तुम्हारे नाममें रट
लगावत भयो पै तुम्हारे चरणन को न देखत भयो अर्थात् दर्शन न पायौं
॥ ४ ॥ सो हे भगवन्! षट् ऐश्वर्य संपन्न धौं हमहीं कुसेवक रहे जो तिहारों
दर्शन न पायो धौं तुम्हीं अयान रहे हमको न जानत रहे जो हमको नहीं
मिले दुइमें काको दोष है ॥ ५ ॥ अब दास कबीर जो मैंहों ताको भली
भांतिते जब निराश करि दियो कि, कौनेउ भांतिकी जब आश न रहिगई न
ज्ञान करिकै न योग करिकै न भक्ति करिकै केवल सुधारसरूपा निर्गुणा
भक्ति जब मोको दियों तब हम तुम्हारे पास चलि आये याते कबीरजी या
देखायो कि, जब सब बातते निराश है जाय हैं तब साहबके पास जाइहैं॥६॥
इति एकसै आठ शब्द समाप्त ।
अथ एकसै नव शब्द ॥ १०९ ॥
लोग बोलैं दुरिगये कबीरा।या मत कोइ कोई जानैं धीर॥१॥
दशरथ सुत तिहुं लोकहि जाना। राम नामको मर्म आना २
जेहि जिय जानि परा जस लेखा।रजु को कहै उरग जोपेखा३
यद्यपि फल उत्तमगुण जाना।हरीहत्यागिमनमुक्तिनमाना४
हरि अधार जस मीनहिं नीरा।औरयतनकछुकहहिंकबीरा५
लोग बोलैं दुरि गये कबीरा । या मत कोइ कोई जानैं धीरा १
श्री कबीरजी कहै हैं कि, सब लोग बोलै हैं कि, कबीर बहुत दूरि गये
बहुत पहुंचे हैं सो या मत कोई जे धीरे धीरे साधनमें कियनमें समुझनमें
अभ्यास करै हैं सो जानै हैं कौन मत सो आगे कहै हैं ॥ १ ॥
दशरथ सुत तिहुं लोकहि जाना।राम नामको मर्म आना२॥