कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिरलाहै । तांके लखिबेको प्रकारहौं कहौंहौं । अकार लक्ष्मणको स्वरूप उकार
शत्रुघ्नको स्वरूप मकार भरतको स्वरूप अर्द्धमात्रा श्रीरामचन्द्रको स्वरूप
संपूर्ण प्रणव श्री जानकीजीको स्वरूप । यहि रीतिते जो कोई प्रणवको जानै
सो बिरला है ! कौनी रीतिते जपकै त्रिकुटीमें अकार कंठमें उकार हृदय में
मकार नाभिमें अर्द्धमात्रा गैबगुफामें संपूर्ण प्रणव ऐसो एक एक मात्राकों
अर्थ बिचारत घंटानादकी नाईं जप करनवारो बिरला है साहबमुख यह
अर्थ हम दिग्दर्शन करादियो है और बिस्तार ते अर्थ हमारे रहस्य त्रयग्रन्थमें
है और सब जगत्मुखअर्थ है ॥ १ ॥
कका कमल किरणिमैं पावै।शशि बिकसितसंपुटनाहिंआवै॥
तहां कुसुम्भ रंग जो पावै । औगह गहैके गगन रहावै ॥२॥
क कहिये सुखको सो कका कहे सुखको सुख जो साहब तिनको किरणिं
जो अर्द्धमात्रा ताको नाभि कमलमें ध्यान करि जीव जानै । औ शशि जो चंद्र
नाड़ी तौनेको अमृत सींचिकै विकसित कियेरहै संपुटित न होनपावै । औ तहैं
कुसुंभ रङ्ग जो प्रेम ताको पावै तौ अगह जो साहब जे मन वचन करिकै नहीं
गहे जाइँ तिनको गहिकै गगन जो हृदय आकाश तामें राखै । याके आवरण कें
मंत्र औ ध्यानको प्रकार हमारे “शान्तशतक” में लिख्यो है । ककार सुखको कहै
हैं तामें प्रमाण । “कः प्रजापति रुद्दिष्टः को वायुरिति शब्दितः॥कश्चात्मनि सं-
माख्यातः कस्सामान्य .उदाहृतः ॥ १ ॥ कं शिरो जलमाख्यातं कं सुखेऽपि
प्रकीर्त्तितम् ॥ पृथ्वियां कुः समाख्यातः कुः शब्देऽपि प्रकीर्त्तितः ” ॥ २ ॥
खखा चाहै खोरि मनावै । खसमहिं छोड़ि दशहु दिशि धावै॥
खसमहिं छोड़ि क्षमा है रहई।होइ अखीन अक्षयपद गहई ३
खा जो चैतन्याकाश ताहूको चैतन्याकाश अर्थात् ब्रह्महूंको ब्रह्म जो साहब
ताको जो चाहै तौ अपनी खोरि जो चूकसो मनावै कहे बकसावै । कौन चूक ?
१-'क' ब्रह्मा, वायु, आत्मा और साधारणको कहतेहैं ।
'कं' शिर, पानी, और सुखको कहतेहैं । शब्द और भूमिको 'कु' कहतेहैं ।