कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौंतीसी। ( ४२३ )
तता अति त्रियो नहिं जाई। तन त्रिभुवनमें राखु छपाई ॥
जो तन त्रिभुवनमाहँ छपावै। तत्त्वहि मिलि सो तत्त्व जो पावै १६
थथा थाह थहो नहिं जाई । यह थीरे वह थीर रहाई ॥
थोरे थोरे थिरहो भाई। बिन थंभे जस मन्दिर जाई ॥ १७ ॥
ददा देखौ बिनशन हारा । जस देखौ तस करौ विचारा ॥
दशौ द्वारमें तारी लावै। तब दयालको दर्शन पावै ॥१८॥
धधा अर्ध माहँ अँधियारी । जस देखै तस करै विचारी ॥
अधो छोड़ि ऊरध मन लावै। अपा मेटि कै प्रेम बढ़ावै ॥१९॥
नाना वो चौथेमें जाई । रामका गद्दह है खरखाई ॥
नाह छोड़ि किय नरक बसेरा। अजौं मूढ़ चित चेतु सवेरा २०
पपा पाप करै सब कोई । पापके घेरे धर्म नहिं होई ॥
पपा कहै सुनौरे भाई । हमरेसे ये कछू न पाई ॥ २१ ॥
फफा फल लागो बड़ दूरी । चाखै सतगुरु देव न तूरी ॥
फफा कहै सुनौ रे भाई। स्वर्ग पताल कि खबरि न पाई२२
बबा बर वर कर सब कोई।बर वर किये काज नहिं होई ॥
बबा बात कहै अरथाई।फलका मर्म न जानेहु भाई ॥२३॥
भभा भर्म रहा भरि पूरी । भभरेते है नियरे दूरी ॥
भभा कहै सुनौरे भाई । भभरे आवै भभरे जाई ॥ २४ ॥
ममा सेये मर्म न पाई । हमरे ते इन मूल गवाँई ॥
ममा मूल गहल मन माना।मर्मी होहि सो मर्महि जाना॥२५
यया जगत रहा भरि पूरी । जगतहु ते ययाहै दूरी ॥
यया कहै सुनौरे भाई । हमरे सेये जै जै पाई ॥ २६ ॥