कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ एकसै दश शब्द ॥ ११० ॥
अपनो कर्म न मेटो जाई ।
कर्म लिखा मिटै धौं कैसे जो युग कोटि सिराई॥ १ ॥
गुरु वशिष्ठ मिलि लगन शोधाई सूर्य मंत्र यक दीन्हा।
जो सीता रघुनाथ विआही पल यक संच न कीन्हा २
नारद मुनिको बदन छपायो कीन्हो कपिसों रूपा।
शिशुपालहुके भुजा उपारे आपुन बौद्ध स्वरूपा ॥३ ॥
तीनि लोकके करता कहिये वालि बध्यो बरियाई ।
एक समय ऐसी बनि आई उनहूँ अवसर पाई॥४॥
पार्वती को बांझ न कहिये ईश न कहिय भिखारी ।
कह कबीर करता की वातैं कर्मकि बात निनारी ॥५॥
श्रीमन्नारायण वैकुण्ठते केतन्यो अवतार लियो तेऊ कर्मकी मर्यादा राखिबोई
कियो सो जे साहब उत्पत्ति पालन संहार करै हैं तेतो कर्मकी मर्यादा राखि-
बोई कियो और की कहा गतिहै सो बिना परमपुरुषपर श्रीरामचन्द्रके नामलि-
ये कर्मकीगतिकाहूकी मेटी नहीं मेटि जाइहै श्री रामनामते कर्मकी गति मिटि
जाइहै साहब मेटि देइहै तामें दोउ प्रमाण॥ “राम नाम मणि विषय ब्यालके।
मेटत कठिन कुअंक भालके” ॥१॥ “सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माशुच”इतिगीतायां॥ “सकृदेवप्रपन्नायतवास्मी-
तिच याचते।अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम”॥इति रामायणे॥औ कबीरजी
ऊकौ प्रमाण ॥ “पहिले बुरा कमाइकै, बांधी विषकै मोट । कोटि कर्म मिट
पलकमैं, आवै हरिकी ओट ॥ ” और और पदको अर्थ स्पष्टै है ॥ १–५ ॥
इति एकसै दश शब्द समाप्त ।