कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( ३९६ ) बीजक कबीरदास ।
मकाहै तहां अल्लाहको बास है ताही ओर मुसल्मान निमाज़ गुजौरै हैं। सो यातें
काह भयौ ? आपने दिलमें खोज कैकै तौ देखबै न कियों कि, करीम जे
खुदा राम जे रामचंद्र ते दिलहीमें हैं हिंदू तुरुक दोउनमें वोई हैं ये तो शरीर
आय साहब एकई है या न जानै तौ काहभयो ॥ ५ ॥ मुसल्मान लोग या
मानै हैं खोदाय मसजिद में बसतु है औ हिन्दू मानै हैं कि रामचन्द्र मूर्त्ति औ
तीर्थ में बसै हैं यातें काह भयो ? काहेते दुइ में या बात कोई न बिचारै कि,
और मुल्कमैं को बसै है सो सर्वत्र साहिबही पूर्ण है यहै न जानने ते सब आपने
आपने पक्षमें लगे हैं ॥ ६ ॥
वेद किताब कीन्ह किन झूठा झूठा जो न विचारै ।
सब घट एक एक करि लेखै भय दूजा करि मारै ॥ ७ ॥
वेद वाले किताबको झूठाकहै हैं, किताब वाले वेदको झूठाकहैं हैं सो या
कहा झूठाहै इनको को झूठा करिसकै है । झूठा वही है जो इनको नहीं बिचारै
है कि, वेदकिताबको यही सिद्धांत है साहब सर्वत्रपूर्ण है हिंदूके याहै कि, सब-
नाम साहिबहीके हैं ॥ “ सर्वाणि ना मानि यमाविंशतीति श्रुतिः ” ॥ औमुस-
ल्मानके “ जामैजमीसिफ़ात जामै जमीअसमात ” यह कलामुल्लाके किताबमें
लिखै है सो घट घटमें चित्त स्वरूप जीव एकही है सबके साहब रामचन्द्रही
हैं; तिनको एक करि लेखै भय दूसरेते होय है ताकों मारै सो यातो बिचारबै
न कियो तौ काह भयो ॥ ७ ॥
जेते औरत मर्द उपाने सो सब रूप तुम्हारा ।
कबिर पोंगड़ा अलह रामको सो गुरु पीर हमारा ॥ ८ ॥
सो कबीरजी कहै हैं कि, जेते औरत औ मर्द उपाने कहे उपजे हैं ते सब
तुम्हारे रूप हैं काहेते कि, चित् जो तुम्हारो विग्रहहै ताही ते जगत् है । औ
कबिर कहे कायाके बीर जे जीवहैं ते हे अल्लाह राम तिहारे जीवनके पोंगड़ा
हैं अर्थात् तुम्हीं घट घट में बोलत हौ, तुमको जानिबेको इनके कुदरति
नहीं है चाहौ तुम उपदेशकरि आपनेमें लगावो चाहौ गुरुपीर द्वारा उपदेश
शब्द । ( ३९७ )
करि आपनेमें लगावो इनको वश नहीं है तामें प्रमाण ॥ “यथादारुमयी-
योषिन्नृत्यते कुहकेच्छया। एवमीश्वरतंत्रोयमीहते सुखदुःखयोः” ॥ चौपाई ॥
“उमा दारुयोषितकी नाईं । सबैनचावत रामगोसाईं” ॥ ८ ॥
इति सत्तानवे शब्द समाप्त ।
अथ अट्ठानबे शब्द ॥ ९८ ॥
आवो वे आवो मुझे हरिको नाम। औरसकल तजुकौनेकाम १
कहँ तब आदम कहँ तब हवा । कहँ तब पीर पैगम्बर हुवा २ ॥
कहँ तब जिमींकहां असमाना।कहँ तब वेद किताब कुराना ३
जिन दुनियामें रची मसीद । झूठो रोजा झूठ ईद ॥ ४ ॥
सांच एक अल्लाःको नामा।ताको नय नय करौ सलाम ॥५॥
कहौधौं भिश्त कहांते आई।किसके कहे तुम छुरी चला ई६॥
करता किरतिम बाजी लाई । हिंदु तुरुक दुइ राह चलाई ७॥
कहँ तबदिवस कहां तब राती।कहँ तबकिरतिम कीउतपाती ८
नहिंवाकेजातिनहींवाकेपांती।कहकबीरवाकेदिवसनराती ९
आवो वे आवो मुझे हरिको नाम।औरसकल तजु कौनेकाम १
कहँ तब आदम कहँ तब हवा । कहँ तब पीर पैगम्बर हुवा २॥
कहँ तब जिमी कहाँ असमाना।कहँ तब वेदकिताब कुराना ३
श्रीकबीरजी कहैहैं कि, जौने नाममें सब नामहैं तौने जो मन बचनके
परे हरिको नाम है सो हे जीव ताको तैं बिचारकरु कि, मोको आवै ।
और सब बस्तु झूठे छोड़िदे, कौने कामके हैं । जब वह नाम रह्योहै आदिमें
तब कुछ नहीं रह्यो ॥ १ ॥ ॥ २ ॥ ३ ॥ पदका अर्थ स्पष्ट है भाव यह है
कि, ये जे कहिआये ते कहां रहेहैं अर्थात् कोई नहीं रहे ॥ २ ॥ ३ ॥
( ३९८ ) बीजक कबीरदास ।
जिन दुनियामें रची मसीद । झूठी रोजा झूठी ईद ॥ ४ ॥
सांच एक अल्ल़ाःको नामा।ताको नय नय करो सलाम॥५॥
कहुधौं भिश्त कहाँते आई।किसके कहे तुम छुरी चलाई६॥
अरु जीव जिन संसार में मसीद जो मसजिद शरीर रच्योहै ते कतरौ
नहीं रहे ॥४ ॥ सांच एक मन बचनके परे अल्ल़ाःको नामहै ताको नय नयकै
सलाम करो और सब झूठा है जिसकें बनाये भिश्त भईहै तेऊ वही नामते
प्रकट भये हैं तुम किसके कहे जीव मारते हौ ई सब झूठे हैं ॥५॥ ६ ॥
करता किरतिम बाजी लाई । हिंदु तुरुक दुइ राह चलाई७
कहँ तवदिवस कहाँ तब राती।कहँतबकिरतिमकीउतपाती८
नहिंवाकेजातिनहींवाकेपांती।कहै कबीर वाके दिवस न राती९
सो कर्ता कै कृत्रिम जो माया है सो बाजी लगायकै दुइ राह चलाईहै॥७॥
जब प्रथम साहब सुरति दियोहै तब कहां दिन रह्योहै कहां राति रही कहां
कृत्रिम जो माया ताकी उत्पत्ति रही है ? न वाके कछु जाति है जो कहिये,
वा ब्रह्ममें है, मायामें है, सत्चित्त है तौ वा एकऊमें नहीं है । न जाति
है वाके एकई साहब हैं दुइ चारि साहब नहीं हैं न वाके दिवस है न राति है
कहै ज्ञान है न अज्ञान है ताते साहबको सांच नाम जपौ ॥ ८ ॥ ९ ॥
इति अट्ठानवे शब्द समाप्त ।
अथ निन्नानबे शब्द ॥ ९९ ॥
अब कहँ चल्यो अकेले मिंता।उठिकिनकरहुघरहुकीचिंता १
खीर खांड़ घृत पिंड समारा।सो तन लै बाहर कै डारा॥२॥
जेहि शिररचिरचिबांध्योपागा।सोशिररतनविदारहिंकागा३
हाड़ जरैं जस लकड़ीझूरी।केश जरैं जस तृणकै कूरी ॥ ४ ॥
आवत संग न जातको साथी। काह भयो दल साजे हाथी ५
मायाको रस लेइ न पाया। अंतर यम बिलार है धाया ६
कहकबीरनरअजहुंनजागा।यमकोमोंगरामधिशिरलागा ७
श्री कबीरजी कहै हैं कि, हे जीवौ ! जैसो या पदमें कहि आये हैं तैसों
तिहारो हवाल ह्वै रह्यो है । जो तुम परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्रको नै जानौगे
तौ तिहारे शिरमें यमको मोगदरलगैगो ॥१॥ ७॥
इति निन्यानबे शब्द समाप्त ।
अथ सौ शब्द ॥ १०० ॥
देखौ लोगो हरिकी सगाई । माय धरै पुत धिय संग जाई १
सासु ननदि मिलि अदल चलाई।मादरिया गृह बेटी जाई २
हम वहनोइ राम मोर सारा । हमहिं वाप हरि पुत्र हमारा ३
कहै कबीर हरीके बूता । राम रमैतैं कुकुरि के पूता ॥ ४ ॥
हे जीवो ! सब संसारकी सगाई न देखो दुःखकै हरैया जे हरि हैं
तिनकी सगाई देखो । अर्थात् साहबमें लागो तो वे संसार दुःख दूरि करि
देहिंगे । जो संसारमें लागोगे तो माई जो माया सो तुमको धरैगी तुम जीवो
वा मायाको पुत्र ह्वै रह्यो है । समष्टि ते व्यष्टि जीव मायाही कैरहै यातै
मायाको माय कह्यो है अब जीवके बुद्धि उत्पन्न होयहै यातै जीवकी धी कहे
कन्या है । सो तैं बुद्धिके संग बिगरि गयो और और में बुद्धि निश्चय कराइ
नरकमें डारि दियो ॥ १ ॥ बुद्धि कर्म की बासना ते उत्पत्ति होय है जौनै
प्रकारकी बासना होय है तैसी बुद्धि होइ है सो बासना जीवकी सासु है औ
जीवकी सुरति बहिनी है काहेते कि, वही सुरति पाइकै जीव चैतन्य भयो है
संसारी भयो है औ वह सुरति जब साहब मुख होइगी तब साहब को पावैगो सो
येई जे हैं बुद्धिकी सासु ननँदि हैं तेई अदल जो हैं हुकुमसो चलाइकै शुद्ध समष्टि
( ४०० ) बीजक कबीरदास !
जीवको संसारमें डारि देइ हैं सो कैसे डारि देइहै सो कहैं हैं जौन बादरको नट
नचावै है सो मादारिया कहावे सो मनहै ताकी बेटी जो है इच्छा सो उत्पन्न भई तब
जीव संसारमें पर्यो ॥२॥ हे जीव! तैं यह विचारु कि, यामें परिकै हम बहनोय
हैं अर्थात् बहन वारे हैं सो बही जायँगे अरु हमारे सार कहे सारांश रामै हैं औ
हमारे बाप रामै हैं औ पुत्र रामै हैं तामें प्रमाण ॥ “रामो माता मत्पिता राम-
चन्द्रः स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः । सर्वस्वं मेरामचन्द्रो दयालुन्नान्यं जाने नैव
जाने न जाने” ॥ तामेंकबीरजीहूकोप्रमाण ॥ “राम हमारे बाप हैं राम हमारे
भ्रात । राम हमारी जाति हैं, राम हमारी पांत”॥ सो यह बिचारिकै श्रीक-
बीरजी कहै हैं कि, हरिके बूता कहे हरिनके बूतते अर्थात् अपने बलते नहीं।
कुकुरी जो माया है ताके पति हे जीवो! सर्व नात रामै सों मानिकै रामैमें रमो
अर्थात् जब तुम साहबके होउगे तब साहब हंस स्वरूप दैके तुमको अपने
धामको बोलाइ लेइँगे ॥ ३ ॥ ४ ॥
इति सवां शब्द समाप्त ।
अथ एकसै एक शब्द ॥ १०१ ॥
देखि देखि जिय अचरज होई । यह पद बूझै विरला कोई १
धरती उलटि अकाशहि जाई । चींटीके मुख हस्ति समाई २
बिन पवनै जहँ पर्वत उड़ै । जीव जंतु सब बिरछा बुड़ै ॥३॥
सूखै सरवर उठै हिलोला।बिनु जल चकवा करै कलोल ॥४॥
बैठा पण्डित पढ़ै पुरान । बिन देखे का करै बखान॥ ५ ॥
कह कबीर जो पद को जान । सोई संत सदा परमान॥६॥
देखि देखि जिय अचरज होई।यह पद बूझै बिरला कोई॥ १॥
धरती उलटि अकाशाहे जाई । चींटीके मुख हस्ति समाई २
शब्द। :(४०१)
श्रीकबीरजी कहै हैं कि मैं तो स्पष्टई कहौहौं पै यह पद जो साकेत लोक
ताको कोई विरला बूझै है सो यह देखि देखि मोको बड़ो आश्चर्य होइ है
॥ १ ॥ जब महाप्रलय होय है तब धरती उलटिकै आकाशको जात रहैहै
कहै पृथ्वी जलमें जल तेजमें तेज वायुमें वायु आकाशमें समाइ जाइहैं अरु
वही जो है आकाश सो अहङ्कारमें समाइ है अरु अहङ्कार महत्तत्त्व में समाइहै
सो महत्तत्त्व मनहै काहेते कि यह सब बिस्तार मनहीं को है सो महत्तत्त्व
जो है आदि कारण मन हाथी सो भगवत् आपना रूप जो है जगतकी मूल-
शक्ति सूक्ष्म चींटी ताके मुख में समाइ है ॥ २ ॥
बिन पवनै जहँ पर्वत उड़ै। जीव जंतु सब बिरछा बुड़ै ३
सो वह साहबकै अज्ञान रूपा मूल प्रकृति लोक प्रकाशमें जो समष्टि जीवहैं
तहां समानी रहै है पृथ्वी आदिक तो समाइ गये हैं उहां पवन नहीं है परन्तु वह
चैतन्याकाश कहे ब्रह्मरूपी आकाश मे अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड जे पर्वत हैं ते
उड़तई रहै हैं अरु वही सरवरमें जीव जन्तु ते सहित जे संसार रूपी वृक्षहैं ते
बूड़ैहैं अर्थात वही ब्रह्ममें सब संसारकी लय होय है ॥ ३ ॥
सूखे सरवर उठै हिलोल। बिनु जल चकवा करै कलोल४
बैठा पण्डित पढ़ै पुरान। बिन देखे का करै बखान ५
वह ब्रह्मतो सूखा सरोवरहै अर्थात् सो ब्रह्म महींहौं यह मानिबो मिथ्या है
लोक प्रकाश ब्रह्म सत्य है तौने के प्रकाश की हिलोर उठै है तहां वाणीरूपी
जल तौ है नहीं औ चकवा जे जीवहैं ते कलोल करै हैं कहै वहैंते पुनि
बाणीको उत्पत्ति करिकै संसारी है जाइहैं ॥ ४ ॥ पण्डित जे हैं ते बैठै
पुराण पढ़ै हैं अरु उत्पत्ति प्रलयको सब बखान करै हैं यह तो नहीं समुझै हैं
कि वह तो बिन देखे का है कहे शून्य है जो हम ज्ञान उपदेश करिकै वहिं
ब्रह्ममें लगावैगे तौ भगवत् अज्ञान रूपी कारणशक्ति तौ उहां बनिही है माया
फेरि न धरि लै आवैगी ॥ ५ ॥
कह कबीर जो पदको जान। सोई संत सदा परमान ६
२६
(४०२) बीजक कबीरदास ।
श्रीकबीरजी कहैं हैं कि जो कोई यह पदको कहै है जौनै को प्रकाश यह
ब्रह्म है ऐसो जो साकेत है तौने पदको कहे स्थान को जो जानै तौ प्रमाणिक
संत वहीहै औ जेहिको प्रकाश या ब्रह्म है तौने धाममें जायकै पुनि नहीं लौटि
आवै है तामें प्रमाण ॥ “न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः । यद्गत्वा
न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम”॥तामें कबीरऊ जीको प्रमाण ॥ “कालहि जीति
हंस लै जाहीं। अविचल देश पुरुष जहँ आहीं ॥ तहां जाय सुख होइ अपारा।
बहुरि न आवै यहि संसारा” ॥ ६ ॥
इति एकसै एक शब्द समाप्त ।
अथ एकसैदो शब्द ॥ १०२ ॥
होदारी! की लैदेउँ तोहिं गारी।तुम समुझु सुपंथ विचारी १॥
घरहूको नाह जो अपना । तिनहूं सों भेट न सपना ॥२॥
ब्राह्मण औ क्षत्री वानी । सो तिनहूं कहल न मानी ॥ ३ ॥
योगी औ जङ्गम जेते । वे आप गये हैं तेते ॥ ४ ॥
कहै कबीर यक योगी । तुम अमी अमी भो भोगी ॥ ५ ॥
होदारी!की लै देउं तोहिंगारी।तुम समुझु सुपंथ विचारी॥१॥
घरहूको नाह जो अपना। तिनहूं सों भेट न सपना ॥२॥
ब्राह्मण औ क्षत्री वानी । सो तिनहूं कहल न मानी ॥३॥
हो दारी कहे बांदी की बच्ची जीवशक्ति तोको गारी देइहौं। तैं यह मायाकी
बच्ची ह्वैकै मायाही में लगि रही है सो यह माया दारी है। जो सबको दरि डारै
सो दारी कहावै है सो तोको दरे डारै है यही के ये पेटते निकसे यहींमें लगे यह
कुपंथ है सो तैं सुपंथ बिचारु ॥१॥ घरके नाह जे परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र
अपना है तासों सपनेहूं नहीं भेट करै है तौ योग ज्ञान उपासनादिकन में जो
नाह वर्णन किये हैं तेतो जारहैं जो तोको मिलिबो करेंगे दश दिनको तौ फेरि
छाँडि देइँगे ॥ २ ॥ जों हमारों कह्यो ब्राह्मण क्षत्री बैश्य न मान्यों जिनको
वेदको अधिकारहै ते वेदको तात्पर्य परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र को न जान्यों
तौ शूद्र अंत्यननकी कहवई कहा करैं ॥ ३ ॥
योगी औ जंगम जेते । वे आपु गये हैं तेते ॥ ४ ॥
कह कबीर एक योगी । तुम भ्रमी भ्रमी भो भोगी ॥५॥
योगी जंगम जेतेहैं ते वही धोखा ब्रह्ममें लगिकै आपने आपने पौ खोइ
दियो ॥ ४ ॥ श्रीकबीरजी कहैहैं कि तुम एकके योगी भयो कि हम आत्माको
एक जोब्रह्महै तामें संयोग करि देइहैं कहै मिलाइ देइहैं सो यह नहीं विचार
करतेहौ कि एक वही ब्रह्म जो जीव होतो तौ वासों भिन्न काहे होतो औ
तुमको मिलाइबेको काहे परतो । जो कहौ यह ब्रह्महीको मायाते भ्रम भयो है
तब नानारूप देखन लग्यो है तौ तुमहीं ब्रह्मको ज्ञानमय कहौहै॥ 'सत्यं ज्ञान
मनंतं' इत्यादि तौ वाको भ्रमहीं कैसे भयो अरु जो मायामें एती सामर्थ्यहै कि
तुमको फोरिकै नाना रूप करि दियो है तौ जब तुम मिलिहू जाउगे तब तुमको
फेरि फोरिकै संसारमें न डारि देइगो का? जनन मरण न छूटैगो ताते तुम फेरि
फेरि यह भवभ्रममें भ्रमि भ्रमिकै भोगी होउगे अर्थात् जब वह ब्रह्ममें लगौगे
फेरि फेरि संसारही में परौगे ॥ ५ ॥
इति एकसै दो शब्द समाप्त ।
अथ एकसै तीन शब्द ॥ १०३ ॥
लोगो तुम्हीं मतिके भीरा ।
ज्यों पानी पानीमें मिलिगो त्यों ढुरिमिल्यहु कबीरा ॥१॥
ज्यों मैथिलको सच्चा बासात्योंहिं मरण होइ मगहर पासर
मगहर मरै मरन नहिं पावै । अंतै मरै तो राम लजावै ॥३॥
मगहर मरै सो गदहा होई । भल परतीति रामसों खोई॥४॥
(४०४) बीजक कबीरदास ।
क्या काशी क्या ऊषर मगहर हृदय राम बस मोरा ।
जो काशी तन तजै कबीरा रामै कौन निहोरा ॥ ५ ॥
लोगो तुम्हीं मतिके भीरा ॥
ज्यों पानी पानीमें मिलिगो त्यों ढुरि मिल्यहु कबीरा ॥ १ ॥
हेलोगो! तुम बड़े मतिके भीरहौ कहे डराकुलहौ काहें ते जोमैं एतौ उपदेश
पशुको करत्यों तौ पशुहू को ज्ञान हैजातो तुम पशुहूते अधिकहौ जैसे पानीमें
पानी मिलि जाइहै ऐसे कबीरजी कहैहैं कि तुमहूं ढुरिकै मिलौ कहे हंसस्वरूपमें
प्राप्त होउ औ साहबके पास जाउ जो कहो पानीमें पानी मिले एकही है जाइहै; तब
एक नहीं है जाइहै काहेते कि लोटा भरे जलमें चुरुवा भरि जल नाइ देइँ तौं
बाढ़ि आवै है जो वही जल होतो तौ बढ़तो कैसे जो कहो समुद्र में तौ नहीं
बढ़े तौ समुद्रोंमें गंगादिक नदी जुदीही रहती हैं देखबेको मिली हैं परन्तु
उनको पारिख मेघ जानै हैं वहांते मीठे जल लैकै वर्षैहैं पुनि जब श्रीरामचन्द्र
समुद्रपर कोपे तब समुद्र आयो है सब नदी चमरछत्र लीन्हे जुदी जुदी आई
हैं औ अबहूं जहाजवारे जे जानै हैं ते मीठा जल समुद्रको पाइ जाइहैं सों
हेकबीरौ ! कायाके बीर जीवौ तुमहूं हंसस्वरूपमें स्थित ह्वै साहब के लोकमें
प्रवेश करि साहबको मिलौजाइ ॥ १ ॥
ज्यों मैथिलको सच्चा बासात्योंहि मरण होय मगहर पास २
मगहर मरै मरण नहिं पावै । अंतै मरै तो राम लजावै ॥ ३ ॥
मगहर मरै सो गदहा होई । भल परतीति रामसों खोई ॥ ४ ॥
जों श्रीरामचन्द्र को जानै तौ जैसे मैथिल कहे मिथिलापुर में मरे मुक्ति
होइहै तैसे मगहरमें मरे मुक्ति होई है ॥ २ ॥ जो मगहरमें मरै तो मरणनहीं
पावै है यह सबकोई कहैहैं कि मगहरमें मरे मुक्ति नहीं होइहै अरुजो अंते मरै
तो श्रीरघुनाथजीको लजावै कि तीर्थकी ओट लै कै मरयो ॥ ३ ॥ सो जाकी
श्रीरामचन्द्रमें परतीति नहीं होयहै सो मगहरमें मरे गदहै होइहै ॥ ४ ॥
शब्द । ( ४०५ )
क्या काशी क्या ऊषर मगहर हृदय राम बस मोरा ।
जो काशी तन तजे कबीरा रामै कौन निहोरा ॥ ५ ॥
जो हृदयमें श्रीरामचन्द्र वास कियेहैं तो क्या श्रीकाशीहै क्या ऊषरहै क्या
मगहरहै जहँ मरै तहँ मुक्ति हैजाइ तौ श्रीकबीरजी कहैहैं कि श्रीरामचन्द्रको
कौन निहोरा तेहिते मैं श्रीरामचन्द्रको निहोरा करिकै मगहर मेंही शरीर
छोड़यो मोको मगहर बाधा न कियो तेहिते हे जीवो ! तुमहूं परम पुरुष पर श्री
रामचन्द्रको हृदयमें धरौगे औ रामनाम जपोगे तौ तुमहूं को कुछ बाधा न रहेगी
जहँ मरौगे तहँ मुक्त हैजाउगे ताते और सब धोखा छोड़िकै परम पुरुष पर श्री
रामचन्द्रको स्मरण करौ मैं अजमाइकै कहौहौं जो कहो अपने शरीर छोड़िये-
की कथा श्रीकबीरजी अपने ग्रन्थमें लिखै हैं यह असम्भव बातहै तौ मगहरमें
जो श्रीकबीरजी शरीर छोडयो तौ अपनी रामोपासकता देखाइबेको मैं किगह-
रमें शरीर छोड़ौहौं कैसे यम मोको गदहा करेंगे औ कैसे मुक्त न होउँगो सो
मगहरमें मैं शरीर छोड़यो यमको कियो कछु न भयो मगहरमें शरीर छोड़ि
मथुरामें जाय रतनाकंडु इनिको उपदेश कियो है पुनि बहुतदिन प्रकट रहे हैं
याते यह देखायो कि नित्य वृन्दावनके रासमें देख्यो जाइ है जहां सब मुक्त
हैकै जाइहैं परम मुक्त है नित्य वृन्दावनके रासमें जायहैं तामें प्रमाण शुकाचार्य
मुक्त है गये हैं तिनसों श्री कृष्णचंद्र की उक्ति ॥ “स चोवाच प्रियारूपं लब्धवंतं
शुकं हरिः । त्वं मे प्रियतमा भद्रे सदा तिष्ठ ममांतिके ॥ इति पद्म पुराणे” ,, ॥
सो सब कथा आपही धर्मदासते निर्भय ज्ञानमें आपनेही मुख कमलते कह्यो
है सो स्पष्टई है ॥ ५ ॥
इति एकसौ तीन शब्द समाप्त ।
अथ एकसौ चार शब्द ॥ १०४ ॥
कैसे कै तरो नाथ कैसे कै तरो
अव बहु कुटिल भरो ॥ १ ॥
कैसी तेरी सेवा पूजा कैसो तेरो ध्यान ।
ऊपर उजर देखो वक अनुमान ॥ २ ॥
( ४०६ ) बीजक कबीरदास ।
भाव तौ भुवंग देखो अति विविचारी ।
सुरति सचान देखो मति तौ मँजारी ॥ ३ ॥
अति तो विरोधी देखो अतिरे दिवाना ।
छौ दरशन देखो भेष लपटाना ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनो नरबन्दा ।
डाइनि डिंभ परे सब फंदा ॥ ५ ॥
अब गोरखनाथ कें मतके जे नाथ कहावै हैं जे अपने इष्ट देवता को
नाथ कहै हैं तिनको कहै हैं कैसे हैं वे कि आप कालते नाथेगये अरु औरऊ को
कालते नथावै हैं जिनको अपने अपने मतमें लै आवै हैं तेऊ कालते नाथे जायँगे
अर्थात् नाथै सोनाथ कहावै अथवा नाथो जाइ सो नाथ कहावै ॥
कैसे कै तरो नाथ कैसे कै तरो, अब बहु कुटिल भरो ॥ १ ॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि हेनाथ ! तुम कैसे मुक्त होउगे गोरखनाथ रहे तेतौ
योगऊ करतेरहे अबतो योगको नामई रहिगयो मुद्रा पहिरिलियो वेश बनाइ
लियो कपरा रँगिकै अरु नाना प्रकारके मंत्रते भैरव भूतको बशि कैकै सिद्धि
देखावन लगे लोगनको ठगन लगे कोई महन्त बनि बैठे कोई राज काज करन
लगे कोई राजाके गुरु ह्वैबैठे सो अब तुम बहुत कुटिलता ते भरेहौ ॥ १ ॥
कैसीतेरीसेवापूजाकैसोतेरोध्यानऊपरउजरदेखोबकअनुमान
तिहारी सेवा पूजा ध्यान करिबौ कैसो है कि ऊपरले तो यह जानि परै है
बड़े पुजेरी हैं बड़े ध्यानी हैं बड़ेयोगी हैं औ भीतर कपट ते भरे हैं जैसे बक उप-
रते उजल रहै है औ भीतर कुटिलईते भरे मछली धरनको ताके रहै है तैसे
भीतर बासना भरी है काहूको धनपावै तौ लैलेइ काहूके लरिकाको देखें
तौ मूंडि लेइ काहू राजा को ठगि जागः पावै तौ लैलेइ जातै हमारी
महंती चलै ॥ २ ॥
भाव तो भुवंग देखो अति विविचारी ।
सुरति सचान देखो मति तौ मँजारी ॥ ३ ॥
शब्द । ( ४०७ )
भाव करिकै तौ भुवंगहै जाको सांप धरै है ताको बिष चढ़ै है मरि जायहै
तैसे जो इनको संग करै हैं ताहूके इनके मतको बिष चढ़ि जाइहै इनके मतनमें
चल्यो सो मारो पर्यो । अरु वे बड़े बिविचारी होत हैं शास्त्रके मतते जो कर्म हैं
ताको छोड़ाइही देइहैं अरु परम पुरुष पर श्री रामचन्द्र को जानतेई नहीं हैं
जाते उद्धार हैजाइ सो कर्मकांडी तो भला कछु स्वर्गको सुख पाइकै संसारमें परै
हैं ये सीधे नरकही को चले जाइहैं सो इनकी सुरति सचान है रही है जैसे सचान
खोजत फिरै है कि जो कौन्यो जीवको पाऊं तौ धरिलेउँ अरु उनकी मति जो है दुर्म-
ति सो मंजारी है रही है जैसे मंजारी खोजत फिरै है कि जो काहू मूसको पाऊं
तौ धरिलेउँ तैसे येऊ खोजत लागै हैं कि काहूको पावैं तौ चेला करिलेइँ
औ धन लैलेइँ जैसे आप नरकमें जाय हैं तैसे चेलोको नरकमें बोरहैं ॥ ३ ॥
अतितौ विरोधी देखो अतिरेदेवाना।छौदर्शन देखो भेष लपटाना४
कहै कबीर सुनौ नरबंदा । डाइन डिंभ परे सब फंदा ॥५॥
योगी जङ्गम सेवरा संन्यासी दरवेश ब्राह्मण तिनसों अति विरोध करैहैं
अरु अपने मतमें अति दिवाने है रहे हैं अर्थात् वही पाखंड मतको सबसे अधिक
मानै हैं सो याही भांति छइउ दर्शनमें देखै हैं कि भेष सबमें लपटान्यो है कुछ
सार पदार्थ नहीं जानै हैं भेष बनाइ लियो योगी जङ्गम सेवरादिक कहावन लगे
॥४॥श्री कबीरजी कहै हैं कि हे नर ! तैंतो परम पुरुष पर श्री रामचन्द्रकों
बंदाहै सो उनको तो ये षट् दर्शनवारे जानै नहीं हैं आपने आपने मतमें डिंभ
किये हैं कि, हमारई मत ठीक है और मत झूठेहैं ॥ ५ ॥
इति एकसौ चार शब्द समाप्त ।
अथ एकसौ पांच शब्द ॥ १०५ ॥
यह भ्रम भूत सकल जग खाया।जिनजिनपूजा तिनजहड़ाया १
अंड न पिंड प्राण नहिं देहा । काटि काटि जियकेतिकयेहा२
बकरी मुर्गी कीन्हो छेहा। अगिल जन्म उन्ह अवसरलेहा ३
कहै कबीर सुनो नर लोई । भुतवा के पूजे भुतवै होई ॥ ४ ॥
( ४०८ ) बीजक कबीरदास ।
दुल्हादेव भैरव भवानी ग्रामदेवता ई सब भ्रमहैं ई सब जगत् को खाये
लेइहैं जिन जिन इनको पूजा है तिनको तिनको जड़ाइबो कहे वह काल देइहै
॥१॥ येई देव तिनके नांड है ना पिंडहै इनको अनेक जीव काटि काटि दियो
सो काह जानिकै दियो तुमको बैकलाइ डारेंगे फल ना देइँगे ॥ २ ॥ बकरी
मुर्गी देकै जो तुम इनको पूजा कीन्हों सोई आगिले जन्म तुम्हारो गर काटेंगे
॥ ३ ॥ सो श्री कबीरजी कहैहैं हे लोगो ! तुम सुनौ ये भूतनको जो तुम पूजौगे
तौ तुमहूं भूत होउगे भूतके पूजेते भूत होइहै तामें प्रमाण ॥ “ यांति देवव्रता
देवान् पितॄन् यांति पितृव्रताः । भूतानि यांति भूतेज्या यांति मद्याजिनोपि
माम् ”॥ इतिगीतायाम् ॥ ४ ॥
इति एकसै पांच शब्द समाप्त ।
अथ एकसै छः शब्द ॥ १०६ ॥
भँवर उड़ै वक बैठे आय। रैनि गई दिवसौ चलि जाय ॥१॥
हल हल कांपै बाला जीव। ना जानै का करिहै पीव ॥ २ ॥
कच्चे वासन टिकै न पानी। उड़िगे हंस काय कुम्हिलानी ३
काग उड़ावत भुजा पिरानी। कह कबीर यह कथा सिरानी ४
भँवर उड़ै वक बैठे आय। रैनि गई दिवसौ चलि जाय॥१॥
हल हल कांपै बालाजीव। ना जानै का करिहै पीव॥ २ ॥
यह जगत्में यह दशा ह्वैगई कि भँवर जेहैं रसिक संत जे परम पुरुष पर
श्री रामचन्द्रके प्रेममें छके रहे हैं ते उड़िगये कहे उठिगये अरु बक जेहैं
गुरुवा लोग ते बैठे आय जैसे बकुला मछरी खायहै तैसे ठगि ठगिकै जीवको
स्वस्वरूप खाइलेइहै कहे भुलाइ देइहै वही ब्रह्ममें लगाइकै ॥ १ ॥ सोयह
जीव तौ बाला स्त्रीकहै परम पुरुष श्री रामचन्द्र की चित्शक्ति है सो ब्रह्म
धोखामें लगिकै हलहल कांपैहै अर्थात मैं आपने स्वामीको भुलायकै धोखा
ब्रह्ममें लग्यों सो हाथ न लग्यो सो ना जानौं खफा ह्वैकै मेरे पीव कहे स्वामी
अब कहा करेंगे ॥ २ ॥
शब्द । (४०९)
कच्चे वासन टिकै न पानी । उड़िगो हंस काय कुम्हिलानी ३
काग उड़ावत भुजा पिरानी। कह कबीर यह कथा सिरानी ४
सो उमिरि तो वह ब्रह्ममें व्यतीत कै दियो औ हाथ कुछ न लग्यो तब
यह बिचार्यो कि मैं अपने स्वामी जे परम पुरुष श्रीरामचंद्र हैं तिनमें लगौं
सो जैसे कच्चे बासनमें पानी धरि देइ तौ बासन कच्चा विगसि जाय है तैसे
यह शरीरतो रहै नहीं है जब हंस उड़िगयो शरीर कुम्हिलाइ गयो कहे छूटिगयों
आव यहहै तब पछितावई हाथ रहि जायहै ॥ ३ ॥ श्री कबीरजी कहै हैं
कि जैसे नारी अपने पतिकें आइबेको भुजाते काग उड़ावै है जब पति नहीं
आवै है तब भुजाको पिरावई रहि जाइ है तैसे ब्रह्म ह्वैबे के लिये उमिरि
बिताइ दियो अहं ब्रह्म अहं ब्रह्म करत करत वह सब कथा सिराइ गई कहे
जिन जिन ब्रह्म भये उनको ब्रह्म न मिल्यो तब मेहनतई हाथ रहि जाइहै जैसे
भूसीके खांड़े कुछ हाथ नहीं लगै है मेहनतई हाथ रहिजाइ है तैसे इनको
बिना परम पुरुष श्रीरामचन्द्रके जाने ब्रह्म ह्वै जाइबो भूसई कैसो खांडिबो है
उहां कुछ हाथ नहीं लगै है तामें प्रमाण ॥ “श्रेयः स्तुतिर्भक्तिमुदस्य ते विभो
क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये ॥ तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद्यथा
स्थूलतुषावघातिनाम्” ॥ १ इतिभागवते ॥ ४ ॥
इति एकसैछः शब्द समाप्त ।
अथ एकसै सात शब्द ॥ १०७॥
खसम बिन तेली के बैलभयो ।
बैठत नाहिं साधुकी संगति नाधे जन्म गयो ॥ १ ॥
बहि बहि मरै पचै निज स्वारथ यमके दण्ड सह्यो ।
धन दारा सुत राज काज हित माथे भार गह्यो ॥ २ ॥
खसमहिं छोड़ि विषयरँग माते पापके बीज वयो ।
झूंठ मुक्ति नर आश जिवनकी प्रेतको जूठ खयो ॥ ३ ॥
( ४१० ) बीजक कबीरदास ।
लख चौरासी जीव योनिमें सायर जात वह्यो ।
कहै कबीर सुनौहो संतौ श्वान कि पूंछ गह्यो ॥ ४ ॥
खसम बिन तेलीके बैलभयो ।
बैठत नाहिं साधुकी संगति नाधे जन्म गयो ॥ १ ॥
बहि बहि मरै पचै निज स्वारथ यमके दंड सह्यो ।
धन दारा सुत राज काज हित माथे भार गह्यो ॥ २ ॥
श्री कबीरजी जीवकों उपदेश करै हैं हे जीव ! तेरे मालिक जे रामचन्द्र हैं
तिनहीं बिना तैं तेलीको बैल भयो जे साधु तेरो स्वरूप बताइदेइँ ऐसे साधु-
नकी सङ्गति में कबौं नहीं बैठै तेलीके बैलकी नाईं नाधे नाधे जन्म व्यतीत
भयो जन्मतै मरत रह्यो ॥ १ ॥ जब कांधे जुवां नाधि जायहै तब निज
तेलीके निमित्त ढोइ ढोइ मरै है जो ना रेंगै तौ तेली डंडा मारै है तैसे यह
जीव धन दारा सुत राज काजके हित नाना कर्म करै है इंद्रियसुख लियेँ
बहि बहि कहे नाना कर्मनको भारा ढोइ होइकै पचै है अरु अंतमें यमदंड
मारै हैं सो सहै है याही रीति जन्म जन्म यमदंड सहौ है ॥ २ ॥
खसमहिं छोड़ि विषय रँग माते पापके वीजवयो ।
झूंठ मुक्ति नर आश जिवनकी प्रेतको जूठ खयो ॥३॥
खसम जे साहब तिनको त्यागि विषय रंगमें मात्यों औ पापकों बीज
बोवत भयो अर्थात् जो नारी अपने खसमको छोड़ि और पुरुषमें लगै है तौ
वाको बड़ो पाप होयहै सोतैं खसमको छोड़िकै नाना देवतनकी उपासनामें लगि
जात भयो मातिगयो सो तैं महापाप के बीजबोयो औ नरन को ज्यावनवारी जौं
मुक्तिकी जो हमको उपास्य देवता प्राप्त होयँगे तौ हम जीतै रहेंगे हमारो
जनन मरण न होयगो सो वह मुक्ति झूठी है जौने शरीरते उनके लोकको
जायगो सो तन नाश ह्वै जाइगो जब फेरि सृष्टि समय होइगो तब वाई देवनकें
साथ फिरि आवैगो जनन मरण न छूटैगो सो ऐसी झूठी मुक्तिके वास्तें
शब्द । ( ४११ )
तें प्रेतनको जूठ खाय है कहे भैरव भूत आदिकन के बलिदान खाय है उनके
दिये तपौना शराब पियै है ॥ ३ ॥
लख चौरासी जीव योनिमें सायर जात वह्यो ।
कहै कबीर सुनौहो संतौ इवान कि पूंछ गह्यो ॥ ४ ॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि हे संतो! जीवौ सुनो तुम परम पुरुष पर जे श्रीरामचन्द्र
हैं ते तुम्हारे रक्षक संसार सागरते पार कै देनवारे जहाज तिनको छोडि श्वान
जे हैं ई सब क्षुद्रदेवता तिनकी पूंछ गहे चौरासी लक्ष योनि समुद्र संसारमें
बहो जाय है सो श्वान की पूंछ गहेते कैसे संसार समुद्रते पार जाउगे ॥ ४ ॥
इति एकसै सात शब्द समाप्त ।
अथ एकसै आठ शब्द ॥ १०८ ॥
अब हमभयलवहिरजलमीना।पुरुवजन्मतपकामदकीना१
तवमैं अच्छलो मनबैरागी।तजलो कुटुम्ब राम रटलागी॥२॥
तजलो काशी भै मतिभोरी।प्राणनाथ कहु का गति मोरी ३
हम चलिगैल तुम्हारे शरणा।कतहुं न देखो हरिको चरणा ४
हमहिं कु सेवक तुमहि अयाना।दुइ महँदोषकाहिभगवाना५
हम चलिगैल तुम्हारे पासा।दास कबिर भल कैलनिरासा ६
श्री कबीरजी कहैं हैं कि, जब मैं साहबके पास गयो तब यह बिनती
कियो कि तबतो संसार के जलकें मीनरहे अब जबते हम संसारके बहिरैं
तिहारे प्रेमजलके मीनभये प्रथम हम पूर्व जन्ममें पंचांगोपासना तपस्या बहुत
करी पुनि जब जन्मलियो तब हम को पूर्वजन्म की सुधि बनीरही वह तप-
स्याको मद कहे अहंकार हमको बहुत रहै सो वही तपस्याके प्रभावते ॥ १ ॥
तब हमको अच्छो मनमें वैराग्य रहै रघुनाथजीमें भक्ति भई तब कुटुम्बकों
छोड़िकै राम राम रट लगावत भयो ॥ २ ॥ तब प्राणनाथ मैं काशी छोड़ि-
दियो औ मेरी मति भोरी भई कहे पूर्वजन्म के तपके मदते निर्गुणरस
( ४१२ ) बीजक कबीरदास ।
रूपा भक्ति मोकों न होत भई केवल ज्ञानै करिकै रामनामकी रटनि लगाइकै
बिचरत भयों कि, मिलिही जायँगे तब हे प्राणनाथ! मेरी कहा गति होत भई
सों कहौहौं ॥ ३ ॥ हम तुम्हारे शरण तो चलिगये कहे तुम्हारे नाममें रट
लगावत भयो पै तुम्हारे चरणन को न देखत भयो अर्थात् दर्शन न पायौं
॥ ४ ॥ सो हे भगवन्! षट् ऐश्वर्य संपन्न धौं हमहीं कुसेवक रहे जो तिहारों
दर्शन न पायो धौं तुम्हीं अयान रहे हमको न जानत रहे जो हमको नहीं
मिले दुइमें काको दोष है ॥ ५ ॥ अब दास कबीर जो मैंहों ताको भली
भांतिते जब निराश करि दियो कि, कौनेउ भांतिकी जब आश न रहिगई न
ज्ञान करिकै न योग करिकै न भक्ति करिकै केवल सुधारसरूपा निर्गुणा
भक्ति जब मोको दियों तब हम तुम्हारे पास चलि आये याते कबीरजी या
देखायो कि, जब सब बातते निराश है जाय हैं तब साहबके पास जाइहैं॥६॥
इति एकसै आठ शब्द समाप्त ।
अथ एकसै नव शब्द ॥ १०९ ॥
लोग बोलैं दुरिगये कबीरा।या मत कोइ कोई जानैं धीर॥१॥
दशरथ सुत तिहुं लोकहि जाना। राम नामको मर्म आना २
जेहि जिय जानि परा जस लेखा।रजु को कहै उरग जोपेखा३
यद्यपि फल उत्तमगुण जाना।हरीहत्यागिमनमुक्तिनमाना४
हरि अधार जस मीनहिं नीरा।औरयतनकछुकहहिंकबीरा५
लोग बोलैं दुरि गये कबीरा । या मत कोइ कोई जानैं धीरा १
श्री कबीरजी कहै हैं कि, सब लोग बोलै हैं कि, कबीर बहुत दूरि गये
बहुत पहुंचे हैं सो या मत कोई जे धीरे धीरे साधनमें कियनमें समुझनमें
अभ्यास करै हैं सो जानै हैं कौन मत सो आगे कहै हैं ॥ १ ॥
दशरथ सुत तिहुं लोकहि जाना।राम नामको मर्म आना२॥
शब्द । (४१३)
सो दशरथसुतको तौ तीनौलोक जानैहैं पै रामनामको मर्म कोउ कोउ जानैहैं
अर्थात् कबहूं दशरथ सुत कबहूं नारायण कबहूं व्यापक ब्रह्मही अवतार लेइ
हैं नित्य साकेत विहारी परम पुरुष पर जे श्रीरामचन्द्रहैं जिनके नामते ब्रह्म ईश्वर
वेद शास्त्र सब निकसै हैं तौने रामनामको तौ मर्म आनहै ॥ २ ॥
जेहि जिय जानि परा जस लेख्वा। रजुको कहै उरगको पेखा ३
यद्यपि फलउत्तमगुणजाना। हरिहित्यागिमनमुक्ति न माना४
जाको यह रामनाम जैसो जानि पर्यो है सो तैसे लेख्यो है कोई रघुनाथ-
जी को दशरथके पुत्र मानै है कोई नारायण को अवतार मानै है कोई ब्रह्मको
अवतार मानै है तिन्हीं को नाम रामनाम मानैहै सो जैसे रसरीको उरग
कहै हैं बिना समुझे ऐसे रामनाम जो साहबको है सो भ्रम छोड़िकै बिचारै तौ
तौ साहिबको बोध करैहैं ॥ ३ ॥ सो यद्यपि उत्तम गुण जानेके फल होयहै
कि विष्णु लोक प्राप्तभये परन्तु परम पुरुषपर जे श्रीरामचन्द्र तिनके पास
भये बिना हम मुक्ति नहीं मानै हैं ॥ ४ ॥
हरिअधारजसमीनहिंनीरा।औरयतनकछुकहैकबीरा ॥५॥
सो जैसे मीनको आधार अंबुहै बिना जल मीन नहीं रहि सकै है तैसे
श्रीरामचन्द्र सबके आधारहैं सो तिन्हीं को जो आधार मानै तो जैसे मीन
सर्वत्र जलही देखै है द्विभुजरूप श्रीरामचन्द्रको सर्वत्र देखै औ उनहींमें रहै तौ
श्री कबीरजी कहैंहैं कि और यतन सब थोरई है तामें प्रमाण श्री गोसाईंजी कों
॥ दोहा ॥ “ सो अनन्य अस जाहिके, मति न टरै हनुमन्त । मैं सेवक सचरा-
चर, रूप राशि भगवंत ” ॥ १ ॥ तामें प्रमाण कबीरजीको ॥ “ नैनन आगे
ख्याल घनेरा । अरध उरध बिच लगन लगी है क्या संध्या क्या रैनि सबेरा ।
जेहि कारण जग भरमत डोलै सो साहब घट लिया बसेरा । पूरी रह्यो अस-
मान धरणिमें जितदेखो तित साहब मेरा । तसबी एक दियो मेरे साहब कह
कबीर दिलही बिच फेरा ” ॥ ५ ॥
इति एकसै नव शब्द समाप्त ।
( ४१४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ एकसै दश शब्द ॥ ११० ॥
अपनो कर्म न मेटो जाई ।
कर्म लिखा मिटै धौं कैसे जो युग कोटि सिराई॥ १ ॥
गुरु वशिष्ठ मिलि लगन शोधाई सूर्य मंत्र यक दीन्हा।
जो सीता रघुनाथ विआही पल यक संच न कीन्हा २
नारद मुनिको बदन छपायो कीन्हो कपिसों रूपा।
शिशुपालहुके भुजा उपारे आपुन बौद्ध स्वरूपा ॥३ ॥
तीनि लोकके करता कहिये वालि बध्यो बरियाई ।
एक समय ऐसी बनि आई उनहूँ अवसर पाई॥४॥
पार्वती को बांझ न कहिये ईश न कहिय भिखारी ।
कह कबीर करता की वातैं कर्मकि बात निनारी ॥५॥
श्रीमन्नारायण वैकुण्ठते केतन्यो अवतार लियो तेऊ कर्मकी मर्यादा राखिबोई
कियो सो जे साहब उत्पत्ति पालन संहार करै हैं तेतो कर्मकी मर्यादा राखि-
बोई कियो और की कहा गतिहै सो बिना परमपुरुषपर श्रीरामचन्द्रके नामलि-
ये कर्मकीगतिकाहूकी मेटी नहीं मेटि जाइहै श्री रामनामते कर्मकी गति मिटि
जाइहै साहब मेटि देइहै तामें दोउ प्रमाण॥ “राम नाम मणि विषय ब्यालके।
मेटत कठिन कुअंक भालके” ॥१॥ “सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माशुच”इतिगीतायां॥ “सकृदेवप्रपन्नायतवास्मी-
तिच याचते।अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम”॥इति रामायणे॥औ कबीरजी
ऊकौ प्रमाण ॥ “पहिले बुरा कमाइकै, बांधी विषकै मोट । कोटि कर्म मिट
पलकमैं, आवै हरिकी ओट ॥ ” और और पदको अर्थ स्पष्टै है ॥ १–५ ॥
इति एकसै दश शब्द समाप्त ।
शब्द । (४१५)
अथ एकसै ग्यारह शब्द ॥ १११ ॥
है कोई पंडित गुरुज्ञानी उलटि वेदको बूझै ।
पानीमें पावक जरै अंधे आंखी सूझै ॥ १ ॥
गैयातो नाहरको खायो हरिना खायो चीता ।
कागा लगरै फांदिकै बटेरन वाजै जीता ॥ २ ॥
मूसा तो मंजारै खायो स्यारै खायो श्वाना ।
आदिके उपदेश जानै तासु बेसै बाना ॥ ३ ॥
एकै तो दादुर सो खायो पांचौ जे भूवंगा ।
कहै कबीर पुकारिकै हैं दोऊ यक संगा ॥ ४ ॥
हैं कोई गुरु ज्ञानी पंडित उलटि वेदको बूझै ।
पानीमें पावक जरै अंधे आंखी सूझै ॥ १ ॥
ऐसो गुरुज्ञानी पंडित कोई नहीं है जो उलटिकै वेदको अर्थ बूझै अर्थात
गायत्रीते वेद भयो है प्रणवते गायत्री भई है प्रणव राम नामते उत्पन्न भयो है
सो कहैंहैं पानी जो है बानी तामें पावक जरैहै कहे ब्रह्माग्नि बीज रामनामहै सो
सर्वत्र पूर्ण है सो अंधेके आंखीमें कैसे सूझै उलटिकै वेदको बूझै तौ जानै कि
सबको मूल रामनामहै ॥ १ ॥
गैया तो नाहर को खायो हरिना खायो चीता ।
कागा लगरै फांदिकै बटेरन वाज जीता ॥ २ ॥
गैया जो गायत्री तौनेके नाना अर्थ करि कहीं सूर्यमें लगावैंहैं कहीं ब्रह्ममें
लगावैं हैं सोई अर्थ जो गैया सो सांच गायत्रीको तात्पर्यार्थ साहब तिनको ज्ञान
जो नाहर ताको खायलियो औ हरिनाजो अद्वैत ज्ञान कि हरिनहीं है प्रणवको
अर्थकियो कि जीव नहीं है एक ब्रह्मही है सो मैं हौं या जो हरिना सो साहबकों