सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 452

(४०४) बीजक कबीरदास ।
क्या काशी क्या ऊषर मगहर हृदय राम बस मोरा ।
जो काशी तन तजै कबीरा रामै कौन निहोरा ॥ ५ ॥
लोगो तुम्हीं मतिके भीरा ॥
ज्यों पानी पानीमें मिलिगो त्यों ढुरि मिल्यहु कबीरा ॥ १ ॥
हेलोगो! तुम बड़े मतिके भीरहौ कहे डराकुलहौ काहें ते जोमैं एतौ उपदेश
पशुको करत्यों तौ पशुहू को ज्ञान हैजातो तुम पशुहूते अधिकहौ जैसे पानीमें
पानी मिलि जाइहै ऐसे कबीरजी कहैहैं कि तुमहूं ढुरिकै मिलौ कहे हंसस्वरूपमें
प्राप्त होउ औ साहबके पास जाउ जो कहो पानीमें पानी मिले एकही है जाइहै; तब
एक नहीं है जाइहै काहेते कि लोटा भरे जलमें चुरुवा भरि जल नाइ देइँ तौं
बाढ़ि आवै है जो वही जल होतो तौ बढ़तो कैसे जो कहो समुद्र में तौ नहीं
बढ़े तौ समुद्रोंमें गंगादिक नदी जुदीही रहती हैं देखबेको मिली हैं परन्तु
उनको पारिख मेघ जानै हैं वहांते मीठे जल लैकै वर्षैहैं पुनि जब श्रीरामचन्द्र
समुद्रपर कोपे तब समुद्र आयो है सब नदी चमरछत्र लीन्हे जुदी जुदी आई
हैं औ अबहूं जहाजवारे जे जानै हैं ते मीठा जल समुद्रको पाइ जाइहैं सों
हेकबीरौ ! कायाके बीर जीवौ तुमहूं हंसस्वरूपमें स्थित ह्वै साहब के लोकमें
प्रवेश करि साहबको मिलौजाइ ॥ १ ॥
ज्यों मैथिलको सच्चा बासात्योंहि मरण होय मगहर पास २
मगहर मरै मरण नहिं पावै । अंतै मरै तो राम लजावै ॥ ३ ॥
मगहर मरै सो गदहा होई । भल परतीति रामसों खोई ॥ ४ ॥
जों श्रीरामचन्द्र को जानै तौ जैसे मैथिल कहे मिथिलापुर में मरे मुक्ति
होइहै तैसे मगहरमें मरे मुक्ति होई है ॥ २ ॥ जो मगहरमें मरै तो मरणनहीं
पावै है यह सबकोई कहैहैं कि मगहरमें मरे मुक्ति नहीं होइहै अरुजो अंते मरै
तो श्रीरघुनाथजीको लजावै कि तीर्थकी ओट लै कै मरयो ॥ ३ ॥ सो जाकी
श्रीरामचन्द्रमें परतीति नहीं होयहै सो मगहरमें मरे गदहै होइहै ॥ ४ ॥