कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४०० ) बीजक कबीरदास !
जीवको संसारमें डारि देइ हैं सो कैसे डारि देइहै सो कहैं हैं जौन बादरको नट
नचावै है सो मादारिया कहावे सो मनहै ताकी बेटी जो है इच्छा सो उत्पन्न भई तब
जीव संसारमें पर्यो ॥२॥ हे जीव! तैं यह विचारु कि, यामें परिकै हम बहनोय
हैं अर्थात् बहन वारे हैं सो बही जायँगे अरु हमारे सार कहे सारांश रामै हैं औ
हमारे बाप रामै हैं औ पुत्र रामै हैं तामें प्रमाण ॥ “रामो माता मत्पिता राम-
चन्द्रः स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः । सर्वस्वं मेरामचन्द्रो दयालुन्नान्यं जाने नैव
जाने न जाने” ॥ तामेंकबीरजीहूकोप्रमाण ॥ “राम हमारे बाप हैं राम हमारे
भ्रात । राम हमारी जाति हैं, राम हमारी पांत”॥ सो यह बिचारिकै श्रीक-
बीरजी कहै हैं कि, हरिके बूता कहे हरिनके बूतते अर्थात् अपने बलते नहीं।
कुकुरी जो माया है ताके पति हे जीवो! सर्व नात रामै सों मानिकै रामैमें रमो
अर्थात् जब तुम साहबके होउगे तब साहब हंस स्वरूप दैके तुमको अपने
धामको बोलाइ लेइँगे ॥ ३ ॥ ४ ॥
इति सवां शब्द समाप्त ।
अथ एकसै एक शब्द ॥ १०१ ॥
देखि देखि जिय अचरज होई । यह पद बूझै विरला कोई १
धरती उलटि अकाशहि जाई । चींटीके मुख हस्ति समाई २
बिन पवनै जहँ पर्वत उड़ै । जीव जंतु सब बिरछा बुड़ै ॥३॥
सूखै सरवर उठै हिलोला।बिनु जल चकवा करै कलोल ॥४॥
बैठा पण्डित पढ़ै पुरान । बिन देखे का करै बखान॥ ५ ॥
कह कबीर जो पद को जान । सोई संत सदा परमान॥६॥
देखि देखि जिय अचरज होई।यह पद बूझै बिरला कोई॥ १॥
धरती उलटि अकाशाहे जाई । चींटीके मुख हस्ति समाई २