कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछाँडि देइँगे ॥ २ ॥ जों हमारों कह्यो ब्राह्मण क्षत्री बैश्य न मान्यों जिनको
वेदको अधिकारहै ते वेदको तात्पर्य परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र को न जान्यों
तौ शूद्र अंत्यननकी कहवई कहा करैं ॥ ३ ॥
योगी औ जंगम जेते । वे आपु गये हैं तेते ॥ ४ ॥
कह कबीर एक योगी । तुम भ्रमी भ्रमी भो भोगी ॥५॥
योगी जंगम जेतेहैं ते वही धोखा ब्रह्ममें लगिकै आपने आपने पौ खोइ
दियो ॥ ४ ॥ श्रीकबीरजी कहैहैं कि तुम एकके योगी भयो कि हम आत्माको
एक जोब्रह्महै तामें संयोग करि देइहैं कहै मिलाइ देइहैं सो यह नहीं विचार
करतेहौ कि एक वही ब्रह्म जो जीव होतो तौ वासों भिन्न काहे होतो औ
तुमको मिलाइबेको काहे परतो । जो कहौ यह ब्रह्महीको मायाते भ्रम भयो है
तब नानारूप देखन लग्यो है तौ तुमहीं ब्रह्मको ज्ञानमय कहौहै॥ 'सत्यं ज्ञान
मनंतं' इत्यादि तौ वाको भ्रमहीं कैसे भयो अरु जो मायामें एती सामर्थ्यहै कि
तुमको फोरिकै नाना रूप करि दियो है तौ जब तुम मिलिहू जाउगे तब तुमको
फेरि फोरिकै संसारमें न डारि देइगो का? जनन मरण न छूटैगो ताते तुम फेरि
फेरि यह भवभ्रममें भ्रमि भ्रमिकै भोगी होउगे अर्थात् जब वह ब्रह्ममें लगौगे
फेरि फेरि संसारही में परौगे ॥ ५ ॥
इति एकसै दो शब्द समाप्त ।
अथ एकसै तीन शब्द ॥ १०३ ॥
लोगो तुम्हीं मतिके भीरा ।
ज्यों पानी पानीमें मिलिगो त्यों ढुरिमिल्यहु कबीरा ॥१॥
ज्यों मैथिलको सच्चा बासात्योंहिं मरण होइ मगहर पासर
मगहर मरै मरन नहिं पावै । अंतै मरै तो राम लजावै ॥३॥
मगहर मरै सो गदहा होई । भल परतीति रामसों खोई॥४॥