कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४०६ ) बीजक कबीरदास ।
भाव तौ भुवंग देखो अति विविचारी ।
सुरति सचान देखो मति तौ मँजारी ॥ ३ ॥
अति तो विरोधी देखो अतिरे दिवाना ।
छौ दरशन देखो भेष लपटाना ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनो नरबन्दा ।
डाइनि डिंभ परे सब फंदा ॥ ५ ॥
अब गोरखनाथ कें मतके जे नाथ कहावै हैं जे अपने इष्ट देवता को
नाथ कहै हैं तिनको कहै हैं कैसे हैं वे कि आप कालते नाथेगये अरु औरऊ को
कालते नथावै हैं जिनको अपने अपने मतमें लै आवै हैं तेऊ कालते नाथे जायँगे
अर्थात् नाथै सोनाथ कहावै अथवा नाथो जाइ सो नाथ कहावै ॥
कैसे कै तरो नाथ कैसे कै तरो, अब बहु कुटिल भरो ॥ १ ॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि हेनाथ ! तुम कैसे मुक्त होउगे गोरखनाथ रहे तेतौ
योगऊ करतेरहे अबतो योगको नामई रहिगयो मुद्रा पहिरिलियो वेश बनाइ
लियो कपरा रँगिकै अरु नाना प्रकारके मंत्रते भैरव भूतको बशि कैकै सिद्धि
देखावन लगे लोगनको ठगन लगे कोई महन्त बनि बैठे कोई राज काज करन
लगे कोई राजाके गुरु ह्वैबैठे सो अब तुम बहुत कुटिलता ते भरेहौ ॥ १ ॥
कैसीतेरीसेवापूजाकैसोतेरोध्यानऊपरउजरदेखोबकअनुमान
तिहारी सेवा पूजा ध्यान करिबौ कैसो है कि ऊपरले तो यह जानि परै है
बड़े पुजेरी हैं बड़े ध्यानी हैं बड़ेयोगी हैं औ भीतर कपट ते भरे हैं जैसे बक उप-
रते उजल रहै है औ भीतर कुटिलईते भरे मछली धरनको ताके रहै है तैसे
भीतर बासना भरी है काहूको धनपावै तौ लैलेइ काहूके लरिकाको देखें
तौ मूंडि लेइ काहू राजा को ठगि जागः पावै तौ लैलेइ जातै हमारी
महंती चलै ॥ २ ॥
भाव तो भुवंग देखो अति विविचारी ।
सुरति सचान देखो मति तौ मँजारी ॥ ३ ॥