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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 446

( ३९८ ) बीजक कबीरदास ।
जिन दुनियामें रची मसीद । झूठी रोजा झूठी ईद ॥ ४ ॥
सांच एक अल्ल़ाःको नामा।ताको नय नय करो सलाम॥५॥
कहुधौं भिश्त कहाँते आई।किसके कहे तुम छुरी चलाई६॥
अरु जीव जिन संसार में मसीद जो मसजिद शरीर रच्योहै ते कतरौ
नहीं रहे ॥४ ॥ सांच एक मन बचनके परे अल्ल़ाःको नामहै ताको नय नयकै
सलाम करो और सब झूठा है जिसकें बनाये भिश्त भईहै तेऊ वही नामते
प्रकट भये हैं तुम किसके कहे जीव मारते हौ ई सब झूठे हैं ॥५॥ ६ ॥
करता किरतिम बाजी लाई । हिंदु तुरुक दुइ राह चलाई७
कहँ तवदिवस कहाँ तब राती।कहँतबकिरतिमकीउतपाती८
नहिंवाकेजातिनहींवाकेपांती।कहै कबीर वाके दिवस न राती९
सो कर्ता कै कृत्रिम जो माया है सो बाजी लगायकै दुइ राह चलाईहै॥७॥
जब प्रथम साहब सुरति दियोहै तब कहां दिन रह्योहै कहां राति रही कहां
कृत्रिम जो माया ताकी उत्पत्ति रही है ? न वाके कछु जाति है जो कहिये,
वा ब्रह्ममें है, मायामें है, सत्चित्त है तौ वा एकऊमें नहीं है । न जाति
है वाके एकई साहब हैं दुइ चारि साहब नहीं हैं न वाके दिवस है न राति है
कहै ज्ञान है न अज्ञान है ताते साहबको सांच नाम जपौ ॥ ८ ॥ ९ ॥
इति अट्ठानवे शब्द समाप्त ।
अथ निन्नानबे शब्द ॥ ९९ ॥
अब कहँ चल्यो अकेले मिंता।उठिकिनकरहुघरहुकीचिंता १
खीर खांड़ घृत पिंड समारा।सो तन लै बाहर कै डारा॥२॥
जेहि शिररचिरचिबांध्योपागा।सोशिररतनविदारहिंकागा३
हाड़ जरैं जस लकड़ीझूरी।केश जरैं जस तृणकै कूरी ॥ ४ ॥