कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । (४०९)
कच्चे वासन टिकै न पानी । उड़िगो हंस काय कुम्हिलानी ३
काग उड़ावत भुजा पिरानी। कह कबीर यह कथा सिरानी ४
सो उमिरि तो वह ब्रह्ममें व्यतीत कै दियो औ हाथ कुछ न लग्यो तब
यह बिचार्यो कि मैं अपने स्वामी जे परम पुरुष श्रीरामचंद्र हैं तिनमें लगौं
सो जैसे कच्चे बासनमें पानी धरि देइ तौ बासन कच्चा विगसि जाय है तैसे
यह शरीरतो रहै नहीं है जब हंस उड़िगयो शरीर कुम्हिलाइ गयो कहे छूटिगयों
आव यहहै तब पछितावई हाथ रहि जायहै ॥ ३ ॥ श्री कबीरजी कहै हैं
कि जैसे नारी अपने पतिकें आइबेको भुजाते काग उड़ावै है जब पति नहीं
आवै है तब भुजाको पिरावई रहि जाइ है तैसे ब्रह्म ह्वैबे के लिये उमिरि
बिताइ दियो अहं ब्रह्म अहं ब्रह्म करत करत वह सब कथा सिराइ गई कहे
जिन जिन ब्रह्म भये उनको ब्रह्म न मिल्यो तब मेहनतई हाथ रहि जाइहै जैसे
भूसीके खांड़े कुछ हाथ नहीं लगै है मेहनतई हाथ रहिजाइ है तैसे इनको
बिना परम पुरुष श्रीरामचन्द्रके जाने ब्रह्म ह्वै जाइबो भूसई कैसो खांडिबो है
उहां कुछ हाथ नहीं लगै है तामें प्रमाण ॥ “श्रेयः स्तुतिर्भक्तिमुदस्य ते विभो
क्लिश्यन्ति ये केवलबोधलब्धये ॥ तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते नान्यद्यथा
स्थूलतुषावघातिनाम्” ॥ १ इतिभागवते ॥ ४ ॥
इति एकसैछः शब्द समाप्त ।
अथ एकसै सात शब्द ॥ १०७॥
खसम बिन तेली के बैलभयो ।
बैठत नाहिं साधुकी संगति नाधे जन्म गयो ॥ १ ॥
बहि बहि मरै पचै निज स्वारथ यमके दण्ड सह्यो ।
धन दारा सुत राज काज हित माथे भार गह्यो ॥ २ ॥
खसमहिं छोड़ि विषयरँग माते पापके बीज वयो ।
झूंठ मुक्ति नर आश जिवनकी प्रेतको जूठ खयो ॥ ३ ॥