कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( ४०७ )
भाव करिकै तौ भुवंगहै जाको सांप धरै है ताको बिष चढ़ै है मरि जायहै
तैसे जो इनको संग करै हैं ताहूके इनके मतको बिष चढ़ि जाइहै इनके मतनमें
चल्यो सो मारो पर्यो । अरु वे बड़े बिविचारी होत हैं शास्त्रके मतते जो कर्म हैं
ताको छोड़ाइही देइहैं अरु परम पुरुष पर श्री रामचन्द्र को जानतेई नहीं हैं
जाते उद्धार हैजाइ सो कर्मकांडी तो भला कछु स्वर्गको सुख पाइकै संसारमें परै
हैं ये सीधे नरकही को चले जाइहैं सो इनकी सुरति सचान है रही है जैसे सचान
खोजत फिरै है कि जो कौन्यो जीवको पाऊं तौ धरिलेउँ अरु उनकी मति जो है दुर्म-
ति सो मंजारी है रही है जैसे मंजारी खोजत फिरै है कि जो काहू मूसको पाऊं
तौ धरिलेउँ तैसे येऊ खोजत लागै हैं कि काहूको पावैं तौ चेला करिलेइँ
औ धन लैलेइँ जैसे आप नरकमें जाय हैं तैसे चेलोको नरकमें बोरहैं ॥ ३ ॥
अतितौ विरोधी देखो अतिरेदेवाना।छौदर्शन देखो भेष लपटाना४
कहै कबीर सुनौ नरबंदा । डाइन डिंभ परे सब फंदा ॥५॥
योगी जङ्गम सेवरा संन्यासी दरवेश ब्राह्मण तिनसों अति विरोध करैहैं
अरु अपने मतमें अति दिवाने है रहे हैं अर्थात् वही पाखंड मतको सबसे अधिक
मानै हैं सो याही भांति छइउ दर्शनमें देखै हैं कि भेष सबमें लपटान्यो है कुछ
सार पदार्थ नहीं जानै हैं भेष बनाइ लियो योगी जङ्गम सेवरादिक कहावन लगे
॥४॥श्री कबीरजी कहै हैं कि हे नर ! तैंतो परम पुरुष पर श्री रामचन्द्रकों
बंदाहै सो उनको तो ये षट् दर्शनवारे जानै नहीं हैं आपने आपने मतमें डिंभ
किये हैं कि, हमारई मत ठीक है और मत झूठेहैं ॥ ५ ॥
इति एकसौ चार शब्द समाप्त ।
अथ एकसौ पांच शब्द ॥ १०५ ॥
यह भ्रम भूत सकल जग खाया।जिनजिनपूजा तिनजहड़ाया १
अंड न पिंड प्राण नहिं देहा । काटि काटि जियकेतिकयेहा२
बकरी मुर्गी कीन्हो छेहा। अगिल जन्म उन्ह अवसरलेहा ३
कहै कबीर सुनो नर लोई । भुतवा के पूजे भुतवै होई ॥ ४ ॥