कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
शब्द । ( ३७५ )
ये चारि तुकनमें जिनको कहि आये हैं तिनको काल जब खाइ लियो है कहै
इनके शरीर जब छूटि गये हैं तब ये कहां बास कियो है यह कोई खबरि न
जानतभयो सो जहां गये हैं अरु जहांके गये नहीं आवैहैं तौने लोकको मूढ़जीव न
जानतभये इहां नरसिंहौ जीकौ लिख्यो तामें:धुनि यहहै कि उपासक आपने आपनें
उपास्यनके साथ साहबही के लोक जाइ हैं उपास्य उपासक दोऊ जहां परम
मुक्तावस्था में जायँसो वह साहब के लोकको ये बद्धविषयी जीव कैसे जानैं ॥ ६ ॥
चौपर खेल होत घट भीतर जन्मके पांसा ढारा ।
दम दमकी कोई खबरि न जानै करि न सकै निरुवारा॥७॥
मन बुद्धि चित्त अहंकार ये अंतःकरण चतुष्टय हैं सोई चौपरि है ताको खेल
घटके भीतर है रह्योहै इनहींके योगते नाना जन्म होइहैं सोई पांसा ढारिबो है
सो दम दम कहे आपने श्वास श्वासकी खबरि तौ कोई जानै नहीं है कि
आवत जातमें रकार मकार बिना जपे कब अंतःकरण शुद्ध हैसकैहै अरु कौं
निरुवार कारिसकै है अर्थात् कोई निरुवार नहीं करिसकै है अर्थात् या नहीं
जानैहै कि हमारो जीवात्मा कहां जैपैहै रकार मकार जीवात्मा सदा जैपैहै
तामें "प्रमाण रकारेण बहिर्याति मकारेण विशेत्पुनः । राम रामेति वै मंत्रं जीवौ
जपति सर्वदा" ॥ ७॥
चारि दिशा महि मंड रचो है रूम साम बिच दिल्ली ।
ता ऊपर कुछ अजब तमाशा मारे है यम किल्ली ॥ ८ ॥
महिमंडल जोहै शरीर तामें नाभि हृदय कंठ त्रिकुटी ये चारि दिशा रचत
भये अरु रूमकहे सहस्रदल कमलहै अरुसाम सुरति कमल है तौ ने सुरति कसलकें
बीचमें दिल्ली है परंतु गुरुको स्थान तास्थानके ऊपर अजब तमाशाहै । सो कौन
योगी प्राण चढ़ाइके सहस्र दल कमलों जाइहै कोई परम योगी प्राण चढ़ाइकै
सुरति कमलों जाइहै परमपुरुष स्थानके ऊपर जहां अजब तमाशाहै तहां
कोई नहीं जाइ सकैहै काहेते कि यमकिल्ली मारे है कहे दशवां दुवार बंद कियेहैं
अजब तमाशा वह कैसे देखै सो कहैहैं कि यह ब्रह्म रंध्रते साकेत लोक जाको कहै
हैं परमपुरुषपर श्रीरामचन्द्रको धाम वही साकेत लोकको दशवां स्थान फकीर
( ३७६ ) बीजक कबीरदास ।
लोग जाहूत कहे हैं। तहांलों ब्रह्म ज्योतिकी डोरी लगी है वही डोरीकों मक्र-
तार कहैहैं सो वह मक्रतार सुषुम्णामें लगोहै जब परमगुरु रामनाम बताई है
तब बही सुषुम्णा हैकै मक्रतारकी डोरी हैकै साहब के लोक जाय है तहां-
अजब तमाशा कौनहै कि उहांके त्रिगुण गुल्म लता देखे तो पांचभौतिकं से
परेहै पै पांचभौतिक नहीं है आनंदरूप है ॥ ८ ॥
सब अवतार जासु महि मंडल अनँत खड़ो कर जोरे ।
अद्भुत अगम अथाह रचो है ई सब शोभा तोरे ॥ ६ ॥
सकल अवतार औ ईश्वर अनंत जिनके आगे कर जोड़े खड़े हैं वह साहब
लोक कैसो है अद्भुतहै कहे आश्चर्य है बचनमें नहीं आवै है औ अगमहै कहे
उहां काहूकी गम नहीं है औ अथाह है कोई बर्णन करिकै थाह नहीं पायो कि
यतनैहै सो हे जीव! यह सब शोभा तोरे साहबकी है तेरे देखिबे योग्यहै काहेते
कि साहबौ द्विभुजहै औ तैंहूं द्विभुजहै और तो सब ईश्वर अवतार कोई अष्टभुज
कोई चतुर्भुज मत्स्य कूर्म इत्यादिक हैं अथवा साहबके लोकमें जे ईश्वर अव-
तार आदिक हैं ते सब अपनी शोभाको मंडल तोरे हैं अर्थात् उनकी शोभा
साहबकी शोभाते मंद देखि परैहै ॥ ६ ॥
सकल कबीरा बोलै वीरा अजहूं हो हुशियारा ।
कह कबीर गुरु सिकिली दर्पण हरदम करो पुकारा ॥१०॥
हे सब कबीरौ! कायाके बीर जीवौ वही बीरा लेऊ अर्थात् परम पुरुष पर
जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको बीरालेउ अजहूं हुशियार होऊ जे मतनमें गुरुवा
लोग समुझाइ समुझाइ लगाइ दिये हैं तिन मतनमें जब भर तुम रहौगे तब
भर तुम्हारो जन्म मरण न छूटैगो ताते मतनको छोड़िदे सुरति कमलमें जेपरम
गुरुहैं ते सिकिलीगरहैं तुम्हारे अंतःकरण साफ करिबेको ते राम बतावै
हैं सो वा राम नाम सुनिकै हरदम पुकार करो तब साहबके इहां पहुंचौ
अरु सब अवतार ईश्वर उनके द्वारे हाथ जोरे खड़े हैं तामें प्रमाण शिवसंहि-
तामें हनुमान्जी प्रति अगस्त्यजी कहै हैं ॥ “आसीनं तमयोध्यायां सहस्र-
स्तम्भमंडिते । मंडपे रत्नसंज्ञे च जानक्या सह राघवम् ॥ मत्स्यःकूर्मःकिरि-
शब्द । ( ३७७ )
नैको नारसिंहोऽप्यनेकधा । वैकुंठोऽपि हयग्रीवो हरिः केशववामनौ ॥ यज्ञो नारा-
यणो धर्मपुत्रो नरवरोऽपिच । देवकीनंदनःकृष्णो वासुदेवो बलोऽपिच ॥ पृष्णि-
गर्भो मधून्मथी गोविंदो माधवोऽपिच । वासुदेवो मरोऽनंतःसंकर्षण इरापतिः॥
प्रद्युम्नोऽप्यनुरुद्धश्च व्यूहास्सर्वेऽपि सर्वदा । रामं सदोपतिष्ठन्ते रामदेहा व्यव-
स्थिताः ॥ ऐतैरन्यैश्च संसेव्यो रामो नाम महेश्वरः । तेषामैश्वर्यदातृत्वात्तन्मू-
लत्वान्निरीश्वरः ॥ इंद्रनामा स इंद्राणां पतिस्साक्षी गतिः प्रभुः । विष्णुस्स्वयं
स विष्णूनां पतिर्वेदंतकृद्विभुः ॥ ब्रह्मा सब्रह्मणां कर्त्ता प्रजापतिपतिर्गतिः । रुद्रा-
णां सपती रुद्रःकोटिरुद्र नियामकः ॥ चंद्रादित्यसहस्राणि रुद्रकोटिशतानि च ।
अवतारसहस्राणि शक्तिकोटिशतानि च ॥ ब्रह्मकोटिसहस्राणि दुर्गाकोशतानि च ।
महाभैरवकालादिकोट्यर्बुदशतानि च ॥ गंधर्वाणां सहस्राणि देवकोटिशतानि च ।
सभां यस्य निषेवंते स श्रीराम इतीरितः '' ॥ इति ॥ औ कबीरहू जी को प्रमा-
ण॥ “जहँ सतगुरु खेलैं ऋतुबसंत । तहँ परम पुरुष सब साधु संत ॥ वह तीन
लोकते भिन्नराज । तहँ अनहद धुनि चहुँ पास बाज॥ दीपक बरै जहँ निराधार ।
बिरलाजन कोई पाव पार ॥ जहँ कोटिकृष्ण जोरे दुहाथ । जहँ कोटिविष्णुनावैं
सुमाथ ॥ जहँ कोटिन ब्रह्मा पढ़ पुरान । जहँ कोटि महादेव धरैं ध्यान ॥ जहँ
कोटि सरस्वति करैं राग । जहँ कोटि इन्द्र गावने लाग ॥ जहँ गण गंधर्व मुनि
गनि न जाहिं । सो तहँवां परकट आपु आहिं॥तहँ चोवा चन्दन अरु अबीर । तहँ
पुहुपबास भरि अतिगँभीर ॥ जहँ सुरति सुरङ्ग सुगन्धलीन । सब वही लोकमें
बास कीन ॥ मैं अजरदीप पहुँच्च्यो सुजाइ । तहँ अजर पुरुषके दरश पाइ ॥
सो कह कबीर हृदया लगाइ । यह नरक उधारण नाम जाइ ॥ १० ॥
इति छियासीवां शब्द समाप्त ।
अथ सत्तासीवां शब्द ॥ ८७ ॥
कबिरा तेरो घर कंदलमें मनै अहेरा खेलै ।
बपुवारी आनंद मीर्गा रुची रुची शरमेलै ॥ १ ॥
चेतत रावल पावन भंडा सहजहि मूलै बांधै ।
ध्यान धनुष धरि ज्ञान वान बन योग सार शर साधै ॥ २ ॥
( ३७८ ) बीजक कबीरदास ।
षट चक्र वेधि कमल बेध्यो जब जाइ उज्यारी कीन्हा ।
काम क्रोध अरु लोभ मोह ये हांकि साउजन दीन्हा ॥ ३॥
गगन मध्य रोंक्यो सो द्वारा जहां दिवस नहिं राती ।
दास कबीर जाय सो पहुंच्यो सब बिछुरे संग सँघाती॥४॥
कबिरा तेरो घर कंदलमें मनै अहेरा खेलै ।
बपुवारी आनंद मीर्गा रुची रुची शरमेलै ॥ १ ॥
कबीरजी कहै हैं कि हे कबीर ! कहे कायाके बीरजीव तेरोघर कंदलामें है
कहे आनंदको कंद कहे सार जो साहबको धाम है तहां है। जो कहो संसार कैसे
भयो तौ तेरोबपु शिकारी बपुरी जो है नाना शरीर तेई वारी हैं । शिकारी जहां
हांकै है सो वारी कहावै है।तहां जाइकै विषयानंद ब्रह्मानंद जे हैं मृगाको शिकार
खेलै हैं कोई विषयानंदरूप मृगामें वृत्ति शर मारि भोग करै हैं कोई शिकारी
मन ब्रह्मानंदरूप मृगाको वृत्ति शर मारि भोग करै हैं ॥ १ ॥
चेतत रावल पावन षंढा सहजहि मूलै बांधै ।
ध्यान धनुष धरि ज्ञानवान बन योग सार शर साधै २॥
षट चक्र वेधि कमल बेध्यो जब जाइ उज्यारी कीन्हा ।
काम क्रोध अरु लोभ मोह ये हांकि साउजन दीन्हा ३
जो शिकार खेलबो कैसे छूटै या मनको तौ रावल कहे सबके राजा ताकों
पावन कहे पायनको चेत करत कहे स्मरण करत अथवा पावन कहे पवित्र
हैकै षंढ कहे नपुंसक ब्रह्म तद्रूप जो जीव सो सहज समाधि लगाइकै
मूलबंध करै यहै ध्यान जोहै धनुष् तौनेको धरिकै साहब में आत्मा को लगाय
दीबो जो बाण यही योगसार रूप शर साधै ॥ २ ॥ सोई योग बतावै हैं
जे हठ योग करै हैं ते कुंडलिनी उठायके छहउ चक्र बेधै हैं यहां कुछ कुंडलि
नी उठाइबेको प्रयोजन नहीं है वह जो ब्रह्म ज्योतिकारकी मूलाधार चक्रते लै
ब्रह्मांड है साकेतमें लगीहै सो छहउ चक्र को बेधिकै लगी है सुषुम्णा नाड़ी
शब्द । ( ३७९ )
ह्वैकै ता ज्योतिरूपी डोरीमें गुरुजो युगुति बतावै है तौनी युगुति ते सुरतिके
साथ जब जीवको साजि दियो तब छहउ चक्र को आपही वह ज्योति बेधै है
सो वह ज्योतिके भीतर ह्वैकै षट्चक्र बेधिकै सहस्रदल कमळको बेध्यो तब
उहां उजियारी देख्यो जाइ ब्रह्म प्रकाशकी तब काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर
ई जे सावज हैं तिनको हांकि दीन्ह्यो कहे दूरिकै दीन्ह्यो ॥ ३ ॥
गगन मध्य रोंक्यो सो द्वारा जहां दिवस नहिं राती ।
दास कबीर जाय सो पहुंच्यो सब बिछुरे संग सँघाती४
जहां सुरति कमलमें परमगुरु रकार मकार कहै हैं औ दशौ द्वार बंदहैं
तहां न दिवसहै न रातिहै वह प्रकाशरूप ब्रह्मई है । सो उहां परम गुरुते राम-
नाम सुनिकै वही नामते दशवों द्वार खोलिकै वही डोरी ह्वैकै दासजो कबीर
जीव है सो परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र के लोकको पहुंचे जाइहैं तब संगके
संघाती जे हैं चारिउ शरीर अरु प्रकाशरूप ब्रह्म जो है कैवल्य शरीर ताहूको
बिछोह ह्वैजाई है।अथवा कबीरजी कहै हैं किं, मैं जो हौं साहबको दास सो अनि-
र्वचनीय पार्षद शरीर जो है हंसशरीर ताकों पाइकै वोही डोरी ब्रह्मज्योति ह्वै
कै अनिर्वचनीय जो है साहबको धाम तहाँ पहुँच्योजाई । तहां हे जीवो ! तुमहूं
पहुँचौ यह भ्रममें काहे परेहौ तुम तौ साहबके आनंदकन्द धामके हौ
साहबके दास ताते रहित औ जौन तुम मानौ हौ सो तुम नहीं हौ ॥ ४ ॥
इति सत्तासीवां शब्द समाप्त ।
अथ अट्ठासीवां शब्द ॥ ८८ ॥
गुरुमुख ।
सावज न होइ भाई सावज न होइ ।
वाकी मांसु भखै सब कोई ॥ १ ॥
सावज एक सकल संसारा अविगति वाकी बाता ।
पेट फारि जो देखिये रे भाई आहि करेज न आता ॥ २ ॥
( ३८० ) बीजक कबीरदास ।
ऐसी वाकी मांसुरे भाई पल पल मांसु बिकाई ।
हाड़ गोड़ लै घूर पँवारै आगि धुवां नहिं खाई ॥ ३ ॥
शिर औ सींग कछू नहिं वाके पूंछ कहां वह पाई ।
सब पण्डित मिलि धन्धे परिया कविर वनौरी गाई ॥४॥
सावज न होइभाई सावज न होइ।वाकी मांसु भखैसब कोई १
साहब कहैं हैं कि, जेहि शब्द ब्रह्ममें तुम लगे हौ और तुमको वही भुलाय
दियो सो सावज न होइ तैने शब्दको तात्पर्य तुम नहीं बूझो वहीके मांसको
तुम सब भक्षौहौ कहे बाणी सब कहौहौ औ वही मांस सब जगत्है ताहीको
भक्षौहै कहे भोग करौहौ अरु वाको तात्पर्य सत्य पदार्थ जो मैंहौं ताको नहीं
जानौहौ संपूर्ण बाणीको बिस्तार असत्यहै मैंहीं सत्यहौं ॥ १ ॥
सावज एक सकल संसारा अबिगति वाकी बाता ।
पेट फारि जो देखिये रे भाई आहि कलेज न आता २
सो वाको पेट फारिकै जो देखिये अर्थात् जो वाको विचारिकै देखिये तात्प-
र्य्यते तो जो तुम बिचार करिराख्यो है कि शब्द ब्रह्मके अर्थ को सारांश कलेज
निर्गुण ब्रह्म है सो नहीं है वेदतो तात्पर्य ते मोको बर्णन करै है अरु त्रिगुण
माया आंतहै सो वाकी बात अबिगति है कहे अव्यक्त है काहूके जानिबैं योग्य
नहीं है जो मोको जानै है सोई वह सावज को जानै है ॥ २ ॥
ऐसी वाकी मांसुरे भाई पल पल मांसु बिकाई ।
हाड़ गोड़ लै घूर पँवारै आगि धुवां नहिं खाई ॥ ३ ॥
पल का कहावै है सो वह शब्द ब्रह्मकी मांसु जो हैबाणी सोहे भाइउ! ऐसी
है कि, पल पल कहे टका टका कों बिकोइहै अर्थात् को बिकाईहै तामें प्रमाण॥
"कबीरजीकों चौरासी अंगकी साखी॥" "गली गली गुरुवा फिरैं दिक्षा हमरी लेहु ।
कीं बूड़ौ की उबरौ टका परदनी देहु"॥ थोरे थोरे अक्षरके मंत्र गुरुवा लोग
देइहैं औ शिष्यनसौं धन लेइहैं अरु केवल शब्द ब्रह्मैते मुक्ति नहीं होइहै तामें
शब्द । ( ३८१ )
प्रमाण ॥ “शब्दे ब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात्परे यदि । श्रमस्तस्य श्रमफलं-
ह्यधेनुमिव रक्षत” । इतिभागवते ॥ सो जब वे गुरुवा मंत्र दियो तब बाणी
को जो हाड़ गोड़ रहै ज्ञानकांड कर्मकांड ताको घूर पैंवारि दियो कहे ज्ञानकांड
कर्मकांड घूर हैं तहां फेंकि दियो । उपासनाकांडी वह मंत्र दैके उपासनामें
लगाइ दियो तहां मंत्र दियो सो उन न जप्यो जाते ज्ञानाग्नि उत्पन्न होइ अरु भ्रम
जरै औ धुवां जे हैं कल्मष ते निकसि जायें सो बाणीरूपी वह मांसु ज्ञानाग्निते
पकाइ नहीं गई अर्थात् वह मंत्रको अर्थ न जान्यो औ न अभ्यास कियो वह
अज्ञानरूपी धुवां गुँगुआतै रह्यो निर्धूम न भई ॥ ३ ॥
शिर औ सींग कछू नहिं वाके पूछ कहां वह पाई ।
सव पंडित मिलि धन्धे परिया कबिरं बनौरी गाई॥४॥
औ शिर जेहैं नित्य शब्द औ कार्यशब्द ते वाके नहीं हैं औ चारि जे सींग
हैं नाम धातु उपसर्ग निपात ते वाके नहीं हैं काहेते कि, वाको अनिर्वचनीय कहैहैं।
तौ पूंछ जोहै ब्रह्म ह्वैजैबो मोक्ष ताको कहां पावैगो अर्थात् जहांभर बचनमें आवैहै
सो सब मिथ्याहै जो कहो मोक्षउको रहि जाइबो न कह्यो तो रहि का गयो । तो
शब्द तो तात्पर्य करिकै वर्णन करैहैं कि, निर्गुण सगुणके परे परम पुरुष जो मैं
ताको सदाको अंश यह जीव है यह जो बिचार करै कि, मैं उनको हौ तौं
बद्धही नहीं है मुक्त काहेते होइ मुक्तही बनोहो बद्ध मुक्ततो कथन मात्रहै तामें
प्रमाण ॥ “अज्ञानसंज्ञौभवबंधमोक्षौ द्वौ नामनान्यौ स्त ऋतज्ञभावात्। अजस्रचि-
न्त्यात्मनि केवलेपरे विचार्य्यमाणे तरणाविवाहनी”इति भागवते॥ अरु तात्पर्ब्य
करिकै शब्द यह मोहींको वर्णन करैहै सो भागवतादिकनमें प्रसिद्ध सुनैहै तऊ
मूढ़ नहीं मानै है ॥ “शब्दब्रह्मपरब्रह्मममोभे शाश्वतीतन्नू” ॥ अपने अपने अर्थ
बनाइकै गाइ रहैहैं मोको नहीं जानै हैं सब पंडित धंधेमें परि रहे हैं नानामत
बनाइ रहेहैं तिनकी बनौरीको कबीर जे हैं जीव उनके सब शिष्य ते गावै हैं
अर्थात् अपने अपने आचार्यन के मंतमें आरूढ़ ह्वैकै जो और कोई कहैहै तौ
लड़ै हैं अरु पारिख करिकै सब वेदनको तात्पर्य जो मैं हौं ताको नहीं जानै हैं
शब्द ब्रह्म तात्पर्य करिकै परम पुरुष पर जो मैं हौं ताहीको वर्णन करे हैं॥४॥
इति अठासीवां शब्द समाप्त ।
( ३८२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ नवासीवां शब्द ॥ ८९ ॥
सुभागे केहि कारण लोभ लागे रतन जन्म खोये ।
पूरव जन्म भूमिके कारण बीज काहेको बोये ॥ १ ॥
पानीसे जिन पिंडै साजे अगिनिहि कुंड रहाया ।
दशै मास माताके गर्भ कढ़ि बहुरि लागिली माया ॥ २॥
बालकसे पुनि वृद्ध हुआहै होनी रही सो होये ।
जब यम ऐहैं बांधि लैजैहैं नयन भरी भरि रोये ॥ ३ ॥
जीवनकै जिन आशा राख्यो काल गहे है श्वासा ।
बाजीहै संसार कबीरा चित चेति ढारो पासा ॥ ४ ॥
हे सुभागे ! जीव तैंतो मेरौ है यह संसारमें जो तैं लोभकियो सो कौने
कारण कियो काहेते कि आपने दुःख पाइबे को कोई उपाइ नहीं करैहै जैसे
मनादिक करिकै संसारमें परिगयो तैसे जो मेरो स्मरणकरत तो मैं हंसस्व-
रूपदेत्यों तामें स्थितह्वैकै मेरे धामको पहुँचते । सो तैं रत्न जोहै यह मानु-
षजन्म ताको खोइदारचो पूर्वजन्मकी भूमिकाके कारण कहे पूर्वजन्ममें जैसे
कर्म करिराखे हैं तैसे सुख दुःख यह जन्म पावै है अरु जो यह जन्म करै है
सो वह जन्ममें दुःख सुख पावैगो सो आंखिन तो देखि लिये कोई सुखदुःखके
कारण रूप बीज तैं काहेको बोये और सब पदनको अर्थ स्पष्टई है ॥ १।४ ॥
इति नवासीवां शब्द समाप्त ।
अथ नब्बे शब्द ॥ ९० ॥
गुरुमुख ।
संत महन्तौ सुमिरौ सोई । जो छलफांदसों बाचा होई १
दत्तात्रेय मर्म नहिं जाना मिथ्यास्वाद भुलाना ।
गोरख मथिकै घृतको काढ्यो ताहि समाधि समान ॥२॥
शब्द । ( ३८३ )
गोरख पवन रखै नहिं जाना योगयुक्ति अनुमाना ।
ऋद्धि सिद्धि संयम बहुतेरा पारब्रह्म नहिं जाना ॥ ३ ॥
वशिष्ठ शिष्ट विद्या संपूरण राम ऐसे शिष शाखा ।
जाहि रामको करता कहिये तिनहुंक काल न राखा ॥४॥
हिन्दूकहै हमें लै जरवै तुरुककहै मोर पीर ।
दूंनों आय दीनमों झगरैं देखैं हंसकबीर ॥ ५ ॥
आगेके पदमें कहि आये काल श्वासा गहे है सो चेति पांसा ढारो कहैं
बिचारि बिचारि कामकरो सोई बिचार बतावै है ।
संत महंतौ सुमिरौ सोई । जो कालफांससों बाचा होई॥१॥
साहब कहै हैं कि, हे संतमहंतौ ! ताको सुमिरन करो जो कालफांसतें
बचो होइ ॥ १ ॥
दत्तात्रेय मर्म नहिं जाना मिथ्या स्वाद भुलाना ।
सलिला मथिकै घृतको काढ़यो ताहि समाधि समाना॥२॥
जो कहो दत्तात्रेय अपनें कों ब्रह्म मानिकै ब्रह्मही ह्वैगये तेतो वाके मर्मकों
कहै ज्ञानको जान्यो है सो प्रथम दत्तात्रेयऊ नहीं जान्यो काहेते कि वहतों
धोखा मिथ्या है सो तेऊ मिथ्यास्वादमें भुलाइ गये यह न बिचारचो कि,
जौन बिचार करत करत रहिजाय है सो मेरो स्वरूप परम पुरुष पर श्रीराम-
चन्द्रको दास है जब वे बिग्रह देइ हैं आपनो तब उनके पास जाइ है
सो यह तो न जान्यो पानी को मथिकै घृत कढ़्यो वही धोखा ब्रह्मकी समाधिमें
समाइ रह्यो सो कहुं पानिहूते घृत निकसै है उनके हाथ धोखई लग्यो ॥ २ ॥
गोरख पवन रखै नहिं जाना योगयुक्ति अनुमाना ।
ऋद्धि सिद्धि संयम बहुतेरा पारब्रह्म नहिं जाना ॥ ३ ॥
( ३८४ ) बीजक कबीरदास ।
बाशिष्ठ शिष्ठ विद्या संपूरण राम ऐसे शिष शाखा ।
जाहि रामको करता कहिये तिनहुंक काल न राखा ॥ ४ ॥
अरु योग युक्तिको अनुमान करिकै गोरख पवनराखै नहीं जान्यो कहैं प्राण
चढ़ावै नहीं जान्यो काहेते किं ऋद्धिं सिद्धि संयममें लागिगये ब्रह्मके पार जें
साहब हैं । तिनको न जान्यो ॥ ३ ॥ औ वशिष्ठ जे हैं संपूर्ण विद्यामें श्रेष्ठ
तिनके राम ऐसे कहे श्रीरामचन्द्रहीके बरोबर रघुवंशी जिनमें शिष्य शाखा-
भये तिनहूंको काल नहीं राख्यो अर्थात् यह शरीर उनहूंको न रह्यो औ
राजन में जिनको राम को कर्त्ता कहै हैं कि श्रीरामचन्द्रको जे उत्पन्न कियो
है ऐसे दशरथौको काल न राख्यो । इहां गोरख आदिक योगी दत्तात्रियादिक
ज्ञानी वशिष्ठ आदिक ब्रह्मर्षि ई सबते श्रेष्ठ हैं । याते संयोगी ज्ञानी ब्रह्मर्षि
पृथ्बीके आइगये औ दशरथ महाराजको श्रीरामचन्द्रके बिछोह होत प्राण
छूटिगयो सो ये सब राजर्षिते श्रेष्ठ हैं ताते दशरथ महाराज के कहे सब
राजर्षि पृथ्वीभरके आयगये तिनहूंको काल न राखत भयो अर्थात् शरीरधारी
कोई नहीं रहि जाइ है कोई योगकरि जो जियो तो ब्रह्माके दिन भर जियो
महाप्रलयमें जब ब्रह्माको नाश द्वै जाइ है तब ब्रह्मांडई नहीं रहै है और कोई
कैसे रहै सो हंस समाधि लैके मिलत है ॥ ४ ॥
हिन्दू कहै हमें लै जरवै तुरुक कहै मोर पीर ।
दूनों आइ दीन मों झगरैं देखै हंस कबीर ॥ ५ ॥
जाको हंसस्वरूप साहब देईहै सो हंस स्वरूपमें स्थित द्वैकै साहबके पास
जाइहै । सो साहब कहै है कि जो मोको जानै तौनैं हंसस्वरूप देउँ तामें स्थित द्वैकै
मेरे पास आवै । सो मोको तो जानै नहींहै हिंदू कहै हैं कि हम वह ज्ञानाग्नि कैकै
सबकर्म जारि देइँगे ब्रह्म होइ जाइँगे औ मुसल्मान कहै हैं कि पिरान जाहिर जो मक्का
है तहां हमारो पीरहै हमारे खाबिंदहैं ते हमार कर्म सब जारि देइँगे। फिरि दोनों
आइ दीनमें झगरेँ हैं वे कहै हैं कि तुम्हारा खोदाय झूठाहै वे कहै हैं कि तुम्हा-
रा ईश्वर झूठा है सो जीवात्मा तौ मेरो बंदाहै सो आपने स्वरूपको जानिकै
मोको जानै नहीं है आपने आपने अनुमानकरि आपने खाबिंद बनाइ लिये हैं
शब्द । ( ३८५ )
तिनको झगरा देखता कौन है जो सबके ऊपर होइहै सो साहब कहैं हैं कि जि-
नको मैं हंसस्वरूप दियो है मेरे पास पहुंचे हैं ते सबके ऊँचेहैंकै उनको झगरा
देखते हैं औ हँसते हैं कि सांच साहबतो एकई हैं ताको जानै नहीं हैं
आपसमें झगरते हैं ॥ २ ॥
इति नब्बे शब्द समाप्त ।
अथ इक्यानबे शब्द ॥ ९१ ॥
जो देखा सो दुखिया देखा तनु धरि सुखी न देखा ।
उदय अस्तकी बात कहतहौं ताकर करहु विवेका ॥ १ ॥
बाटे वाटे सबकोइ दुखिया क्या गिरही बैरागी ।
शुकाचार्य दुखहीके कारण गर्भे माया त्यागी ॥ २ ॥
योगी दुखिया जंगम दुखिया तापसको दुखदूना ।
आशा तृष्णा सबघट ब्यापै कोई महल नहिं सूना ॥ ३ ॥
सांच कहौं तौ सब जगखीझै झूठ कहो नहिं जाई ।
कह कबीर तेई भे दुखिया जिन यह राह चलाई ॥ ४ ॥
जो देखा सो दुखिया देखा तनुधरि सुखी न देखा
उदय अस्तकी बात कहतहौं ताकर करहु विवेका ॥ १ ॥
जाको संसारमें देखै हैं ताको सबको दुखिये देखैं तनुधरिकै सुखिया काहूकों
नहीं देखा काहेते कि गर्भते जो जीव निकस्यो तो माया लपटि जाती है सों
उदय अस्त कहे सब संसारकी बात कहौंहौं अरु ताकर तुम विवेक कर-
त जाउ ॥ १ ॥
बाटे वाटे सब कोइ दुखिया क्या गिरही बैरागी ।
शुकाचार्य दुखहीके कारण गर्भे माया त्यागी ॥ २ ॥
आपने आपने वाटमें कहे आपने आपने मतमें सबको दुखिया देखते हैं क्या
गिरही क्या बैरागी अर्थात् त्रिगुणके मतमें सब परे हैं मायाको दुःख कोई नहीं
२५
( ३८६ ) बीजक कबीरदास ।
छोड़ै है जो जेतो पायो है सो वहीको सांच मानिकै सांचपदार्थ को नहीं जानै
है दुःखहीके कारण शुकाचार्य गर्भमें मायाको त्यागिदियो । शुकाचार्य गर्भमें
बारहवर्षके द्वैगये सो गर्भते न निकसैं कहैं कि जो हम निकसैंगे तौ हमको
माया लगि जायगी तब ब्रह्मादिक देवता सब जुरे आय न निकसे तब भगवान्
आइ कह्यो कि बरदाके सींगमें सरसों धरि देइ जब भर सरसों सींगमें रहै है
यतने काल भरमाया हम खैंचेले हैं निकसिआ ओ सो शुकाचार्य निकसे नारासहित
बनको चलेगये साहबको मिले जाइ ॥ २ ॥
योगी दुखिया जंगम दुखिया तापसको दुख दूना ।
आशा तृष्णा सबघट व्यापै कोई महल नहीं सूना॥३॥
सांच कहौं तो सबजग खीझै झूठकहो नहिं जाई ।
कह कबीर तेई भे दुखिया जिन यह राह चलाई ॥४॥
योगीजंगम सबदुखियाहैं अरु तापसको तो दूनदुःखहै काहेते कि आशा
तृष्णा सबके घटमें व्यापै है कोई महल सूननहीं है काहूको हृदय आशातृष्णाते
सून नहीं ह सबके हृदयमें आशा तृष्णा व्यापि रही ह ॥ ३ ॥ श्रीकबी-
रजी कहैं हैं कि अपने अपने मतमें जीव लगे हैं सांच मानिकै जो सांचको
हम कहै हैं कि सांच जे परमपुरुष परश्रीराम चन्द्रहैं तिनमें लगौ जिनको तुम
जानि राख्यो है ते असांचहैं तो खीझै हैं औ मोसों झूठ कह्यो नहीं जाइहै सो
जे जे गुरुवा लोग अपनी अपनी मतकी राह चलाई हैं ते दुखिया द्वै गये हैं
तौ जिनको वे शिष्य बनायो है ते दुखिया काहे न होइँ ॥ ४ ॥
इति इक्यानबे शब्द समाप्त ।
अथ बानबे शब्द ॥ ९२ ॥
गुरुमुख ।
ता मनको चीन्हौ रे भाई । तनु छूटे मन कहां समाई॥१॥
सनक सनंदन जयदेव नामा। अंबरीष प्रहलाद सुदामा ॥२॥
भक्त सही मन उनहुं न जाना।भक्तिहेतु मन उनहुं न ज्ञाना३
शब्द । ( ३८७ )
भरथरिगोरखगोपीचंदा। तामनमिलिमिलिकियोअनंदा ४
जा मनको कोइ जान न भेवा।ता मन मगन भये शुकदेवा ५
एकल निरंजन सकलशरीरा।तामें भ्रमि भ्रमि रहल कबीरा ६
जो कहि आये कि नाना उपासना करि सांच साहबको न जान्यो सो
इहां कहैं ॥
ता मनको चीन्हौ रे भाई । तनुछूटे मन कहां समाई ॥१॥
सनक सनंदन जयदेव नामा।अम्बरीष प्रहलाद सुदामा॥२॥
भक्त सही मन उनहुं न जाना।भक्तिहेतुमनउनहुं न ज्ञाना ३
जा मनते नाना उपासना भई ता मनको हे भाई ! चीन्हौ यह मन के कों
भयो है अर्थात् जौने मनते नाना उपासना ठाढ़ीकै लियो है सो मनतों तुम-
हींते भयो है सो यह विचारतो करो जब सब शरीर छूटि जाइ है तब मन
कहां समाइहै अर्थात् तुम्हीं में समाइ जाइ है सो मनके मालिकतौ तुमही
मनैते जो नाना उपासना ठाढ़ कै लियो है ते तुम्हारी उपासना सांच कैसे
होइगी ॥ १ ॥ सनक सनंदन सनत्कुमार नामदेव जयदेव अंबरीष प्रहलाद
सुदामा ये सब भक्त सही हैं संसारते छूटै हैं परन्तु मनको वोऊ न जान्यों
जो मनको जानते तौ मनते भिन्नहै कै मनबचनके परे जो मेरो रामनाम है
ताहीको जपते । और औरेकी भक्तिको कारणजो है मन तेहि करिकै उनहूंको
मेरो प्रथमज्ञान न होतभयो फेरि जब और २ सवासनमें कुछ न देख्यो तब
साहब कहै हैं कि मोमें लगे काहेते कि वह मन आपैते होईहै अरु वह जीवा-
त्माके परे मैं हौं काहेते कि यह मन आत्मैते होईहै अरु वह जीवात्माके परें
मैंहौं काहेते कि मेरो अंशहै अरु ध्यानादि ज्ञानादिक सब मनते अनुमान करै
हैं ताते ज्ञानको अनुभव ब्रह्म औ ध्यान को अनुभव उपास्य देवता ये मनके
भीतर होवई चाहैं औ मन आत्माको है ताते मनमें आत्माको स्वरूप कैसे
आइ सकै वहतो मनते परे है सो जब मनको छोड़ै है तब चिन्मात्र राहि जाइ
( ३८८ ) बीजक कबीरदास ।
है यातें मन बचनके परे आत्मा होवई चहै अरु जब मैं हंसस्वरूप देउहौं
तामें स्थितह्वैकै मेरे पास आवते कल्पनाकारकै नानारूप में न लगते ॥२॥३॥
भरथरिगोरखगोपीचंदा।तामनमिलिमिलिकियोअनन्दा ४
जामनकोकोइजाननभेवा।तामनमगन भये शुकदेवा ॥५॥
भरथरी गोरख गोपीचंद जे हैं ते वही मनहीं में मिलिकै आनंद कियो
अर्थात् जौने ब्रह्ममें मिलिकै आनन्द कियों सो ब्रह्ममनहींको अनुभव है ॥४ ॥
सो जौने मनको अनुभव ब्रह्म होइ है अरु वह ब्रह्म उपास्यकनमे अर्थ
अपनी नाना ईश्वर स्वरूप कल्पना करैहै तौने मनको भेद कोई नहीं
जान्यों तौने मनके मगनमें कहे; राह में शुकदेव ना भये गर्भहीते मायाको
त्यागि दियो औ सनक सनकादिक प्रह्लादादिक बहुत श्रमकरिकै फेरि फेरि
समुझ्यो है सो साहब कहै है कि मोको जानिके मेरे पास आये । इहां
रामोपासक शुकदेव को छूटिगये जो कह्यो तौ रामोपासक सब आइ गये॥५॥
एकलनिरंजनसकलशरीरा।तामेंभ्रमिभ्रमि रहलकबीरा॥६॥
एक जो है निरंजन ब्रह्म सर्वव्यापी तिनहीं को नानाशरीर नारायणादिक
महेशादि रूपहै तिनहीं में सिगरै कबीर कायाके बीर भ्रमि भ्रमि रहतभये
कहे उनहींकी उपासना करतभयें अपनो रूप औ मेरो रूप न जानत भये अरु
ब्रह्म नानारूप कल्पनाकारि लियो है तामें प्रमाण ॥ “उपासकानां कार्यार्थं ब्रह्मणो
रूपकल्पना”॥ याको अर्थ मेरे सर्व सिद्धांतमें है औ रामोपासक शुकदेवको कहि
आये हैं सो शुकाचार्य्यई मुक्त ह्वैगयेहै तामें प्रमाण ॥ “शुको मुक्तो वामदेवो वा
इति श्रुतेः” ॥ औ रामोपासक रहै हैं तामे प्रमाण ॥ “पादाम्बुजं रघुपतेः शरणं
प्रपद्ये” ॥ इति भागवते ॥ औ कवीरजीको प्रमाण ॥ “आदिनाम शुकदेवजो
पावा। पूर्वजन्मके कर्ममिटावा” ॥ ६ ॥
इति बानवे शब्द समाप्त ।
शब्द । ( ३८९ )
अथ तिरानबे शब्द ॥ ९३ ॥
वाबू ऐसो है संसार तिहारो येकलि है ब्यवहारा ।
को अब अनख सहै प्रतिदिनको नाहिं न रहनि हमारा ॥१॥
सुमृति सुभाव सवै कोई जानै हृदया तत्त्व न बूझै ।
निरजिव आगे सरजिव थापै लोचन कछुव न सूझै ॥२॥
तजि अमृत विष काहेको अंचवै गांठी बांधो खोटा ।
चोरनको दिय पाट सिंहासन शाहुको कीन्हो ओटा ॥३॥
कह कबीर झूठो मिलि झूठा ठगहीठग व्यवहारा ।
तीनिलोक भरि पूरि रह्यो है नाहीं है पतियारा ॥ ४ ॥
वाबू ऐसो है संसार तिहारो येकलि है ब्यवहारा ।
को अव अनख सहै प्रतिदिनको नाहिंन रहनि हमारा ॥१॥
बाबू कहे हे जीवो ! तिहारो यह संसार ऐसोहै कि एक जो है मन ताहीके लिये
यह संसारको व्यवहारहै अरु वहीके छोड़ेते संसार छुटि जाइहै तामें प्रमाण॥ “मन
एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः”॥ तामें कबीरजीको प्रमाण ॥ “मुक्ति नहीं
आकाशमें मुक्ति नहीं पाताल । जब मनकी मनसा मिटै तबहीं मुक्ति विशाल”॥
सो यह मनकी प्रतिदिनकी अनख कौन सहै अर्थात् अणुजो जीवहै ताको
प्रतिदिन खाइ लेइहै कहे अपनेमें मिलाइ लेइहै सो रोजरोजकों याकें स्वरूपको
भुलाइबो कौन सहै यह मन हमारे रहनि माफिक नहीं है यह जड़ हम चैतन्य
याते हम कैसे मिलैंगे ॥ १ ॥
सुमृति सुभाव सवै कोई जानै हृदया तत्त्व न बूझै ।
निरजिव आगे सरजिव थापै लोचन कछुव न सूझै ॥२॥
सो यहि तरहते मनको स्वभाव सुमृति जे स्मृति है तामें बर्णन है सो
सबै कोई जानै है परन्तु हृदयमें जो मनको तत्त्वकहे स्वरूपहै ताको कोई नहीं
( ३९० ) बीजक कबीरदास ।
बूझैहै कि हम यहि मनते भिन्नहैं । निर्जीव जो मन है ताके आगे सजीव जो है
आत्मा ताको राखि देइहै कहे मिलाइ देइहै आंधरनको यह नहीं सूझि परै है कि,
चित् जीवको जड़नमें मिलाइ जड़ काहे करैहै औआत्मा देहको एकही मानै है॥ २ ॥
ताजि अमृत विष काहेको अँचवै गांठी बांधो खोटा ।
चोरनको दिय पाट सिंहासन शाहुको कीन्हो ओटा ॥३॥
अमृत जो है आपने आत्माको स्वरूप ताको छोड़िके बिष जो है मन तामें
लगिकै नाना पदार्थनमें लागिबो तो है ताको काहेते अँचवै हैं कि गांठीमें
खोट जो मनहै ताको बांधे हैं सो काहैं सो काहे बांधे हैं मनते भिन्ननहीं है जाइहै
आत्मा के स्वरूपको भुलाइकै मन में लगाइ देनवारे औ साहब को भुलाइ
देनवारे औ संसारमें डारि देनवारे ऐसे जे गुरुवा लोगहैं तिनको पाट सिंहा
सन देइ है कहे उनको गुरु करैहै औ शाहु जे साधु जनहैं मनते छोड़ाय देन-
वारे जे साहबको बताइ देइँ आत्माको स्वरूप जनाइकै तिनको ओट कीन्हे है कहैं
उनको दर्शनई नहीं लेइ है ॥ ३ ॥
कह कबीर झूठे मिलि झूठा ठगही ठग व्यवहारा ।
तीनलोकं भरि पूरै रह्योहै नाहीं है पतियारा ॥ ४ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि ऐसे जे लोगहैं ते झूठा जो मनको अनुभव ब्रह्महै
तामें मिलिकै झूटे है रहे हैं ठगै ठगको व्यवहार है रह्यो है सो तीन लोक में
वही भरपूरि रह्यो है सो पतिआइबे लायक नहीं है जो ठगमें लगैहै सो ठगही
है जाइहै जो कहो तीनलोकमें तौ साधुहूँहैं पतिआइबे लायक कोई न रह्यो यह
कैसे तो कबीर जी कहै हैं कि साधुजन तीनलोकके बाहरईहैं बे तीनलोकके भीतर
नहीं हैं काहेते कि तीनि लोक मनको पसाराहै अरु वे मनते भिन्न हैं ॥ ४ ॥
इति तिरानबे शब्द समाप्त ।
शब्द । ( ३९१ )
अथ चौरानबे शब्द ॥ ९४ ॥
कहौ निरंजन कवनी बानी ।
हाथ पांव मुख श्रवण न जिह्वा का कहि जपहु हो प्रानी॥१॥
ज्योतिहि ज्योतिज्योति जो कहिये ज्योति कौनसहिदानी ।
ज्योतिहि ज्योति ज्योति द्वैमार तब कहँ ज्योति समानी २॥
चारिवेद ब्रह्मा निज कहिया तिनहुं न यागति जानी ।
कहै कबीर सुनो हो संतो बूझहु पंडित ज्ञानी ॥ ३ ॥
जो कहौ मनहीं ते यह संसार है औ जब मनते छूटेगो तब ब्रह्मही है जाइ
गो तामें श्री कबीरजी कहै हैं ॥
कहौ निरंजन कवनी बानी ।
हाथ पांय मुख श्रवण न जिह्वा काकहि जपहु हो प्रानी॥ १॥
ज्योतिहि ज्योति ज्योति जो कहिये ज्योति कौन सहिदानी।
ज्योतिहि ज्योति ज्योति द्वैमारै तब वह ज्योति समानी॥२॥
कहौतौ निरंजन ब्रह्मको कौनी वाणीते कहौहौ वाको तौ मन बचनके प
कहौहौ तामें प्रमाण॥"यतो वाचो निवर्तंते अप्राप्य मनसा सह"॥इति श्रुतेः॥
अरु वाको तो बिना नाम रूप को कहौ हौ वाको कैसे जपौहौ औ कैसे ध्यान
करौहौ॥१॥जो कहो वह प्रकाशरूप ब्रह्म है सो प्रकाशको ध्यान करैं हैं प्रकाशमें
अपने आत्माको मिलाइ देइहैं ब्रह्म हमहीं है जाइहैं सो ज्योतिस्वरूप जो ब्रह्महै
तामैं अपने आत्माकी ज्योति ज्योतिकै कहे मिलाइकै जो कहिये वह ज्योति कौन
सहिदानी रहिजाइहै अर्थात् जब सब पदार्थ मिथ्या मानत मानत एक प्रकाशरूप
ब्रह्ममान्यो ताको मान्यो कि वहि ब्रह्म हमहीं ब्रह्म हैं सो जब :भर यह माने
रह्यो कि वह ब्रह्म हमहीं हैं तबभर तो तिहारो अनुभव रहैहै औ जब अनुभवऊ
मिटिगयो तब तुम्हीं रहिजाउहौ तब वहि ब्रह्मकी कौन सहिदानी रहिजाइ है
अर्थात् कछु नहीं रहिजाय है तुम्हीं रहि जाउ हौ यही प्रकार जब ब्रह्मज्योति
( ३९२ ) बीजक कबीरदास ।
आत्माकी ज्योति मिलायकै वहि ज्योति को दैमारचो कहे छोड़्यो अर्थात
सबको निराकरण कै कैवल्य शरीरमें प्राप्त भयो अरु वहूको छोड़्यो तब आ-
त्माकी ज्योति कहां समाईहै सो कहै हैं जीवके मुक्त भये पर परम परपुरुष
श्रीरामचन्द्र हंसस्वरूप जेइहैं तामें टिकिकै साहबकी सेवा जीव करैहै यह
ज्ञानतौ जीवजानै नहीं है वही ब्रह्म प्रकाश को जानिराख्यो है कि हमैंहीं
ब्रह्महैं सो जब मनको निराकरण है गयो तब ब्रह्महू को हैजाय है तब आत्मै
रहिजाय है याते मनै को अनुभव ब्रह्महै सो जौने हंस स्वरूपमें वा ज्योति
समाईहै ताको बिचारकरो ॥ २ ॥
चारिवेद ब्रह्मा निजकहिया तिनहुं न या गति जानी ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ बूझहु पंडित ज्ञानी ॥ ३ ॥
ब्रह्मा चारिवेदकह्नों तिनमें यहकह्यो कि मुक्तभये पर विग्रहको लाभ होयहै॥
“मुक्तस्य विग्रहो लाभः”॥इत्यादिक श्रुति आंखही कह्यों तऊ न जान्यो काहेतें
जो जानते तौ जगत् की उत्पत्ति न करते हंसस्वरूपमें टिकिकै साहबकें लोक-
को चले जाते सो कबीरजी कहै हैं कि हे संतौ ! सुनौ जाके सारासार बिचा-
रिणी बुद्धिहोय सो पंडित कहावै सोई पंडितहै सो हे ज्ञानिउ ! जिन संपूर्ण
असारको छोड़ि कै सार जे साहबहैं तिनको ग्रहण कैलियो ऐसे जे पंडितहैं
तिनसों बूझो वहगति वोई बूझैहैं तबहीं तिहारो धोखा ब्रह्म छूटैगो ॥ ३ ॥
इति चौरानबे शब्द समाप्त ।
अथ पंचानबे शब्द ॥ ९५ ॥
कोअसकरैनगरकोतवालिया। मासुफैलाय गीधरखवारिया १
मूस भो नाव मँजारि कँडहरिया। सोवै दादुर सर्प पहरिया २
बैल वियाय गायभै बाँझा । बछवै दुहिया तिनतिन साँझा ३
नितउठि सिंहस्यारसौं जूझै । कविरक पद जन विरला बूझै ४
शब्द । ( ३९३ )
साहब कहैहैं या संसाररूपी नगरकी कोतवाली को करै जौने नगरमें शरीर-
रूपी मांस फैलाहै । गीध जो निरंजन काल सो रखवारहै औ जहां जीवको स्वरूप
ज्ञान जो मूसरूप नाव ताके बिलार कड़हारियाहै कहे गुरुवालोग औ दादुर जो
जीवहै सो सोवैहै प्राण जो सर्प सो पहरी हैं पै ई नानाशरीरमें लैजाइहैं औ
गाय जो गायत्री सो आपने तात्पर्य छपाय राख्यो सो बांझ भई औ बैल जो
शब्द ब्रह्म सो बियाय है कहे नाना ग्रन्थरूप बछवा भये तेई बछवाको तीनि
तीनि सांझ दुहैहैं अर्थात् रजोगुणी तमोगुणी सतोगुणी सब वाही को दुहैं हैं
कहे पढ़ै सुनैहैं औ सिंह जो विवेक है सो सियार जो कुमति तासों रोजही जूझैहै
सो कबीर जो है जीव ताको पद जो है मेरो धाम ताको कोई विरला बूझै है जे
मेरे धाम को बूझै हैं ते संसारते छूटि जायहैं ॥ ४ ॥
इति पंचानबे शब्द समाप्त ।
अथ छानबे शब्द ॥ ९६ ॥
काकाहि रोवहुगे बहुतैरा । बहुतक गये फिरे नहिं फेरा ॥१॥
हमरी बात वतैं न संभारा । वात गर्भकी तैं न बिचारा ॥२॥
अब तैं रोया क्या तैं पाया । केहि कारण तैं मोहि रोवाया ३
कहै कबीर सुनो नर लोई । कालके वशहि परौ मति कोई ४
का कहिकै रोवोहो बहुत तरहते कि, ये हमारे भाईहैं, ई बाप हैं, ईपुत्र हैं
बहुत यही तरहते गयेहैं फेरि नहीं फेरेफिरे हैं ॥ १ ॥ सो जब जब हमको
तेरो दुःखदेखिकै करुणाभई हमारो वा तोको उपदेश दियो सो तू न सँभारे
जो क़रार किये तैं कि, मैं भजन करौंगो । सो न बिचारे । साहबको भजन न
कियो । अबतैं गर्भमें जाय जाय संसारमें आय आयकै रोवै है कहे दुःखपावैहै
सो क्या तैं पाये अब हमको तैं काहे रोवावैहैं तेरो दुःख देखिकै मोको दुःख
होय है सो कबीरजी कहैहैं कि, हे नर लोगो! साहबको जानौगे तबहीं कालते
बचोगे सो साहबको भुलायकै काहे कालके बशपरौहो संसार दुःखपावौहो ॥४॥
इति छानबे शब्द समाप्त ।
( ३९४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ सत्तानबे शब्द ॥ ९७ ॥
अल्लह राम जीव तेरी नाईं ।
जन पर मेहर होहु तुम साईं ॥ १ ॥
क्या मूड़ी भूमिहिशिरनाये क्या जल देह नहाये ।
खून करै मसकीन कहावै गुणको रहै छिपाये ॥ २ ॥
क्या भो वजू मज्जन कीन्हे क्या मसजिद शिरनाये ।
हृदया कपट निमाज गुजारै कह भो मक्का जाये ॥ ३ ॥
हिंदू एकादशि चौबिस, रोजा मुसलम तीस बनाये ।
ग्यारह मास कहौ किन टारौ ये केहि माहँ समाये ४॥
पूरब दिशि में हरिको वासा पश्चिम अलह मुकामा ।
दिलमें खोज दिलैमें देखो यहै करीमा रामा ॥ ५ ॥
जो खोदाय मसजिदमें बसतुहै और मुलुक केहि केरा।
तीरथ मूरति राम निवासी दुइ महँ किनहुं न हेरा॥६॥
वेद किताव कीन किन झूठा झूठा जो न विचारै ।
सब घट माहँ एक करि लेखै भै दूजा करि मारै ॥७॥
जेते औरत मर्द उपाने सो सब रूप तुम्हारा ।
कबिर पोंगड़ा अलह रामका सो गुरु पीर हमारा ८॥
अल्लह राम जीव तेरी नाईं । जन पर मेहर होहु तुम साईं १
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे श्रीरामचन्द्र ! कोई तुमको अल्लाह कहैहै कोई
रामकहैहै हिंदू मुसल्मान दोउनमें शरीरभेद है जीव तो एकईहै सबमें
बिभु चैतन्य तुमहौ। अरु चैतन्यजीव है सो ज्योति तुम्हारी है हिंदू मुसल्मानको
आत्मा तुम्हारी है तुमदूनोंके साईंहौ ताते तुम्हारे जन जे हैं हिंदू तुरुक दोऊ हैं
तिनके ऊपर मेहरवानी करौ अर्थात् दयाकरौ ॥ १ ॥