कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( ३९३ )
साहब कहैहैं या संसाररूपी नगरकी कोतवाली को करै जौने नगरमें शरीर-
रूपी मांस फैलाहै । गीध जो निरंजन काल सो रखवारहै औ जहां जीवको स्वरूप
ज्ञान जो मूसरूप नाव ताके बिलार कड़हारियाहै कहे गुरुवालोग औ दादुर जो
जीवहै सो सोवैहै प्राण जो सर्प सो पहरी हैं पै ई नानाशरीरमें लैजाइहैं औ
गाय जो गायत्री सो आपने तात्पर्य छपाय राख्यो सो बांझ भई औ बैल जो
शब्द ब्रह्म सो बियाय है कहे नाना ग्रन्थरूप बछवा भये तेई बछवाको तीनि
तीनि सांझ दुहैहैं अर्थात् रजोगुणी तमोगुणी सतोगुणी सब वाही को दुहैं हैं
कहे पढ़ै सुनैहैं औ सिंह जो विवेक है सो सियार जो कुमति तासों रोजही जूझैहै
सो कबीर जो है जीव ताको पद जो है मेरो धाम ताको कोई विरला बूझै है जे
मेरे धाम को बूझै हैं ते संसारते छूटि जायहैं ॥ ४ ॥
इति पंचानबे शब्द समाप्त ।
अथ छानबे शब्द ॥ ९६ ॥
काकाहि रोवहुगे बहुतैरा । बहुतक गये फिरे नहिं फेरा ॥१॥
हमरी बात वतैं न संभारा । वात गर्भकी तैं न बिचारा ॥२॥
अब तैं रोया क्या तैं पाया । केहि कारण तैं मोहि रोवाया ३
कहै कबीर सुनो नर लोई । कालके वशहि परौ मति कोई ४
का कहिकै रोवोहो बहुत तरहते कि, ये हमारे भाईहैं, ई बाप हैं, ईपुत्र हैं
बहुत यही तरहते गयेहैं फेरि नहीं फेरेफिरे हैं ॥ १ ॥ सो जब जब हमको
तेरो दुःखदेखिकै करुणाभई हमारो वा तोको उपदेश दियो सो तू न सँभारे
जो क़रार किये तैं कि, मैं भजन करौंगो । सो न बिचारे । साहबको भजन न
कियो । अबतैं गर्भमें जाय जाय संसारमें आय आयकै रोवै है कहे दुःखपावैहै
सो क्या तैं पाये अब हमको तैं काहे रोवावैहैं तेरो दुःख देखिकै मोको दुःख
होय है सो कबीरजी कहैहैं कि, हे नर लोगो! साहबको जानौगे तबहीं कालते
बचोगे सो साहबको भुलायकै काहे कालके बशपरौहो संसार दुःखपावौहो ॥४॥
इति छानबे शब्द समाप्त ।