कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३९२ ) बीजक कबीरदास ।
आत्माकी ज्योति मिलायकै वहि ज्योति को दैमारचो कहे छोड़्यो अर्थात
सबको निराकरण कै कैवल्य शरीरमें प्राप्त भयो अरु वहूको छोड़्यो तब आ-
त्माकी ज्योति कहां समाईहै सो कहै हैं जीवके मुक्त भये पर परम परपुरुष
श्रीरामचन्द्र हंसस्वरूप जेइहैं तामें टिकिकै साहबकी सेवा जीव करैहै यह
ज्ञानतौ जीवजानै नहीं है वही ब्रह्म प्रकाश को जानिराख्यो है कि हमैंहीं
ब्रह्महैं सो जब मनको निराकरण है गयो तब ब्रह्महू को हैजाय है तब आत्मै
रहिजाय है याते मनै को अनुभव ब्रह्महै सो जौने हंस स्वरूपमें वा ज्योति
समाईहै ताको बिचारकरो ॥ २ ॥
चारिवेद ब्रह्मा निजकहिया तिनहुं न या गति जानी ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ बूझहु पंडित ज्ञानी ॥ ३ ॥
ब्रह्मा चारिवेदकह्नों तिनमें यहकह्यो कि मुक्तभये पर विग्रहको लाभ होयहै॥
“मुक्तस्य विग्रहो लाभः”॥इत्यादिक श्रुति आंखही कह्यों तऊ न जान्यो काहेतें
जो जानते तौ जगत् की उत्पत्ति न करते हंसस्वरूपमें टिकिकै साहबकें लोक-
को चले जाते सो कबीरजी कहै हैं कि हे संतौ ! सुनौ जाके सारासार बिचा-
रिणी बुद्धिहोय सो पंडित कहावै सोई पंडितहै सो हे ज्ञानिउ ! जिन संपूर्ण
असारको छोड़ि कै सार जे साहबहैं तिनको ग्रहण कैलियो ऐसे जे पंडितहैं
तिनसों बूझो वहगति वोई बूझैहैं तबहीं तिहारो धोखा ब्रह्म छूटैगो ॥ ३ ॥
इति चौरानबे शब्द समाप्त ।
अथ पंचानबे शब्द ॥ ९५ ॥
कोअसकरैनगरकोतवालिया। मासुफैलाय गीधरखवारिया १
मूस भो नाव मँजारि कँडहरिया। सोवै दादुर सर्प पहरिया २
बैल वियाय गायभै बाँझा । बछवै दुहिया तिनतिन साँझा ३
नितउठि सिंहस्यारसौं जूझै । कविरक पद जन विरला बूझै ४