सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 425, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 425

शब्द । ( ३७७ )
नैको नारसिंहोऽप्यनेकधा । वैकुंठोऽपि हयग्रीवो हरिः केशववामनौ ॥ यज्ञो नारा-
यणो धर्मपुत्रो नरवरोऽपिच । देवकीनंदनःकृष्णो वासुदेवो बलोऽपिच ॥ पृष्णि-
गर्भो मधून्मथी गोविंदो माधवोऽपिच । वासुदेवो मरोऽनंतःसंकर्षण इरापतिः॥
प्रद्युम्नोऽप्यनुरुद्धश्च व्यूहास्सर्वेऽपि सर्वदा । रामं सदोपतिष्ठन्ते रामदेहा व्यव-
स्थिताः ॥ ऐतैरन्यैश्च संसेव्यो रामो नाम महेश्वरः । तेषामैश्वर्यदातृत्वात्तन्मू-
लत्वान्निरीश्वरः ॥ इंद्रनामा स इंद्राणां पतिस्साक्षी गतिः प्रभुः । विष्णुस्स्वयं
स विष्णूनां पतिर्वेदंतकृद्विभुः ॥ ब्रह्मा सब्रह्मणां कर्त्ता प्रजापतिपतिर्गतिः । रुद्रा-
णां सपती रुद्रःकोटिरुद्र नियामकः ॥ चंद्रादित्यसहस्राणि रुद्रकोटिशतानि च ।
अवतारसहस्राणि शक्तिकोटिशतानि च ॥ ब्रह्मकोटिसहस्राणि दुर्गाकोशतानि च ।
महाभैरवकालादिकोट्यर्बुदशतानि च ॥ गंधर्वाणां सहस्राणि देवकोटिशतानि च ।
सभां यस्य निषेवंते स श्रीराम इतीरितः '' ॥ इति ॥ औ कबीरहू जी को प्रमा-
ण॥ “जहँ सतगुरु खेलैं ऋतुबसंत । तहँ परम पुरुष सब साधु संत ॥ वह तीन
लोकते भिन्नराज । तहँ अनहद धुनि चहुँ पास बाज॥ दीपक बरै जहँ निराधार ।
बिरलाजन कोई पाव पार ॥ जहँ कोटिकृष्ण जोरे दुहाथ । जहँ कोटिविष्णुनावैं
सुमाथ ॥ जहँ कोटिन ब्रह्मा पढ़ पुरान । जहँ कोटि महादेव धरैं ध्यान ॥ जहँ
कोटि सरस्वति करैं राग । जहँ कोटि इन्द्र गावने लाग ॥ जहँ गण गंधर्व मुनि
गनि न जाहिं । सो तहँवां परकट आपु आहिं॥तहँ चोवा चन्दन अरु अबीर । तहँ
पुहुपबास भरि अतिगँभीर ॥ जहँ सुरति सुरङ्ग सुगन्धलीन । सब वही लोकमें
बास कीन ॥ मैं अजरदीप पहुँच्च्यो सुजाइ । तहँ अजर पुरुषके दरश पाइ ॥
सो कह कबीर हृदया लगाइ । यह नरक उधारण नाम जाइ ॥ १० ॥
इति छियासीवां शब्द समाप्त ।
अथ सत्तासीवां शब्द ॥ ८७ ॥
कबिरा तेरो घर कंदलमें मनै अहेरा खेलै ।
बपुवारी आनंद मीर्गा रुची रुची शरमेलै ॥ १ ॥
चेतत रावल पावन भंडा सहजहि मूलै बांधै ।
ध्यान धनुष धरि ज्ञान वान बन योग सार शर साधै ॥ २ ॥