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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 431

शब्द । ( ३८३ )
गोरख पवन रखै नहिं जाना योगयुक्ति अनुमाना ।
ऋद्धि सिद्धि संयम बहुतेरा पारब्रह्म नहिं जाना ॥ ३ ॥
वशिष्ठ शिष्ट विद्या संपूरण राम ऐसे शिष शाखा ।
जाहि रामको करता कहिये तिनहुंक काल न राखा ॥४॥
हिन्दूकहै हमें लै जरवै तुरुककहै मोर पीर ।
दूंनों आय दीनमों झगरैं देखैं हंसकबीर ॥ ५ ॥
आगेके पदमें कहि आये काल श्वासा गहे है सो चेति पांसा ढारो कहैं
बिचारि बिचारि कामकरो सोई बिचार बतावै है ।
संत महंतौ सुमिरौ सोई । जो कालफांससों बाचा होई॥१॥
साहब कहै हैं कि, हे संतमहंतौ ! ताको सुमिरन करो जो कालफांसतें
बचो होइ ॥ १ ॥
दत्तात्रेय मर्म नहिं जाना मिथ्या स्वाद भुलाना ।
सलिला मथिकै घृतको काढ़यो ताहि समाधि समाना॥२॥
जो कहो दत्तात्रेय अपनें कों ब्रह्म मानिकै ब्रह्मही ह्वैगये तेतो वाके मर्मकों
कहै ज्ञानको जान्यो है सो प्रथम दत्तात्रेयऊ नहीं जान्यो काहेते कि वहतों
धोखा मिथ्या है सो तेऊ मिथ्यास्वादमें भुलाइ गये यह न बिचारचो कि,
जौन बिचार करत करत रहिजाय है सो मेरो स्वरूप परम पुरुष पर श्रीराम-
चन्द्रको दास है जब वे बिग्रह देइ हैं आपनो तब उनके पास जाइ है
सो यह तो न जान्यो पानी को मथिकै घृत कढ़्यो वही धोखा ब्रह्मकी समाधिमें
समाइ रह्यो सो कहुं पानिहूते घृत निकसै है उनके हाथ धोखई लग्यो ॥ २ ॥
गोरख पवन रखै नहिं जाना योगयुक्ति अनुमाना ।
ऋद्धि सिद्धि संयम बहुतेरा पारब्रह्म नहिं जाना ॥ ३ ॥