कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( ३७९ )
ह्वैकै ता ज्योतिरूपी डोरीमें गुरुजो युगुति बतावै है तौनी युगुति ते सुरतिके
साथ जब जीवको साजि दियो तब छहउ चक्र को आपही वह ज्योति बेधै है
सो वह ज्योतिके भीतर ह्वैकै षट्चक्र बेधिकै सहस्रदल कमळको बेध्यो तब
उहां उजियारी देख्यो जाइ ब्रह्म प्रकाशकी तब काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर
ई जे सावज हैं तिनको हांकि दीन्ह्यो कहे दूरिकै दीन्ह्यो ॥ ३ ॥
गगन मध्य रोंक्यो सो द्वारा जहां दिवस नहिं राती ।
दास कबीर जाय सो पहुंच्यो सब बिछुरे संग सँघाती४
जहां सुरति कमलमें परमगुरु रकार मकार कहै हैं औ दशौ द्वार बंदहैं
तहां न दिवसहै न रातिहै वह प्रकाशरूप ब्रह्मई है । सो उहां परम गुरुते राम-
नाम सुनिकै वही नामते दशवों द्वार खोलिकै वही डोरी ह्वैकै दासजो कबीर
जीव है सो परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र के लोकको पहुंचे जाइहैं तब संगके
संघाती जे हैं चारिउ शरीर अरु प्रकाशरूप ब्रह्म जो है कैवल्य शरीर ताहूको
बिछोह ह्वैजाई है।अथवा कबीरजी कहै हैं किं, मैं जो हौं साहबको दास सो अनि-
र्वचनीय पार्षद शरीर जो है हंसशरीर ताकों पाइकै वोही डोरी ब्रह्मज्योति ह्वै
कै अनिर्वचनीय जो है साहबको धाम तहाँ पहुँच्योजाई । तहां हे जीवो ! तुमहूं
पहुँचौ यह भ्रममें काहे परेहौ तुम तौ साहबके आनंदकन्द धामके हौ
साहबके दास ताते रहित औ जौन तुम मानौ हौ सो तुम नहीं हौ ॥ ४ ॥
इति सत्तासीवां शब्द समाप्त ।
अथ अट्ठासीवां शब्द ॥ ८८ ॥
गुरुमुख ।
सावज न होइ भाई सावज न होइ ।
वाकी मांसु भखै सब कोई ॥ १ ॥
सावज एक सकल संसारा अविगति वाकी बाता ।
पेट फारि जो देखिये रे भाई आहि करेज न आता ॥ २ ॥