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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 439

शब्द । ( ३९१ )
अथ चौरानबे शब्द ॥ ९४ ॥
कहौ निरंजन कवनी बानी ।
हाथ पांव मुख श्रवण न जिह्वा का कहि जपहु हो प्रानी॥१॥
ज्योतिहि ज्योतिज्योति जो कहिये ज्योति कौनसहिदानी ।
ज्योतिहि ज्योति ज्योति द्वैमार तब कहँ ज्योति समानी २॥
चारिवेद ब्रह्मा निज कहिया तिनहुं न यागति जानी ।
कहै कबीर सुनो हो संतो बूझहु पंडित ज्ञानी ॥ ३ ॥
जो कहौ मनहीं ते यह संसार है औ जब मनते छूटेगो तब ब्रह्मही है जाइ
गो तामें श्री कबीरजी कहै हैं ॥
कहौ निरंजन कवनी बानी ।
हाथ पांय मुख श्रवण न जिह्वा काकहि जपहु हो प्रानी॥ १॥
ज्योतिहि ज्योति ज्योति जो कहिये ज्योति कौन सहिदानी।
ज्योतिहि ज्योति ज्योति द्वैमारै तब वह ज्योति समानी॥२॥
कहौतौ निरंजन ब्रह्मको कौनी वाणीते कहौहौ वाको तौ मन बचनके प
कहौहौ तामें प्रमाण॥"यतो वाचो निवर्तंते अप्राप्य मनसा सह"॥इति श्रुतेः॥
अरु वाको तो बिना नाम रूप को कहौ हौ वाको कैसे जपौहौ औ कैसे ध्यान
करौहौ॥१॥जो कहो वह प्रकाशरूप ब्रह्म है सो प्रकाशको ध्यान करैं हैं प्रकाशमें
अपने आत्माको मिलाइ देइहैं ब्रह्म हमहीं है जाइहैं सो ज्योतिस्वरूप जो ब्रह्महै
तामैं अपने आत्माकी ज्योति ज्योतिकै कहे मिलाइकै जो कहिये वह ज्योति कौन
सहिदानी रहिजाइहै अर्थात् जब सब पदार्थ मिथ्या मानत मानत एक प्रकाशरूप
ब्रह्ममान्यो ताको मान्यो कि वहि ब्रह्म हमहीं ब्रह्म हैं सो जब :भर यह माने
रह्यो कि वह ब्रह्म हमहीं हैं तबभर तो तिहारो अनुभव रहैहै औ जब अनुभवऊ
मिटिगयो तब तुम्हीं रहिजाउहौ तब वहि ब्रह्मकी कौन सहिदानी रहिजाइ है
अर्थात् कछु नहीं रहिजाय है तुम्हीं रहि जाउ हौ यही प्रकार जब ब्रह्मज्योति