कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( ३८१ )
प्रमाण ॥ “शब्दे ब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात्परे यदि । श्रमस्तस्य श्रमफलं-
ह्यधेनुमिव रक्षत” । इतिभागवते ॥ सो जब वे गुरुवा मंत्र दियो तब बाणी
को जो हाड़ गोड़ रहै ज्ञानकांड कर्मकांड ताको घूर पैंवारि दियो कहे ज्ञानकांड
कर्मकांड घूर हैं तहां फेंकि दियो । उपासनाकांडी वह मंत्र दैके उपासनामें
लगाइ दियो तहां मंत्र दियो सो उन न जप्यो जाते ज्ञानाग्नि उत्पन्न होइ अरु भ्रम
जरै औ धुवां जे हैं कल्मष ते निकसि जायें सो बाणीरूपी वह मांसु ज्ञानाग्निते
पकाइ नहीं गई अर्थात् वह मंत्रको अर्थ न जान्यो औ न अभ्यास कियो वह
अज्ञानरूपी धुवां गुँगुआतै रह्यो निर्धूम न भई ॥ ३ ॥
शिर औ सींग कछू नहिं वाके पूछ कहां वह पाई ।
सव पंडित मिलि धन्धे परिया कबिरं बनौरी गाई॥४॥
औ शिर जेहैं नित्य शब्द औ कार्यशब्द ते वाके नहीं हैं औ चारि जे सींग
हैं नाम धातु उपसर्ग निपात ते वाके नहीं हैं काहेते कि, वाको अनिर्वचनीय कहैहैं।
तौ पूंछ जोहै ब्रह्म ह्वैजैबो मोक्ष ताको कहां पावैगो अर्थात् जहांभर बचनमें आवैहै
सो सब मिथ्याहै जो कहो मोक्षउको रहि जाइबो न कह्यो तो रहि का गयो । तो
शब्द तो तात्पर्य करिकै वर्णन करैहैं कि, निर्गुण सगुणके परे परम पुरुष जो मैं
ताको सदाको अंश यह जीव है यह जो बिचार करै कि, मैं उनको हौ तौं
बद्धही नहीं है मुक्त काहेते होइ मुक्तही बनोहो बद्ध मुक्ततो कथन मात्रहै तामें
प्रमाण ॥ “अज्ञानसंज्ञौभवबंधमोक्षौ द्वौ नामनान्यौ स्त ऋतज्ञभावात्। अजस्रचि-
न्त्यात्मनि केवलेपरे विचार्य्यमाणे तरणाविवाहनी”इति भागवते॥ अरु तात्पर्ब्य
करिकै शब्द यह मोहींको वर्णन करैहै सो भागवतादिकनमें प्रसिद्ध सुनैहै तऊ
मूढ़ नहीं मानै है ॥ “शब्दब्रह्मपरब्रह्मममोभे शाश्वतीतन्नू” ॥ अपने अपने अर्थ
बनाइकै गाइ रहैहैं मोको नहीं जानै हैं सब पंडित धंधेमें परि रहे हैं नानामत
बनाइ रहेहैं तिनकी बनौरीको कबीर जे हैं जीव उनके सब शिष्य ते गावै हैं
अर्थात् अपने अपने आचार्यन के मंतमें आरूढ़ ह्वैकै जो और कोई कहैहै तौ
लड़ै हैं अरु पारिख करिकै सब वेदनको तात्पर्य जो मैं हौं ताको नहीं जानै हैं
शब्द ब्रह्म तात्पर्य करिकै परम पुरुष पर जो मैं हौं ताहीको वर्णन करे हैं॥४॥
इति अठासीवां शब्द समाप्त ।