कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( ३८७ )
भरथरिगोरखगोपीचंदा। तामनमिलिमिलिकियोअनंदा ४
जा मनको कोइ जान न भेवा।ता मन मगन भये शुकदेवा ५
एकल निरंजन सकलशरीरा।तामें भ्रमि भ्रमि रहल कबीरा ६
जो कहि आये कि नाना उपासना करि सांच साहबको न जान्यो सो
इहां कहैं ॥
ता मनको चीन्हौ रे भाई । तनुछूटे मन कहां समाई ॥१॥
सनक सनंदन जयदेव नामा।अम्बरीष प्रहलाद सुदामा॥२॥
भक्त सही मन उनहुं न जाना।भक्तिहेतुमनउनहुं न ज्ञाना ३
जा मनते नाना उपासना भई ता मनको हे भाई ! चीन्हौ यह मन के कों
भयो है अर्थात् जौने मनते नाना उपासना ठाढ़ीकै लियो है सो मनतों तुम-
हींते भयो है सो यह विचारतो करो जब सब शरीर छूटि जाइ है तब मन
कहां समाइहै अर्थात् तुम्हीं में समाइ जाइ है सो मनके मालिकतौ तुमही
मनैते जो नाना उपासना ठाढ़ कै लियो है ते तुम्हारी उपासना सांच कैसे
होइगी ॥ १ ॥ सनक सनंदन सनत्कुमार नामदेव जयदेव अंबरीष प्रहलाद
सुदामा ये सब भक्त सही हैं संसारते छूटै हैं परन्तु मनको वोऊ न जान्यों
जो मनको जानते तौ मनते भिन्नहै कै मनबचनके परे जो मेरो रामनाम है
ताहीको जपते । और औरेकी भक्तिको कारणजो है मन तेहि करिकै उनहूंको
मेरो प्रथमज्ञान न होतभयो फेरि जब और २ सवासनमें कुछ न देख्यो तब
साहब कहै हैं कि मोमें लगे काहेते कि वह मन आपैते होईहै अरु वह जीवा-
त्माके परे मैं हौं काहेते कि यह मन आत्मैते होईहै अरु वह जीवात्माके परें
मैंहौं काहेते कि मेरो अंशहै अरु ध्यानादि ज्ञानादिक सब मनते अनुमान करै
हैं ताते ज्ञानको अनुभव ब्रह्म औ ध्यान को अनुभव उपास्य देवता ये मनके
भीतर होवई चाहैं औ मन आत्माको है ताते मनमें आत्माको स्वरूप कैसे
आइ सकै वहतो मनते परे है सो जब मनको छोड़ै है तब चिन्मात्र राहि जाइ