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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 430

( ३८२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ नवासीवां शब्द ॥ ८९ ॥
सुभागे केहि कारण लोभ लागे रतन जन्म खोये ।
पूरव जन्म भूमिके कारण बीज काहेको बोये ॥ १ ॥
पानीसे जिन पिंडै साजे अगिनिहि कुंड रहाया ।
दशै मास माताके गर्भ कढ़ि बहुरि लागिली माया ॥ २॥
बालकसे पुनि वृद्ध हुआहै होनी रही सो होये ।
जब यम ऐहैं बांधि लैजैहैं नयन भरी भरि रोये ॥ ३ ॥
जीवनकै जिन आशा राख्यो काल गहे है श्वासा ।
बाजीहै संसार कबीरा चित चेति ढारो पासा ॥ ४ ॥
हे सुभागे ! जीव तैंतो मेरौ है यह संसारमें जो तैं लोभकियो सो कौने
कारण कियो काहेते कि आपने दुःख पाइबे को कोई उपाइ नहीं करैहै जैसे
मनादिक करिकै संसारमें परिगयो तैसे जो मेरो स्मरणकरत तो मैं हंसस्व-
रूपदेत्यों तामें स्थितह्वैकै मेरे धामको पहुँचते । सो तैं रत्न जोहै यह मानु-
षजन्म ताको खोइदारचो पूर्वजन्मकी भूमिकाके कारण कहे पूर्वजन्ममें जैसे
कर्म करिराखे हैं तैसे सुख दुःख यह जन्म पावै है अरु जो यह जन्म करै है
सो वह जन्ममें दुःख सुख पावैगो सो आंखिन तो देखि लिये कोई सुखदुःखके
कारण रूप बीज तैं काहेको बोये और सब पदनको अर्थ स्पष्टई है ॥ १।४ ॥
इति नवासीवां शब्द समाप्त ।
अथ नब्बे शब्द ॥ ९० ॥
गुरुमुख ।
संत महन्तौ सुमिरौ सोई । जो छलफांदसों बाचा होई १
दत्तात्रेय मर्म नहिं जाना मिथ्यास्वाद भुलाना ।
गोरख मथिकै घृतको काढ्यो ताहि समाधि समान ॥२॥