कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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ये चारि तुकनमें जिनको कहि आये हैं तिनको काल जब खाइ लियो है कहै
इनके शरीर जब छूटि गये हैं तब ये कहां बास कियो है यह कोई खबरि न
जानतभयो सो जहां गये हैं अरु जहांके गये नहीं आवैहैं तौने लोकको मूढ़जीव न
जानतभये इहां नरसिंहौ जीकौ लिख्यो तामें:धुनि यहहै कि उपासक आपने आपनें
उपास्यनके साथ साहबही के लोक जाइ हैं उपास्य उपासक दोऊ जहां परम
मुक्तावस्था में जायँसो वह साहब के लोकको ये बद्धविषयी जीव कैसे जानैं ॥ ६ ॥
चौपर खेल होत घट भीतर जन्मके पांसा ढारा ।
दम दमकी कोई खबरि न जानै करि न सकै निरुवारा॥७॥
मन बुद्धि चित्त अहंकार ये अंतःकरण चतुष्टय हैं सोई चौपरि है ताको खेल
घटके भीतर है रह्योहै इनहींके योगते नाना जन्म होइहैं सोई पांसा ढारिबो है
सो दम दम कहे आपने श्वास श्वासकी खबरि तौ कोई जानै नहीं है कि
आवत जातमें रकार मकार बिना जपे कब अंतःकरण शुद्ध हैसकैहै अरु कौं
निरुवार कारिसकै है अर्थात् कोई निरुवार नहीं करिसकै है अर्थात् या नहीं
जानैहै कि हमारो जीवात्मा कहां जैपैहै रकार मकार जीवात्मा सदा जैपैहै
तामें "प्रमाण रकारेण बहिर्याति मकारेण विशेत्पुनः । राम रामेति वै मंत्रं जीवौ
जपति सर्वदा" ॥ ७॥
चारि दिशा महि मंड रचो है रूम साम बिच दिल्ली ।
ता ऊपर कुछ अजब तमाशा मारे है यम किल्ली ॥ ८ ॥
महिमंडल जोहै शरीर तामें नाभि हृदय कंठ त्रिकुटी ये चारि दिशा रचत
भये अरु रूमकहे सहस्रदल कमलहै अरुसाम सुरति कमल है तौ ने सुरति कसलकें
बीचमें दिल्ली है परंतु गुरुको स्थान तास्थानके ऊपर अजब तमाशाहै । सो कौन
योगी प्राण चढ़ाइके सहस्र दल कमलों जाइहै कोई परम योगी प्राण चढ़ाइकै
सुरति कमलों जाइहै परमपुरुष स्थानके ऊपर जहां अजब तमाशाहै तहां
कोई नहीं जाइ सकैहै काहेते कि यमकिल्ली मारे है कहे दशवां दुवार बंद कियेहैं
अजब तमाशा वह कैसे देखै सो कहैहैं कि यह ब्रह्म रंध्रते साकेत लोक जाको कहै
हैं परमपुरुषपर श्रीरामचन्द्रको धाम वही साकेत लोकको दशवां स्थान फकीर