कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३९० ) बीजक कबीरदास ।
बूझैहै कि हम यहि मनते भिन्नहैं । निर्जीव जो मन है ताके आगे सजीव जो है
आत्मा ताको राखि देइहै कहे मिलाइ देइहै आंधरनको यह नहीं सूझि परै है कि,
चित् जीवको जड़नमें मिलाइ जड़ काहे करैहै औआत्मा देहको एकही मानै है॥ २ ॥
ताजि अमृत विष काहेको अँचवै गांठी बांधो खोटा ।
चोरनको दिय पाट सिंहासन शाहुको कीन्हो ओटा ॥३॥
अमृत जो है आपने आत्माको स्वरूप ताको छोड़िके बिष जो है मन तामें
लगिकै नाना पदार्थनमें लागिबो तो है ताको काहेते अँचवै हैं कि गांठीमें
खोट जो मनहै ताको बांधे हैं सो काहैं सो काहे बांधे हैं मनते भिन्ननहीं है जाइहै
आत्मा के स्वरूपको भुलाइकै मन में लगाइ देनवारे औ साहब को भुलाइ
देनवारे औ संसारमें डारि देनवारे ऐसे जे गुरुवा लोगहैं तिनको पाट सिंहा
सन देइ है कहे उनको गुरु करैहै औ शाहु जे साधु जनहैं मनते छोड़ाय देन-
वारे जे साहबको बताइ देइँ आत्माको स्वरूप जनाइकै तिनको ओट कीन्हे है कहैं
उनको दर्शनई नहीं लेइ है ॥ ३ ॥
कह कबीर झूठे मिलि झूठा ठगही ठग व्यवहारा ।
तीनलोकं भरि पूरै रह्योहै नाहीं है पतियारा ॥ ४ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि ऐसे जे लोगहैं ते झूठा जो मनको अनुभव ब्रह्महै
तामें मिलिकै झूटे है रहे हैं ठगै ठगको व्यवहार है रह्यो है सो तीन लोक में
वही भरपूरि रह्यो है सो पतिआइबे लायक नहीं है जो ठगमें लगैहै सो ठगही
है जाइहै जो कहो तीनलोकमें तौ साधुहूँहैं पतिआइबे लायक कोई न रह्यो यह
कैसे तो कबीर जी कहै हैं कि साधुजन तीनलोकके बाहरईहैं बे तीनलोकके भीतर
नहीं हैं काहेते कि तीनि लोक मनको पसाराहै अरु वे मनते भिन्न हैं ॥ ४ ॥
इति तिरानबे शब्द समाप्त ।