सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 437

शब्द । ( ३८९ )
अथ तिरानबे शब्द ॥ ९३ ॥
वाबू ऐसो है संसार तिहारो येकलि है ब्यवहारा ।
को अब अनख सहै प्रतिदिनको नाहिं न रहनि हमारा ॥१॥
सुमृति सुभाव सवै कोई जानै हृदया तत्त्व न बूझै ।
निरजिव आगे सरजिव थापै लोचन कछुव न सूझै ॥२॥
तजि अमृत विष काहेको अंचवै गांठी बांधो खोटा ।
चोरनको दिय पाट सिंहासन शाहुको कीन्हो ओटा ॥३॥
कह कबीर झूठो मिलि झूठा ठगहीठग व्यवहारा ।
तीनिलोक भरि पूरि रह्यो है नाहीं है पतियारा ॥ ४ ॥
वाबू ऐसो है संसार तिहारो येकलि है ब्यवहारा ।
को अव अनख सहै प्रतिदिनको नाहिंन रहनि हमारा ॥१॥
बाबू कहे हे जीवो ! तिहारो यह संसार ऐसोहै कि एक जो है मन ताहीके लिये
यह संसारको व्यवहारहै अरु वहीके छोड़ेते संसार छुटि जाइहै तामें प्रमाण॥ “मन
एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः”॥ तामें कबीरजीको प्रमाण ॥ “मुक्ति नहीं
आकाशमें मुक्ति नहीं पाताल । जब मनकी मनसा मिटै तबहीं मुक्ति विशाल”॥
सो यह मनकी प्रतिदिनकी अनख कौन सहै अर्थात् अणुजो जीवहै ताको
प्रतिदिन खाइ लेइहै कहे अपनेमें मिलाइ लेइहै सो रोजरोजकों याकें स्वरूपको
भुलाइबो कौन सहै यह मन हमारे रहनि माफिक नहीं है यह जड़ हम चैतन्य
याते हम कैसे मिलैंगे ॥ १ ॥
सुमृति सुभाव सवै कोई जानै हृदया तत्त्व न बूझै ।
निरजिव आगे सरजिव थापै लोचन कछुव न सूझै ॥२॥
सो यहि तरहते मनको स्वभाव सुमृति जे स्मृति है तामें बर्णन है सो
सबै कोई जानै है परन्तु हृदयमें जो मनको तत्त्वकहे स्वरूपहै ताको कोई नहीं