कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३७८ ) बीजक कबीरदास ।
षट चक्र वेधि कमल बेध्यो जब जाइ उज्यारी कीन्हा ।
काम क्रोध अरु लोभ मोह ये हांकि साउजन दीन्हा ॥ ३॥
गगन मध्य रोंक्यो सो द्वारा जहां दिवस नहिं राती ।
दास कबीर जाय सो पहुंच्यो सब बिछुरे संग सँघाती॥४॥
कबिरा तेरो घर कंदलमें मनै अहेरा खेलै ।
बपुवारी आनंद मीर्गा रुची रुची शरमेलै ॥ १ ॥
कबीरजी कहै हैं कि हे कबीर ! कहे कायाके बीरजीव तेरोघर कंदलामें है
कहे आनंदको कंद कहे सार जो साहबको धाम है तहां है। जो कहो संसार कैसे
भयो तौ तेरोबपु शिकारी बपुरी जो है नाना शरीर तेई वारी हैं । शिकारी जहां
हांकै है सो वारी कहावै है।तहां जाइकै विषयानंद ब्रह्मानंद जे हैं मृगाको शिकार
खेलै हैं कोई विषयानंदरूप मृगामें वृत्ति शर मारि भोग करै हैं कोई शिकारी
मन ब्रह्मानंदरूप मृगाको वृत्ति शर मारि भोग करै हैं ॥ १ ॥
चेतत रावल पावन षंढा सहजहि मूलै बांधै ।
ध्यान धनुष धरि ज्ञानवान बन योग सार शर साधै २॥
षट चक्र वेधि कमल बेध्यो जब जाइ उज्यारी कीन्हा ।
काम क्रोध अरु लोभ मोह ये हांकि साउजन दीन्हा ३
जो शिकार खेलबो कैसे छूटै या मनको तौ रावल कहे सबके राजा ताकों
पावन कहे पायनको चेत करत कहे स्मरण करत अथवा पावन कहे पवित्र
हैकै षंढ कहे नपुंसक ब्रह्म तद्रूप जो जीव सो सहज समाधि लगाइकै
मूलबंध करै यहै ध्यान जोहै धनुष् तौनेको धरिकै साहब में आत्मा को लगाय
दीबो जो बाण यही योगसार रूप शर साधै ॥ २ ॥ सोई योग बतावै हैं
जे हठ योग करै हैं ते कुंडलिनी उठायके छहउ चक्र बेधै हैं यहां कुछ कुंडलि
नी उठाइबेको प्रयोजन नहीं है वह जो ब्रह्म ज्योतिकारकी मूलाधार चक्रते लै
ब्रह्मांड है साकेतमें लगीहै सो छहउ चक्र को बेधिकै लगी है सुषुम्णा नाड़ी