कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( ३६४ ) बीजक कबीरदास ।
जो जीव जयदेव सो कातै है अर्थात् अहंब्रह्म बुद्धि जब समष्टि जीव कियोहै
तबहीं मनकी उत्पत्ति भई कर्म भयो है संसार प्रकट भयो है ॥ २ ॥
तीन लोक ताना तनो ब्रह्मा विष्णु महेश ।
नाम लेत मुनि हारिया सुरपति सकल नरेश ॥ ३ ॥
तीनलोक जोहै सोई ताना तन्यो है ताको तीनि खूंटाहैं रजोगुण ब्रह्मा
मृत्युलोक के सतोगुण विष्णु आकाशके तमोगुण महेश पातालके। अरु अनेक जे
नामहैं अनेक जे मतहैं अनेक जे ज्ञान हैं वेदमें सोई कपरा तयारभयो तिनको
नाम लेत मुनि औ इंद्र औ सबराजा हारिगये। वही ब्रह्मरूपी कपराके गठियामें
कसे रहिगये वासों निकसिकै मुक्ति न पावत भये अर्थात् मोको न जानत भये ॥३॥
बिन जिह्वा गुण गाइया बिन वस्ती का गेह ॥
सूने घर का पाहुना तासों लावै नेह ॥ ४ ॥
कहत का भये कि बिन जिह्वा जो गुण गावै है कहे अजपा जो है सोहं
तौने अजपाको साथ गाइकै कहे जपि जपिकै बिन बस्तीको गेह जो है ब्रह्म
झूठा तौने कपराके गठिया के भीतर बँधि जातभये कहे यह मानत भये कि
हमहीं ब्रह्महैं । सो वह घरतो देशकाल बस्तु परिच्छेदते शून्य है सो जैसे सूनें
घरमें पाहुना जाय औ कुछ न पावै तैसे जीव उहां कुछ न पावतभयो
येतौ रामनामको जगतमुख अर्थ करि सब यह कपरा बिनो अरु श्रीकबीरजी
साहबमुख अर्थकरि कौन कपरा बिनै हैं सो कहे हैं ॥ ४ ॥
चारि वेद केंडा कियो निराकार किय रास ।
बिनै कबीरा चूनरी पहिरैं हरिके दास ॥ ५ ॥
चारिवेद को केंडा करिकै औ निरङ्कारको राशि बनाइकै वही निरङ्कारके
भीतरते निकासि लैजाइकै । अर्थात् प्रकाशरूप ब्रह्म कौनको प्रकाशै ? तब यह
बिचारेउ साहबके लोकको प्रकाशहै । लोक कौनको है । यही बिचार करिबो है
ब्रह्मते वेदको तात्पर्य निकसिबो है सो चारिउ वेदको केंडा करिकै ब्रह्म जो है
राशि तौनेते वेदको तात्पर्य निकासि रामनामकी चूनरी श्रीकबीरजी कहैं कि
: is it a 'ख'?
Wait, look at गूंंटा? Why would it be गूंंटा?
In standard Bijak Shabd 81:
"ब्रह्मा विष्णु महेश खूंटा भये तब वाल्मीक शुकदेव जयदेव कहवां रहे"
Yes! The word is ALWAYS "खूंटा" (the peg for weaving on the loom / tana-bana)! "ताना तानि गये, खूंटा भये"!
A loom uses pegs (खूंटा).
Yes, 100% "खूंटा"!
Wait, let's re-verify "मंदिरवाजै" vs "मंदिर वाजै":
In line 15:
त्रिकुटि कुँडल मधि मंदिरवाजै औघट अंबर भीजै ॥४॥
Is there a space between मंदिर and वाजै?
Look at मंदिर and वाजै: they touch or almost touch, under a continuous shirorekha! Yes, मंदिरवाजै.
Everything looks extremely accurate and thoroughly verified.शब्द । ( ३६५ )
मैं बिनौहौं । ताको हरिके जानिवेमें दक्ष कहैं दक्ष जे कोई बिरले दासहैं ते पहि-
रै हैं अर्थात् रामनाम जपिकै साहबको जानैं हैं । यहि पदमें वाल्मीकि को शुकदे-
वको जयदेवको जो अर्थ हम
( ३६६ ) बीजक कबीरदास ।
बाजै है अर्थात् पराबाणी उहैं तें निकसै है . सोई पश्यंती तें मध्यमा आइ वैख-
रीमें प्रकट होइ है । षटचक्रको बेधिकै कुण्डलिनी शक्ति नागिनी जायहै ताके
साथ त्रिगुण ते युक्त जो एक सगुणजीव है सो जायहै सो वाकी विधि आगे
लिखि आये हैं । सो वृषभ तो वहां नहीं चलै है औ कोल्हू जो कुंडलिनीशक्ति
सो मांजै कहे देह मांजिकै उठै है सो पांच हजार कुंभक कियो तब श्वासनते
तपित होइहै अथवा खेचरीतें सुधाबिंदु वाके ऊपर पर्यो ताकी शीतलता पाइकै
उठै है सो ब्रह्मांड में जाइकै अर्थात् जेतने रोज समाधि लगायो तेतने दिन रही
ताके साथ जीवहू गयो।सो कहै हैं किं,ब्रह्मांड जोरजोगुणहै ताको योगाग्निमें होमि
दियो सो रजोगुण जरयो तौ तमोगुण जरै है । अरु भक्ष जो जीवहै सो नाभीके
जलमें रह्यो तहांतें चलिकै गगन जो ब्रह्मांडहै तहां गाजै है कहै यह कहै है कि
महीं मालिक हौं ॥ १ ॥ २ ॥
नितै अमावस नितै ग्रहण होय राहु ग्रास नित दीजै ।
सुरभी भक्षण करै बेद मुख घनबरसै तन छीजै ॥ ३ ॥
पुहुमिक पानी अंबर भरिया यह अचरज को कीजै ।
त्रिकुटी कुंडल मधि मंदिर बाजै औघट अंबर भीजै ४
खेचरी की दृष्टि तीनहै तामें एक पूर्णिमाहै कहे सर्वत्र पूर्ण देखै है । औ
ऊर्ध्वदृष्टि प्रतिपदा है । औ अंतरदृष्टि अमावस है । सो जब अंतर खेचरी चढ़ी
औ काऊपूतरी आकाशमें वेधी कहे ऊर्ध्वदृष्टि प्रतिपदा में बेधी तब अंधकार अविद्या
ग्रहण ह्रैकै चैतन्यको छाइ लियो । अर्थात् प्रथम अंधकार देखोपर्यो और कछु न
देखि पर्यो । पुनि बिजुली ऐसी चमकी तब तारागण वीर्य है ताकी गति मालूम
भई।तब प्रथम सूर्य मण्डल पुनि चंद्र मण्डल देखोपर्यो ।सो वही ज्योतिमें लीन
रहैहैं समाधि लगी रहैहै जब समाधि उतरी तब जीवको अमावस भई तममें पर्यो
आइ । तब सूर्य प्रकाश देखत रह्यो ताको मायारूपी राहु ग्रसि लियो अथवा जब
नागिनिको सुधा पिआवैहै तब बहुत दिनकी समाधि लगैहै।अब जौन पुरुष रोज
समाधि लगावैहै औ उतरै है सो कहैहैं जब समाधि चढ़ाय लैगयो तब याको
अमावस ह्रैगयो पुनि तममें पर्यो औ नित्य ग्रहण होइहै वे चंद्रमा औ सूर्य दुइ
शब्द । ( ३६७ )
नाड़ीहैं तिनकों सुषुम्णारूपी राहु ग्रास देइहै अर्थात् ग्रसन करावै है वही सुषु-
म्णामें लीन कै देइहै। जब समाधि लगी तब सुरभी जोहै गायत्री माया कुंडलि-
नी शक्ति सो वेदमूख बाणी भक्षण कैलियो अर्थात् बाणीरहित ह्वैगयो। औ तन
छीनै है कहे दूबर ह्वै जाइहै सो घन बरसै है कहै सुधा बरसै है याते बनो रहै
है। पुहुमी का पानी जब अंबरमें भरन लगैहै कहे नीचे को वीर्य ब्रह्मांडमें चढ़ा-
वन लगैहै तब शिशे की सराई बनाइकै लिंगद्वार में डारै है पानी खेंचैहै जब
राह साफ़ ह्वै जाइहै तब पवनके साथ वीर्य चढ़ैहै तब पवन वीर्यके साथ जीवात्मा
चढ़ि जाइहै त्रिकुटी में त्रिबेणीको स्नान करिकै दशौ अनहद सुनन लाग्यो तामें
मंदिर कहे मृदंगौ हैं सो बाजै हैं औ घटते कहे बङ्कनालकी राहते जब जीवात्मा
जाइहै तब अम्बर जो है गैबगुफाको आकाश सो भीजै है अर्थात् उहां वीर्य
पहुंचि जाइहै सो यह आश्चर्य का कीजै ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनौ हो संतो योगिन सिद्धि पियारी ।
सदा रहे सुख संयम अपने वसुधा आदि कुंवारी ॥ ५ ॥
सो कबीरजी कहै हैं कि हे संतौ ! यहि तरहकी जो सिद्धिहै सो योगिनकों
पियारिहै सो प्रथमतौ सिद्धिही नहीं होइहै जो घुनाक्षर न्याय ते सदा सुख
संयम में रहै औ सिद्धि भई समाधि लगी ताते फेरि वैसेही योगी भये अथवा
पुहुमीपति भये योग करिकै हम यह शरीरके मालिक ह्वैगये मनादिक हमारे
बश ह्वैगये परंतु जब यह शरीर छूटि जाइहै और शरीर होइहै तब वह-सुधि
सब भूलि जाइहै अरु जब पुहुमीपति भयो आपनेको राजा मानि लियो सो जब
मरिगयो तब पुहुमी आनही की ह्वै जाइहै पृथ्बी कुमारिही रहि जाइहै ॥ ५ ॥
इति बयासीवां शब्द समाप्त ।
अथ तिरासीवां शब्द ॥ ८३ ॥
भूला वे अहमक नादाना । तुम हरदम रामहिं ना जाना १
बरबस आनिकै गाय पछारा गला काटि जिउ आप लिया ।
जीता जिव मुरदा करि डारै तिसको कहत हलाल किया २
( ३६८ ) बीजक कबीरदास ।
जाहि मासुको पाक कहतहैं ताकी उतपति सुनु भाई ।
रज वी रजसों मासु उपानी मासु नपाक जो तुम खाई ॥३॥
अपनो दोष कहत नहिं अहमक कहत हमारे बड़ैन किया ।
उसकी खून तुम्हारी गर्दन जिन तुमको उपदेश दिया॥४॥
स्याही गई सफेदी आई दिल सफेद अजहूं न हुआ ।
रोजा निमाज बांग क्या कीजै हुजरै भीतर बैठ मुआ॥५॥
पंडित वेद पुराण पढ़ै औ मोलनापढ़ै सो कुराना ।
कह कबीर वे नरकगये जिन हरदम रामहिं ना जाना॥६॥
१-५ तक के पदको अर्थ स्पष्टई है अंतके छठे तुकको अर्थ करैहैं। सब समें-
टिकै जे हरमद कहे हर साइत श्वास श्वाशमें रामको नहीं जानते हैं ते नादान
कहे बेवकूफ भूले अथवा हरदम कहे हरएकके दम कहे प्राणमें अंतर्यामी रूपतें
ब्यापक परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र को जे बेवकूफ नहीं जानते हैं ते मोलना
पंडित भूलिगये जो वे आपने हुजरामें बैठिकै रोजा निमाज किया औ कुरान
किताब पढ़ा औ जो पंडित अपने घरकी कोठरीमें एकांत बैठिकै बहुत वेद
शास्त्र को पढ़ा तौ का किया आखिर नरकही में गये [अत्र पूर्ण देखें] कि काहूकों
न सुन्यो कि बिना रामको जाने मुक्त ह्वैगये ॥ ६ ॥
इत तिरासीवां शब्द समाप्त ।
अथ चौरासीवां शब्द ॥ ८४ ॥
काजी तुम कौन किताब बखाना ।
झंखत बकत रह्यो निशि बासर मति एकौ नहिं जाना॥१॥
शक्ति न माने सुनति करतहौ मैं न बदौंगा भाई ।
जो खोदाय तुव सुनति करतहै आपुहिं काटि किन आई॥२॥
शब्द । ( ३६९ )
सुनाति कराय तुरुक जो होना औरत की का कहिये ।
अर्द्धशरीरी नारि वखानै ताते हिंदू रहिये ॥ ३ ॥
घालि जनेऊ ब्राह्मण होना मेहरीको क्या पहिराया ।
वो तौ जन्म कि शूद्रिनि परुसा सो तुम पांडे क्यों खाया ॥४॥
हिंदू तुरुक कहांते आया किन यह राह चलाई ।
दिलमें खोज खोजु दिलहीमें भिश्त कहां किन पाई ॥५॥
कहै कबीर सुनोहो संतो जोर करतुहौ भारी ।
कविरन ओट रामकी पकरी अंत चला पचिहारी ॥ ६ ॥
काजी तुम कौन किताब बखाना ।
झंखत बकत रहौ निशिवासर मति एकौ नहिं जाना॥ १ ॥
हे काजी ! तुम कौन किताबको बखानत रहौहौ। निशिबासर वही किताबकों
बकत रहौहौ अरु बाहीमें झंखत कहे शंका करत रहौहौ सो कुरान किताब
तात्पर्यते जो एक साहबको बर्णन करै है ताको जो तुम्हारी मति न जानत
भई तौ तुम कुरान किताबकी एकऊ बस्तु न जानत भये ॥ १ ॥
शक्ति न माने सुनति करतहौ मैं न बदौँगा भाई ।
जो खोदाय तुव सुनति करति तौ आपु काटि किन आई२॥
घालि जनेऊ ब्राह्मण होना मेहरी को क्या पहिराया ।
वोतो जन्म की शूद्रिनि परुसा सो तुम पांडे क्यों खाया ३॥
सुनति किये जो मानतेहौ कि,हम मुसलमान हैं औ या नहीं मानते हौ कि,
शक्ति जो माया सोई करैहै सो हे भाई ! मैं न बदौँगा जो खोदाय तेरी सुनति
करतो तौ पेटही ते कटी आउती ॥ २ ॥ सो हे पंडित ! आपनी आत्माकों
साहबकी शक्ति न मान्यो। अरु ब्रह्मसाहबको न जान्यो जनेऊ पाहिरिकै तुमतों
ब्राह्मणभये औ अपनी मेहरीको कहा पहिरायौहै जाते वह ब्राह्मणी भई सों
२४
( ३७० ) बीजक कबीरदास ।
तिहारी स्त्री तो जन्मकी शूद्रिनिहै सो परुसैहै औ हे पांडे ! तुम खाउहौ तातें
तुम कैसे ब्राह्मण भये ब्राह्मण तौ ब्रह्म जानेते कहावैहै ॥ ३ ॥
हिन्दू तुरुक कहांते आया किन यह राह चलाई ।
दिलमें खोज खोजु दिलहीमें भिश्त कहां किन पाई॥४॥
आत्मातौ एकईहै हिंदू तुरुक ये शरीरके भेदहैं यह शरीर कहां ते आयोहै
औ यह राह कौन चलायो है अर्थात् बीचैते आये हैं बीचैते जायँगे सो दिलमें
तुम खोजौ उसका खोज दिलही में है औ कौन भिश्त पायोहै अर्थात् खोदा-
यका बंदा जो तिहारो जीवात्मा है जो हिंदू तुरुकमें एकई है सो तिहारे दिल-
हीहै उसको जानो तो जानि परै उसके मिलनको खोज कहै राह वही
आत्माहै जब आपने स्वरूपको जानोगे तब वाको पावोगे ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जोर करतु है भारी ।
कविरन ओट रामकी पकरी अंत चला पचिहारी ॥५॥
कबीरजी कहैहैं कि हे संतौ! सुनौ
शब्द । ( ३७१ )
अथ पचासीवां शब्द ॥ ८५ ॥
भूला लोग कहै घर मेरा ।
जा वर वामें फूला डोलै सो घर नाहीं तेरा ॥ १ ॥
हाथी घोडा बैल वाहनो संग्रह कियो घनेरा ।
वस्तीमें से दियो खदेरी जंगल कियो बसेरा ॥ २ ॥
गांठी बांधी खरच न पठयो बहुरि कियो नहिं फेरा ।
बीबी बाहर हरम महलमें बीच मियांको डेरा ॥ ३ ॥
नौ मन सूत अरुझि नहिं सुरझै जन्म २ अरुझेरा ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ यहि पद करो निबेरा ॥४॥
भूला लोग कहै घर मेरा ।
जा घरवा में फूला डोलै सो घर नाहीं तेरा ॥१॥
साहबको पार्षदरूप जो है हंसस्वरूप आपनो सांच शरीर ताको भूले लोग
कहैहैं कि यह मिथ्या जो स्थूलशरीर सो हमारौहै सो जा घर स्थूल शरीरमें तैं
फूलाडोलै है मेरो शरीरहै सो तेरा घर कहे शरीर नहीं है ॥ १ ॥
हाथी घोडा बैल वाहनो संग्रह कियो घनेरा ।
वस्ती मेंसे दियो खदेरी जंगल कियो बसेरा ॥ २ ॥
गांठी बांधी खरच न पठयो बहुरि कियो नहिं फेरा ।
बीबी बाहर हरम महल में बीच मियां को डेरा ॥ ३ ॥
बहुत हाथी घोड़े बैल इत्यादिक बाहनको संग्रह कियो परंतु जब तैं शरीर
रूपी बस्तीते खदेरि जाइगो कहे शरीर छूटि जाइगो तब जंगलमें कहीं पीपर के
तर भूत हैकै बसेर कहे बास करैगो अरु वह शरीरहूको बाहर खदेरिलै श्मशा-
नमें जारि देइँगे तब वह हाथी घोड़े औरहीके है जाइँगे ॥ २ ॥ गांठी बांधि-
धरचो अरु खर्च न पठयो कहे पुण्य न कियो जो वह लोकमें मिलिकै बहुरिकै
( ३७२ ) बीजक कबीरदास ।
फेरा न कियो कहैं यह शरीरमें नहीं पावैहै सो बीबी जो है साहबकी दई
सुरति सो बाहरहै कहे संसार मुख है रही है औ हरम कहे लौंडी जो है माया
सो महलमें है कहै सब शरीरन में है ताके बीचमें मियां जो है जीव ताको डेराहै
ताकों वह माया घेरे है ॥ ३ ॥
· नौमन सूत अरुझि नहिं सुरझै जन्म जन्म अरु झेरा ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ यहि पद करो निवेरा ॥४ ॥
सों नौमन कहे नित्यही नवीन जो मनहै अर्थात् मनके दिये नाना शरीर
होयहैं सो नाना कर्म नाना मत जे सूतहै तिनमें अरुझिकै सुरझै नहीं है सो
कबीरजी कहैहैं कि हे संतो! यह पद को निबेरा करो कहे पाँचौं शरीरमें अरुझो
जो है मन ताते भिन्नहोउ तौ तुम शरीरनते भिन्न ह्वैजाउ ॥ ४ ॥
इति पचासीवां शब्द समाप्त ।
अथ छियासीवां शब्द ॥ ८६ ॥
कबिरा तेरो घर कँदलामें या जग रहत भुलाना ।
गुरुकी कही करत नहिं कोई अमहल महल देवाना ॥ १॥
सकल ब्रह्ममें हंस कबीरा कागन चोंच पसारा ।
मन मत कर्म धरै सब देही नाद बिंदु विस्तारा ॥ २ ॥
सकल कबीरा बोलै बानी पानीमों घर छाया ।
लूट अनंत होत घट भीतर घटका मर्म न पाया ॥ ३ ॥
कामिनि रूपी सकल कबीरा मृगा चरिंदा होई ।
बड़ बड़ ज्ञानी मुनिवर थाके पकरि सकै नहिं कोई॥ ४ ॥
ब्रह्मा वरुण कुबेर पुरंदर पीपा प्रहलद चाखा ।
हिरणाकुश नख उदर विदारा तिनहुंक काल न राखा॥५॥
शब्द । ( ३७३ )
गोरख ऐसो दत्त दिगम्बर नामदेव जयदेव दासा ।
उनकी खबरि कहत नहिं कोई कहां कियेहैं वासा ॥ ६ ॥
चौपर खेल होत घट भीतर जन्मके पांसा ढारा ।
दमदमकी कोइ खबरि न जानै करि न सकै निरवारा॥७॥
चारि दिशा महिमंड रचोहै रूम साम बिच दिल्ली ।
ता ऊपर कछु अजब तमाशा मारैहैं यम किल्ली ॥ ८ ॥
सब अवतार जासु महिमंडल अनत खड़ो कर जोरे ।
अद्भुत अगम अथाह रचोहै ई सबशोभा तोरे ॥ ९ ॥
सकल कबीरा बोलै बीरा अजहुं हो हुशियारा ।
कह कबीर गुरु सिकिली दर्पण हरदम करो पुकारा॥१०॥
कबिरा तेरो घर कँदलामें या जग रहत भुलाना ।
गुरुकी कही करत नहिं कोई अमहल महल देवाना ॥ १ ॥
कबीरजी कहैहैं कि हे कबिरा! कायाके बीर जीव तेरो घर तो कँदलामें है
कहे आनंदको कंद कहे सारांश जो है साहबको धाम तहां है तेरो घर या
जगवमें नहीं है तैं नाहक भुलान रहै है यहां गुरु कहे सबते श्रेष्ठ जे परमपुरुष
पर श्रीरामचन्द्र कहै हैं कि अबहूं जो मोको जानो तौ मैं कालते छोड़ाइ लेउँ
तिनको कह्यो कोई न मानिकै अरु आनंदको कंद उनको धाम छोड़िकै अमहल
महल कहे जो कछु वस्तु नहीं है ऐसो जो है धोखा ब्रह्म तामें अरु कोई
माया के प्रपंचमें देवाना है रह्यो है ॥ १ ॥
सकल ब्रह्ममें हंस कबीरा कागन चोंच पसारा ।
मन मत कर्म धरै सबदेही नाद विन्दु विस्तारा ॥ २ ॥
हे हंस! कबीर कायाके बीर जीवते साहबको ब्रह्मही कहै हैं तिनको कहिबों
कागन कैसी चोंचको पसारिबों है जैसे कागनके आगे जो दूध भात औ
( ३७४ ) बीजक कबीरदास ।
आमिष धरिदेउ तौ दूध भात न खायँ आमिषहीं खायँ तैसे साहब पुकारतई
जायहैं कि तुम मेरे पास आवो मैं तुमको हंसरूप देउँ ताको छोड़िके जीव
माया ब्रह्मके धोखामें लग्यो कागई होइहै नाना कर्मके बासनन ते शरीर
छूटतमें जहां २ मन को मत होइहै कहे जहां २ मन जाइहै तहां २ सब देह
धरै है नाद बिंदुके बिस्तारते सो नाद बिंदुको बिस्तार लिखि आये हैं ॥ २ ॥
सकल कबीरा बोलै बानी पानी मों घर छाया ।
लूट अनंत होत घट भीतर घटका मर्म न पाया ॥ ३ ॥
अरु ज्ञानी जे सब जीवहैं ते यह बाणी बोलै हैं कि यह शरीर पानी कों
घर छायाहै कहे पानीको बुल्ला है न जानो कब बिनशि जाय कहे छूटि जाय
सो मुखते तो यह कहै है अरु घट कहे शरीरके भीतर अनंत कहे बिना अंतको
मोहै साहब ताकी लूटि होइजाइहै ताको नहीं देखैहै यह आत्मा साह-
बको है तोको भुलाइकै औरे मतनमें लगाइ देइहै वाको मर्म नहीं पावैहै॥३॥
कामिनि रूपी सकल कबीरा मृगा चरिंदा होई ।
बड़ बड़ ज्ञानी मुनिवर थाके पकरि सकै नहिं कोई॥४॥
सब कबीर जीवनके शरीर कामिनि रूपीहै कहे मृगीरूपी है तामें जो चलै
सो चरिंदा कहावैहै सो चरिंदा कहे चलनवारो जोहै मन सो मृगाहै जब यह
जीवात्माको यमदूत एकपुतरा देखावै हैं तब वह पुतरामैं मनोमय जो लिंग
शरीरहै सो जात रहै है अरु वही के साथ जीव प्रवेश करिजाइहै तब यमराज
नाना कर्म भोग करावै हैं जौने शरीरमें मन लोभ्यो मरतमें वाको स्मरण भयों
सोई शरीर कर्म भोग करिकै धारण कियो सो मारितौ यह भांतितो जायहै वह
मंत्रको औ आत्मा के स्वरूपको कोई न पकरिपायो अर्थात् कोई न जान्यो ॥४॥
ब्रह्मा वरुण कुबेर पुरंदर घीपा प्रहलद चाखा ।
हिरणाकुश नख उदर बिदारा तिनहुँक काल न राखा५
गोरख ऐसो दत्त दिगम्बर नामदेव जयदेव दासा ।
उनकी खबार कहत नहिं कोई कहां किये हैं वासा ॥६॥
शब्द । ( ३७५ )
ये चारि तुकनमें जिनको कहि आये हैं तिनको काल जब खाइ लियो है कहै
इनके शरीर जब छूटि गये हैं तब ये कहां बास कियो है यह कोई खबरि न
जानतभयो सो जहां गये हैं अरु जहांके गये नहीं आवैहैं तौने लोकको मूढ़जीव न
जानतभये इहां नरसिंहौ जीकौ लिख्यो तामें:धुनि यहहै कि उपासक आपने आपनें
उपास्यनके साथ साहबही के लोक जाइ हैं उपास्य उपासक दोऊ जहां परम
मुक्तावस्था में जायँसो वह साहब के लोकको ये बद्धविषयी जीव कैसे जानैं ॥ ६ ॥
चौपर खेल होत घट भीतर जन्मके पांसा ढारा ।
दम दमकी कोई खबरि न जानै करि न सकै निरुवारा॥७॥
मन बुद्धि चित्त अहंकार ये अंतःकरण चतुष्टय हैं सोई चौपरि है ताको खेल
घटके भीतर है रह्योहै इनहींके योगते नाना जन्म होइहैं सोई पांसा ढारिबो है
सो दम दम कहे आपने श्वास श्वासकी खबरि तौ कोई जानै नहीं है कि
आवत जातमें रकार मकार बिना जपे कब अंतःकरण शुद्ध हैसकैहै अरु कौं
निरुवार कारिसकै है अर्थात् कोई निरुवार नहीं करिसकै है अर्थात् या नहीं
जानैहै कि हमारो जीवात्मा कहां जैपैहै रकार मकार जीवात्मा सदा जैपैहै
तामें "प्रमाण रकारेण बहिर्याति मकारेण विशेत्पुनः । राम रामेति वै मंत्रं जीवौ
जपति सर्वदा" ॥ ७॥
चारि दिशा महि मंड रचो है रूम साम बिच दिल्ली ।
ता ऊपर कुछ अजब तमाशा मारे है यम किल्ली ॥ ८ ॥
महिमंडल जोहै शरीर तामें नाभि हृदय कंठ त्रिकुटी ये चारि दिशा रचत
भये अरु रूमकहे सहस्रदल कमलहै अरुसाम सुरति कमल है तौ ने सुरति कसलकें
बीचमें दिल्ली है परंतु गुरुको स्थान तास्थानके ऊपर अजब तमाशाहै । सो कौन
योगी प्राण चढ़ाइके सहस्र दल कमलों जाइहै कोई परम योगी प्राण चढ़ाइकै
सुरति कमलों जाइहै परमपुरुष स्थानके ऊपर जहां अजब तमाशाहै तहां
कोई नहीं जाइ सकैहै काहेते कि यमकिल्ली मारे है कहे दशवां दुवार बंद कियेहैं
अजब तमाशा वह कैसे देखै सो कहैहैं कि यह ब्रह्म रंध्रते साकेत लोक जाको कहै
हैं परमपुरुषपर श्रीरामचन्द्रको धाम वही साकेत लोकको दशवां स्थान फकीर
( ३७६ ) बीजक कबीरदास ।
लोग जाहूत कहे हैं। तहांलों ब्रह्म ज्योतिकी डोरी लगी है वही डोरीकों मक्र-
तार कहैहैं सो वह मक्रतार सुषुम्णामें लगोहै जब परमगुरु रामनाम बताई है
तब बही सुषुम्णा हैकै मक्रतारकी डोरी हैकै साहब के लोक जाय है तहां-
अजब तमाशा कौनहै कि उहांके त्रिगुण गुल्म लता देखे तो पांचभौतिकं से
परेहै पै पांचभौतिक नहीं है आनंदरूप है ॥ ८ ॥
सब अवतार जासु महि मंडल अनँत खड़ो कर जोरे ।
अद्भुत अगम अथाह रचो है ई सब शोभा तोरे ॥ ६ ॥
सकल अवतार औ ईश्वर अनंत जिनके आगे कर जोड़े खड़े हैं वह साहब
लोक कैसो है अद्भुतहै कहे आश्चर्य है बचनमें नहीं आवै है औ अगमहै कहे
उहां काहूकी गम नहीं है औ अथाह है कोई बर्णन करिकै थाह नहीं पायो कि
यतनैहै सो हे जीव! यह सब शोभा तोरे साहबकी है तेरे देखिबे योग्यहै काहेते
कि साहबौ द्विभुजहै औ तैंहूं द्विभुजहै और तो सब ईश्वर अवतार कोई अष्टभुज
कोई चतुर्भुज मत्स्य कूर्म इत्यादिक हैं अथवा साहबके लोकमें जे ईश्वर अव-
तार आदिक हैं ते सब अपनी शोभाको मंडल तोरे हैं अर्थात् उनकी शोभा
साहबकी शोभाते मंद देखि परैहै ॥ ६ ॥
सकल कबीरा बोलै वीरा अजहूं हो हुशियारा ।
कह कबीर गुरु सिकिली दर्पण हरदम करो पुकारा ॥१०॥
हे सब कबीरौ! कायाके बीर जीवौ वही बीरा लेऊ अर्थात् परम पुरुष पर
जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको बीरालेउ अजहूं हुशियार होऊ जे मतनमें गुरुवा
लोग समुझाइ समुझाइ लगाइ दिये हैं तिन मतनमें जब भर तुम रहौगे तब
भर तुम्हारो जन्म मरण न छूटैगो ताते मतनको छोड़िदे सुरति कमलमें जेपरम
गुरुहैं ते सिकिलीगरहैं तुम्हारे अंतःकरण साफ करिबेको ते राम बतावै
हैं सो वा राम नाम सुनिकै हरदम पुकार करो तब साहबके इहां पहुंचौ
अरु सब अवतार ईश्वर उनके द्वारे हाथ जोरे खड़े हैं तामें प्रमाण शिवसंहि-
तामें हनुमान्जी प्रति अगस्त्यजी कहै हैं ॥ “आसीनं तमयोध्यायां सहस्र-
स्तम्भमंडिते । मंडपे रत्नसंज्ञे च जानक्या सह राघवम् ॥ मत्स्यःकूर्मःकिरि-
शब्द । ( ३७७ )
नैको नारसिंहोऽप्यनेकधा । वैकुंठोऽपि हयग्रीवो हरिः केशववामनौ ॥ यज्ञो नारा-
यणो धर्मपुत्रो नरवरोऽपिच । देवकीनंदनःकृष्णो वासुदेवो बलोऽपिच ॥ पृष्णि-
गर्भो मधून्मथी गोविंदो माधवोऽपिच । वासुदेवो मरोऽनंतःसंकर्षण इरापतिः॥
प्रद्युम्नोऽप्यनुरुद्धश्च व्यूहास्सर्वेऽपि सर्वदा । रामं सदोपतिष्ठन्ते रामदेहा व्यव-
स्थिताः ॥ ऐतैरन्यैश्च संसेव्यो रामो नाम महेश्वरः । तेषामैश्वर्यदातृत्वात्तन्मू-
लत्वान्निरीश्वरः ॥ इंद्रनामा स इंद्राणां पतिस्साक्षी गतिः प्रभुः । विष्णुस्स्वयं
स विष्णूनां पतिर्वेदंतकृद्विभुः ॥ ब्रह्मा सब्रह्मणां कर्त्ता प्रजापतिपतिर्गतिः । रुद्रा-
णां सपती रुद्रःकोटिरुद्र नियामकः ॥ चंद्रादित्यसहस्राणि रुद्रकोटिशतानि च ।
अवतारसहस्राणि शक्तिकोटिशतानि च ॥ ब्रह्मकोटिसहस्राणि दुर्गाकोशतानि च ।
महाभैरवकालादिकोट्यर्बुदशतानि च ॥ गंधर्वाणां सहस्राणि देवकोटिशतानि च ।
सभां यस्य निषेवंते स श्रीराम इतीरितः '' ॥ इति ॥ औ कबीरहू जी को प्रमा-
ण॥ “जहँ सतगुरु खेलैं ऋतुबसंत । तहँ परम पुरुष सब साधु संत ॥ वह तीन
लोकते भिन्नराज । तहँ अनहद धुनि चहुँ पास बाज॥ दीपक बरै जहँ निराधार ।
बिरलाजन कोई पाव पार ॥ जहँ कोटिकृष्ण जोरे दुहाथ । जहँ कोटिविष्णुनावैं
सुमाथ ॥ जहँ कोटिन ब्रह्मा पढ़ पुरान । जहँ कोटि महादेव धरैं ध्यान ॥ जहँ
कोटि सरस्वति करैं राग । जहँ कोटि इन्द्र गावने लाग ॥ जहँ गण गंधर्व मुनि
गनि न जाहिं । सो तहँवां परकट आपु आहिं॥तहँ चोवा चन्दन अरु अबीर । तहँ
पुहुपबास भरि अतिगँभीर ॥ जहँ सुरति सुरङ्ग सुगन्धलीन । सब वही लोकमें
बास कीन ॥ मैं अजरदीप पहुँच्च्यो सुजाइ । तहँ अजर पुरुषके दरश पाइ ॥
सो कह कबीर हृदया लगाइ । यह नरक उधारण नाम जाइ ॥ १० ॥
इति छियासीवां शब्द समाप्त ।
अथ सत्तासीवां शब्द ॥ ८७ ॥
कबिरा तेरो घर कंदलमें मनै अहेरा खेलै ।
बपुवारी आनंद मीर्गा रुची रुची शरमेलै ॥ १ ॥
चेतत रावल पावन भंडा सहजहि मूलै बांधै ।
ध्यान धनुष धरि ज्ञान वान बन योग सार शर साधै ॥ २ ॥
( ३७८ ) बीजक कबीरदास ।
षट चक्र वेधि कमल बेध्यो जब जाइ उज्यारी कीन्हा ।
काम क्रोध अरु लोभ मोह ये हांकि साउजन दीन्हा ॥ ३॥
गगन मध्य रोंक्यो सो द्वारा जहां दिवस नहिं राती ।
दास कबीर जाय सो पहुंच्यो सब बिछुरे संग सँघाती॥४॥
कबिरा तेरो घर कंदलमें मनै अहेरा खेलै ।
बपुवारी आनंद मीर्गा रुची रुची शरमेलै ॥ १ ॥
कबीरजी कहै हैं कि हे कबीर ! कहे कायाके बीरजीव तेरोघर कंदलामें है
कहे आनंदको कंद कहे सार जो साहबको धाम है तहां है। जो कहो संसार कैसे
भयो तौ तेरोबपु शिकारी बपुरी जो है नाना शरीर तेई वारी हैं । शिकारी जहां
हांकै है सो वारी कहावै है।तहां जाइकै विषयानंद ब्रह्मानंद जे हैं मृगाको शिकार
खेलै हैं कोई विषयानंदरूप मृगामें वृत्ति शर मारि भोग करै हैं कोई शिकारी
मन ब्रह्मानंदरूप मृगाको वृत्ति शर मारि भोग करै हैं ॥ १ ॥
चेतत रावल पावन षंढा सहजहि मूलै बांधै ।
ध्यान धनुष धरि ज्ञानवान बन योग सार शर साधै २॥
षट चक्र वेधि कमल बेध्यो जब जाइ उज्यारी कीन्हा ।
काम क्रोध अरु लोभ मोह ये हांकि साउजन दीन्हा ३
जो शिकार खेलबो कैसे छूटै या मनको तौ रावल कहे सबके राजा ताकों
पावन कहे पायनको चेत करत कहे स्मरण करत अथवा पावन कहे पवित्र
हैकै षंढ कहे नपुंसक ब्रह्म तद्रूप जो जीव सो सहज समाधि लगाइकै
मूलबंध करै यहै ध्यान जोहै धनुष् तौनेको धरिकै साहब में आत्मा को लगाय
दीबो जो बाण यही योगसार रूप शर साधै ॥ २ ॥ सोई योग बतावै हैं
जे हठ योग करै हैं ते कुंडलिनी उठायके छहउ चक्र बेधै हैं यहां कुछ कुंडलि
नी उठाइबेको प्रयोजन नहीं है वह जो ब्रह्म ज्योतिकारकी मूलाधार चक्रते लै
ब्रह्मांड है साकेतमें लगीहै सो छहउ चक्र को बेधिकै लगी है सुषुम्णा नाड़ी
शब्द । ( ३७९ )
ह्वैकै ता ज्योतिरूपी डोरीमें गुरुजो युगुति बतावै है तौनी युगुति ते सुरतिके
साथ जब जीवको साजि दियो तब छहउ चक्र को आपही वह ज्योति बेधै है
सो वह ज्योतिके भीतर ह्वैकै षट्चक्र बेधिकै सहस्रदल कमळको बेध्यो तब
उहां उजियारी देख्यो जाइ ब्रह्म प्रकाशकी तब काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर
ई जे सावज हैं तिनको हांकि दीन्ह्यो कहे दूरिकै दीन्ह्यो ॥ ३ ॥
गगन मध्य रोंक्यो सो द्वारा जहां दिवस नहिं राती ।
दास कबीर जाय सो पहुंच्यो सब बिछुरे संग सँघाती४
जहां सुरति कमलमें परमगुरु रकार मकार कहै हैं औ दशौ द्वार बंदहैं
तहां न दिवसहै न रातिहै वह प्रकाशरूप ब्रह्मई है । सो उहां परम गुरुते राम-
नाम सुनिकै वही नामते दशवों द्वार खोलिकै वही डोरी ह्वैकै दासजो कबीर
जीव है सो परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र के लोकको पहुंचे जाइहैं तब संगके
संघाती जे हैं चारिउ शरीर अरु प्रकाशरूप ब्रह्म जो है कैवल्य शरीर ताहूको
बिछोह ह्वैजाई है।अथवा कबीरजी कहै हैं किं, मैं जो हौं साहबको दास सो अनि-
र्वचनीय पार्षद शरीर जो है हंसशरीर ताकों पाइकै वोही डोरी ब्रह्मज्योति ह्वै
कै अनिर्वचनीय जो है साहबको धाम तहाँ पहुँच्योजाई । तहां हे जीवो ! तुमहूं
पहुँचौ यह भ्रममें काहे परेहौ तुम तौ साहबके आनंदकन्द धामके हौ
साहबके दास ताते रहित औ जौन तुम मानौ हौ सो तुम नहीं हौ ॥ ४ ॥
इति सत्तासीवां शब्द समाप्त ।
अथ अट्ठासीवां शब्द ॥ ८८ ॥
गुरुमुख ।
सावज न होइ भाई सावज न होइ ।
वाकी मांसु भखै सब कोई ॥ १ ॥
सावज एक सकल संसारा अविगति वाकी बाता ।
पेट फारि जो देखिये रे भाई आहि करेज न आता ॥ २ ॥
( ३८० ) बीजक कबीरदास ।
ऐसी वाकी मांसुरे भाई पल पल मांसु बिकाई ।
हाड़ गोड़ लै घूर पँवारै आगि धुवां नहिं खाई ॥ ३ ॥
शिर औ सींग कछू नहिं वाके पूंछ कहां वह पाई ।
सब पण्डित मिलि धन्धे परिया कविर वनौरी गाई ॥४॥
सावज न होइभाई सावज न होइ।वाकी मांसु भखैसब कोई १
साहब कहैं हैं कि, जेहि शब्द ब्रह्ममें तुम लगे हौ और तुमको वही भुलाय
दियो सो सावज न होइ तैने शब्दको तात्पर्य तुम नहीं बूझो वहीके मांसको
तुम सब भक्षौहौ कहे बाणी सब कहौहौ औ वही मांस सब जगत्है ताहीको
भक्षौहै कहे भोग करौहौ अरु वाको तात्पर्य सत्य पदार्थ जो मैंहौं ताको नहीं
जानौहौ संपूर्ण बाणीको बिस्तार असत्यहै मैंहीं सत्यहौं ॥ १ ॥
सावज एक सकल संसारा अबिगति वाकी बाता ।
पेट फारि जो देखिये रे भाई आहि कलेज न आता २
सो वाको पेट फारिकै जो देखिये अर्थात् जो वाको विचारिकै देखिये तात्प-
र्य्यते तो जो तुम बिचार करिराख्यो है कि शब्द ब्रह्मके अर्थ को सारांश कलेज
निर्गुण ब्रह्म है सो नहीं है वेदतो तात्पर्य ते मोको बर्णन करै है अरु त्रिगुण
माया आंतहै सो वाकी बात अबिगति है कहे अव्यक्त है काहूके जानिबैं योग्य
नहीं है जो मोको जानै है सोई वह सावज को जानै है ॥ २ ॥
ऐसी वाकी मांसुरे भाई पल पल मांसु बिकाई ।
हाड़ गोड़ लै घूर पँवारै आगि धुवां नहिं खाई ॥ ३ ॥
पल का कहावै है सो वह शब्द ब्रह्मकी मांसु जो हैबाणी सोहे भाइउ! ऐसी
है कि, पल पल कहे टका टका कों बिकोइहै अर्थात् को बिकाईहै तामें प्रमाण॥
"कबीरजीकों चौरासी अंगकी साखी॥" "गली गली गुरुवा फिरैं दिक्षा हमरी लेहु ।
कीं बूड़ौ की उबरौ टका परदनी देहु"॥ थोरे थोरे अक्षरके मंत्र गुरुवा लोग
देइहैं औ शिष्यनसौं धन लेइहैं अरु केवल शब्द ब्रह्मैते मुक्ति नहीं होइहै तामें
शब्द । ( ३८१ )
प्रमाण ॥ “शब्दे ब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात्परे यदि । श्रमस्तस्य श्रमफलं-
ह्यधेनुमिव रक्षत” । इतिभागवते ॥ सो जब वे गुरुवा मंत्र दियो तब बाणी
को जो हाड़ गोड़ रहै ज्ञानकांड कर्मकांड ताको घूर पैंवारि दियो कहे ज्ञानकांड
कर्मकांड घूर हैं तहां फेंकि दियो । उपासनाकांडी वह मंत्र दैके उपासनामें
लगाइ दियो तहां मंत्र दियो सो उन न जप्यो जाते ज्ञानाग्नि उत्पन्न होइ अरु भ्रम
जरै औ धुवां जे हैं कल्मष ते निकसि जायें सो बाणीरूपी वह मांसु ज्ञानाग्निते
पकाइ नहीं गई अर्थात् वह मंत्रको अर्थ न जान्यो औ न अभ्यास कियो वह
अज्ञानरूपी धुवां गुँगुआतै रह्यो निर्धूम न भई ॥ ३ ॥
शिर औ सींग कछू नहिं वाके पूछ कहां वह पाई ।
सव पंडित मिलि धन्धे परिया कबिरं बनौरी गाई॥४॥
औ शिर जेहैं नित्य शब्द औ कार्यशब्द ते वाके नहीं हैं औ चारि जे सींग
हैं नाम धातु उपसर्ग निपात ते वाके नहीं हैं काहेते कि, वाको अनिर्वचनीय कहैहैं।
तौ पूंछ जोहै ब्रह्म ह्वैजैबो मोक्ष ताको कहां पावैगो अर्थात् जहांभर बचनमें आवैहै
सो सब मिथ्याहै जो कहो मोक्षउको रहि जाइबो न कह्यो तो रहि का गयो । तो
शब्द तो तात्पर्य करिकै वर्णन करैहैं कि, निर्गुण सगुणके परे परम पुरुष जो मैं
ताको सदाको अंश यह जीव है यह जो बिचार करै कि, मैं उनको हौ तौं
बद्धही नहीं है मुक्त काहेते होइ मुक्तही बनोहो बद्ध मुक्ततो कथन मात्रहै तामें
प्रमाण ॥ “अज्ञानसंज्ञौभवबंधमोक्षौ द्वौ नामनान्यौ स्त ऋतज्ञभावात्। अजस्रचि-
न्त्यात्मनि केवलेपरे विचार्य्यमाणे तरणाविवाहनी”इति भागवते॥ अरु तात्पर्ब्य
करिकै शब्द यह मोहींको वर्णन करैहै सो भागवतादिकनमें प्रसिद्ध सुनैहै तऊ
मूढ़ नहीं मानै है ॥ “शब्दब्रह्मपरब्रह्मममोभे शाश्वतीतन्नू” ॥ अपने अपने अर्थ
बनाइकै गाइ रहैहैं मोको नहीं जानै हैं सब पंडित धंधेमें परि रहे हैं नानामत
बनाइ रहेहैं तिनकी बनौरीको कबीर जे हैं जीव उनके सब शिष्य ते गावै हैं
अर्थात् अपने अपने आचार्यन के मंतमें आरूढ़ ह्वैकै जो और कोई कहैहै तौ
लड़ै हैं अरु पारिख करिकै सब वेदनको तात्पर्य जो मैं हौं ताको नहीं जानै हैं
शब्द ब्रह्म तात्पर्य करिकै परम पुरुष पर जो मैं हौं ताहीको वर्णन करे हैं॥४॥
इति अठासीवां शब्द समाप्त ।
( ३८२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ नवासीवां शब्द ॥ ८९ ॥
सुभागे केहि कारण लोभ लागे रतन जन्म खोये ।
पूरव जन्म भूमिके कारण बीज काहेको बोये ॥ १ ॥
पानीसे जिन पिंडै साजे अगिनिहि कुंड रहाया ।
दशै मास माताके गर्भ कढ़ि बहुरि लागिली माया ॥ २॥
बालकसे पुनि वृद्ध हुआहै होनी रही सो होये ।
जब यम ऐहैं बांधि लैजैहैं नयन भरी भरि रोये ॥ ३ ॥
जीवनकै जिन आशा राख्यो काल गहे है श्वासा ।
बाजीहै संसार कबीरा चित चेति ढारो पासा ॥ ४ ॥
हे सुभागे ! जीव तैंतो मेरौ है यह संसारमें जो तैं लोभकियो सो कौने
कारण कियो काहेते कि आपने दुःख पाइबे को कोई उपाइ नहीं करैहै जैसे
मनादिक करिकै संसारमें परिगयो तैसे जो मेरो स्मरणकरत तो मैं हंसस्व-
रूपदेत्यों तामें स्थितह्वैकै मेरे धामको पहुँचते । सो तैं रत्न जोहै यह मानु-
षजन्म ताको खोइदारचो पूर्वजन्मकी भूमिकाके कारण कहे पूर्वजन्ममें जैसे
कर्म करिराखे हैं तैसे सुख दुःख यह जन्म पावै है अरु जो यह जन्म करै है
सो वह जन्ममें दुःख सुख पावैगो सो आंखिन तो देखि लिये कोई सुखदुःखके
कारण रूप बीज तैं काहेको बोये और सब पदनको अर्थ स्पष्टई है ॥ १।४ ॥
इति नवासीवां शब्द समाप्त ।
अथ नब्बे शब्द ॥ ९० ॥
गुरुमुख ।
संत महन्तौ सुमिरौ सोई । जो छलफांदसों बाचा होई १
दत्तात्रेय मर्म नहिं जाना मिथ्यास्वाद भुलाना ।
गोरख मथिकै घृतको काढ्यो ताहि समाधि समान ॥२॥
शब्द । ( ३८३ )
गोरख पवन रखै नहिं जाना योगयुक्ति अनुमाना ।
ऋद्धि सिद्धि संयम बहुतेरा पारब्रह्म नहिं जाना ॥ ३ ॥
वशिष्ठ शिष्ट विद्या संपूरण राम ऐसे शिष शाखा ।
जाहि रामको करता कहिये तिनहुंक काल न राखा ॥४॥
हिन्दूकहै हमें लै जरवै तुरुककहै मोर पीर ।
दूंनों आय दीनमों झगरैं देखैं हंसकबीर ॥ ५ ॥
आगेके पदमें कहि आये काल श्वासा गहे है सो चेति पांसा ढारो कहैं
बिचारि बिचारि कामकरो सोई बिचार बतावै है ।
संत महंतौ सुमिरौ सोई । जो कालफांससों बाचा होई॥१॥
साहब कहै हैं कि, हे संतमहंतौ ! ताको सुमिरन करो जो कालफांसतें
बचो होइ ॥ १ ॥
दत्तात्रेय मर्म नहिं जाना मिथ्या स्वाद भुलाना ।
सलिला मथिकै घृतको काढ़यो ताहि समाधि समाना॥२॥
जो कहो दत्तात्रेय अपनें कों ब्रह्म मानिकै ब्रह्मही ह्वैगये तेतो वाके मर्मकों
कहै ज्ञानको जान्यो है सो प्रथम दत्तात्रेयऊ नहीं जान्यो काहेते कि वहतों
धोखा मिथ्या है सो तेऊ मिथ्यास्वादमें भुलाइ गये यह न बिचारचो कि,
जौन बिचार करत करत रहिजाय है सो मेरो स्वरूप परम पुरुष पर श्रीराम-
चन्द्रको दास है जब वे बिग्रह देइ हैं आपनो तब उनके पास जाइ है
सो यह तो न जान्यो पानी को मथिकै घृत कढ़्यो वही धोखा ब्रह्मकी समाधिमें
समाइ रह्यो सो कहुं पानिहूते घृत निकसै है उनके हाथ धोखई लग्यो ॥ २ ॥
गोरख पवन रखै नहिं जाना योगयुक्ति अनुमाना ।
ऋद्धि सिद्धि संयम बहुतेरा पारब्रह्म नहिं जाना ॥ ३ ॥