कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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गोरख ऐसो दत्त दिगम्बर नामदेव जयदेव दासा ।
उनकी खबरि कहत नहिं कोई कहां कियेहैं वासा ॥ ६ ॥
चौपर खेल होत घट भीतर जन्मके पांसा ढारा ।
दमदमकी कोइ खबरि न जानै करि न सकै निरवारा॥७॥
चारि दिशा महिमंड रचोहै रूम साम बिच दिल्ली ।
ता ऊपर कछु अजब तमाशा मारैहैं यम किल्ली ॥ ८ ॥
सब अवतार जासु महिमंडल अनत खड़ो कर जोरे ।
अद्भुत अगम अथाह रचोहै ई सबशोभा तोरे ॥ ९ ॥
सकल कबीरा बोलै बीरा अजहुं हो हुशियारा ।
कह कबीर गुरु सिकिली दर्पण हरदम करो पुकारा॥१०॥
कबिरा तेरो घर कँदलामें या जग रहत भुलाना ।
गुरुकी कही करत नहिं कोई अमहल महल देवाना ॥ १ ॥
कबीरजी कहैहैं कि हे कबिरा! कायाके बीर जीव तेरो घर तो कँदलामें है
कहे आनंदको कंद कहे सारांश जो है साहबको धाम तहां है तेरो घर या
जगवमें नहीं है तैं नाहक भुलान रहै है यहां गुरु कहे सबते श्रेष्ठ जे परमपुरुष
पर श्रीरामचन्द्र कहै हैं कि अबहूं जो मोको जानो तौ मैं कालते छोड़ाइ लेउँ
तिनको कह्यो कोई न मानिकै अरु आनंदको कंद उनको धाम छोड़िकै अमहल
महल कहे जो कछु वस्तु नहीं है ऐसो जो है धोखा ब्रह्म तामें अरु कोई
माया के प्रपंचमें देवाना है रह्यो है ॥ १ ॥
सकल ब्रह्ममें हंस कबीरा कागन चोंच पसारा ।
मन मत कर्म धरै सबदेही नाद विन्दु विस्तारा ॥ २ ॥
हे हंस! कबीर कायाके बीर जीवते साहबको ब्रह्मही कहै हैं तिनको कहिबों
कागन कैसी चोंचको पसारिबों है जैसे कागनके आगे जो दूध भात औ