कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३७४ ) बीजक कबीरदास ।
आमिष धरिदेउ तौ दूध भात न खायँ आमिषहीं खायँ तैसे साहब पुकारतई
जायहैं कि तुम मेरे पास आवो मैं तुमको हंसरूप देउँ ताको छोड़िके जीव
माया ब्रह्मके धोखामें लग्यो कागई होइहै नाना कर्मके बासनन ते शरीर
छूटतमें जहां २ मन को मत होइहै कहे जहां २ मन जाइहै तहां २ सब देह
धरै है नाद बिंदुके बिस्तारते सो नाद बिंदुको बिस्तार लिखि आये हैं ॥ २ ॥
सकल कबीरा बोलै बानी पानी मों घर छाया ।
लूट अनंत होत घट भीतर घटका मर्म न पाया ॥ ३ ॥
अरु ज्ञानी जे सब जीवहैं ते यह बाणी बोलै हैं कि यह शरीर पानी कों
घर छायाहै कहे पानीको बुल्ला है न जानो कब बिनशि जाय कहे छूटि जाय
सो मुखते तो यह कहै है अरु घट कहे शरीरके भीतर अनंत कहे बिना अंतको
मोहै साहब ताकी लूटि होइजाइहै ताको नहीं देखैहै यह आत्मा साह-
बको है तोको भुलाइकै औरे मतनमें लगाइ देइहै वाको मर्म नहीं पावैहै॥३॥
कामिनि रूपी सकल कबीरा मृगा चरिंदा होई ।
बड़ बड़ ज्ञानी मुनिवर थाके पकरि सकै नहिं कोई॥४॥
सब कबीर जीवनके शरीर कामिनि रूपीहै कहे मृगीरूपी है तामें जो चलै
सो चरिंदा कहावैहै सो चरिंदा कहे चलनवारो जोहै मन सो मृगाहै जब यह
जीवात्माको यमदूत एकपुतरा देखावै हैं तब वह पुतरामैं मनोमय जो लिंग
शरीरहै सो जात रहै है अरु वही के साथ जीव प्रवेश करिजाइहै तब यमराज
नाना कर्म भोग करावै हैं जौने शरीरमें मन लोभ्यो मरतमें वाको स्मरण भयों
सोई शरीर कर्म भोग करिकै धारण कियो सो मारितौ यह भांतितो जायहै वह
मंत्रको औ आत्मा के स्वरूपको कोई न पकरिपायो अर्थात् कोई न जान्यो ॥४॥
ब्रह्मा वरुण कुबेर पुरंदर घीपा प्रहलद चाखा ।
हिरणाकुश नख उदर बिदारा तिनहुँक काल न राखा५
गोरख ऐसो दत्त दिगम्बर नामदेव जयदेव दासा ।
उनकी खबार कहत नहिं कोई कहां किये हैं वासा ॥६॥