कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६८ ) बीजक कबीरदास ।
जाहि मासुको पाक कहतहैं ताकी उतपति सुनु भाई ।
रज वी रजसों मासु उपानी मासु नपाक जो तुम खाई ॥३॥
अपनो दोष कहत नहिं अहमक कहत हमारे बड़ैन किया ।
उसकी खून तुम्हारी गर्दन जिन तुमको उपदेश दिया॥४॥
स्याही गई सफेदी आई दिल सफेद अजहूं न हुआ ।
रोजा निमाज बांग क्या कीजै हुजरै भीतर बैठ मुआ॥५॥
पंडित वेद पुराण पढ़ै औ मोलनापढ़ै सो कुराना ।
कह कबीर वे नरकगये जिन हरदम रामहिं ना जाना॥६॥
१-५ तक के पदको अर्थ स्पष्टई है अंतके छठे तुकको अर्थ करैहैं। सब समें-
टिकै जे हरमद कहे हर साइत श्वास श्वाशमें रामको नहीं जानते हैं ते नादान
कहे बेवकूफ भूले अथवा हरदम कहे हरएकके दम कहे प्राणमें अंतर्यामी रूपतें
ब्यापक परम पुरुष पर श्रीरामचन्द्र को जे बेवकूफ नहीं जानते हैं ते मोलना
पंडित भूलिगये जो वे आपने हुजरामें बैठिकै रोजा निमाज किया औ कुरान
किताब पढ़ा औ जो पंडित अपने घरकी कोठरीमें एकांत बैठिकै बहुत वेद
शास्त्र को पढ़ा तौ का किया आखिर नरकही में गये [अत्र पूर्ण देखें] कि काहूकों
न सुन्यो कि बिना रामको जाने मुक्त ह्वैगये ॥ ६ ॥
इत तिरासीवां शब्द समाप्त ।
अथ चौरासीवां शब्द ॥ ८४ ॥
काजी तुम कौन किताब बखाना ।
झंखत बकत रह्यो निशि बासर मति एकौ नहिं जाना॥१॥
शक्ति न माने सुनति करतहौ मैं न बदौंगा भाई ।
जो खोदाय तुव सुनति करतहै आपुहिं काटि किन आई॥२॥