कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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अथ पचासीवां शब्द ॥ ८५ ॥
भूला लोग कहै घर मेरा ।
जा वर वामें फूला डोलै सो घर नाहीं तेरा ॥ १ ॥
हाथी घोडा बैल वाहनो संग्रह कियो घनेरा ।
वस्तीमें से दियो खदेरी जंगल कियो बसेरा ॥ २ ॥
गांठी बांधी खरच न पठयो बहुरि कियो नहिं फेरा ।
बीबी बाहर हरम महलमें बीच मियांको डेरा ॥ ३ ॥
नौ मन सूत अरुझि नहिं सुरझै जन्म २ अरुझेरा ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ यहि पद करो निबेरा ॥४॥
भूला लोग कहै घर मेरा ।
जा घरवा में फूला डोलै सो घर नाहीं तेरा ॥१॥
साहबको पार्षदरूप जो है हंसस्वरूप आपनो सांच शरीर ताको भूले लोग
कहैहैं कि यह मिथ्या जो स्थूलशरीर सो हमारौहै सो जा घर स्थूल शरीरमें तैं
फूलाडोलै है मेरो शरीरहै सो तेरा घर कहे शरीर नहीं है ॥ १ ॥
हाथी घोडा बैल वाहनो संग्रह कियो घनेरा ।
वस्ती मेंसे दियो खदेरी जंगल कियो बसेरा ॥ २ ॥
गांठी बांधी खरच न पठयो बहुरि कियो नहिं फेरा ।
बीबी बाहर हरम महल में बीच मियां को डेरा ॥ ३ ॥
बहुत हाथी घोड़े बैल इत्यादिक बाहनको संग्रह कियो परंतु जब तैं शरीर
रूपी बस्तीते खदेरि जाइगो कहे शरीर छूटि जाइगो तब जंगलमें कहीं पीपर के
तर भूत हैकै बसेर कहे बास करैगो अरु वह शरीरहूको बाहर खदेरिलै श्मशा-
नमें जारि देइँगे तब वह हाथी घोड़े औरहीके है जाइँगे ॥ २ ॥ गांठी बांधि-
धरचो अरु खर्च न पठयो कहे पुण्य न कियो जो वह लोकमें मिलिकै बहुरिकै