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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 415

शब्द । ( ३६७ )
नाड़ीहैं तिनकों सुषुम्णारूपी राहु ग्रास देइहै अर्थात् ग्रसन करावै है वही सुषु-
म्णामें लीन कै देइहै। जब समाधि लगी तब सुरभी जोहै गायत्री माया कुंडलि-
नी शक्ति सो वेदमूख बाणी भक्षण कैलियो अर्थात् बाणीरहित ह्वैगयो। औ तन
छीनै है कहे दूबर ह्वै जाइहै सो घन बरसै है कहै सुधा बरसै है याते बनो रहै
है। पुहुमी का पानी जब अंबरमें भरन लगैहै कहे नीचे को वीर्य ब्रह्मांडमें चढ़ा-
वन लगैहै तब शिशे की सराई बनाइकै लिंगद्वार में डारै है पानी खेंचैहै जब
राह साफ़ ह्वै जाइहै तब पवनके साथ वीर्य चढ़ैहै तब पवन वीर्यके साथ जीवात्मा
चढ़ि जाइहै त्रिकुटी में त्रिबेणीको स्नान करिकै दशौ अनहद सुनन लाग्यो तामें
मंदिर कहे मृदंगौ हैं सो बाजै हैं औ घटते कहे बङ्कनालकी राहते जब जीवात्मा
जाइहै तब अम्बर जो है गैबगुफाको आकाश सो भीजै है अर्थात् उहां वीर्य
पहुंचि जाइहै सो यह आश्चर्य का कीजै ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनौ हो संतो योगिन सिद्धि पियारी ।
सदा रहे सुख संयम अपने वसुधा आदि कुंवारी ॥ ५ ॥
सो कबीरजी कहै हैं कि हे संतौ ! यहि तरहकी जो सिद्धिहै सो योगिनकों
पियारिहै सो प्रथमतौ सिद्धिही नहीं होइहै जो घुनाक्षर न्याय ते सदा सुख
संयम में रहै औ सिद्धि भई समाधि लगी ताते फेरि वैसेही योगी भये अथवा
पुहुमीपति भये योग करिकै हम यह शरीरके मालिक ह्वैगये मनादिक हमारे
बश ह्वैगये परंतु जब यह शरीर छूटि जाइहै और शरीर होइहै तब वह-सुधि
सब भूलि जाइहै अरु जब पुहुमीपति भयो आपनेको राजा मानि लियो सो जब
मरिगयो तब पुहुमी आनही की ह्वै जाइहै पृथ्बी कुमारिही रहि जाइहै ॥ ५ ॥
इति बयासीवां शब्द समाप्त ।
अथ तिरासीवां शब्द ॥ ८३ ॥
भूला वे अहमक नादाना । तुम हरदम रामहिं ना जाना १
बरबस आनिकै गाय पछारा गला काटि जिउ आप लिया ।
जीता जिव मुरदा करि डारै तिसको कहत हलाल किया २