कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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सुनाति कराय तुरुक जो होना औरत की का कहिये ।
अर्द्धशरीरी नारि वखानै ताते हिंदू रहिये ॥ ३ ॥
घालि जनेऊ ब्राह्मण होना मेहरीको क्या पहिराया ।
वो तौ जन्म कि शूद्रिनि परुसा सो तुम पांडे क्यों खाया ॥४॥
हिंदू तुरुक कहांते आया किन यह राह चलाई ।
दिलमें खोज खोजु दिलहीमें भिश्त कहां किन पाई ॥५॥
कहै कबीर सुनोहो संतो जोर करतुहौ भारी ।
कविरन ओट रामकी पकरी अंत चला पचिहारी ॥ ६ ॥
काजी तुम कौन किताब बखाना ।
झंखत बकत रहौ निशिवासर मति एकौ नहिं जाना॥ १ ॥
हे काजी ! तुम कौन किताबको बखानत रहौहौ। निशिबासर वही किताबकों
बकत रहौहौ अरु बाहीमें झंखत कहे शंका करत रहौहौ सो कुरान किताब
तात्पर्यते जो एक साहबको बर्णन करै है ताको जो तुम्हारी मति न जानत
भई तौ तुम कुरान किताबकी एकऊ बस्तु न जानत भये ॥ १ ॥
शक्ति न माने सुनति करतहौ मैं न बदौँगा भाई ।
जो खोदाय तुव सुनति करति तौ आपु काटि किन आई२॥
घालि जनेऊ ब्राह्मण होना मेहरी को क्या पहिराया ।
वोतो जन्म की शूद्रिनि परुसा सो तुम पांडे क्यों खाया ३॥
सुनति किये जो मानतेहौ कि,हम मुसलमान हैं औ या नहीं मानते हौ कि,
शक्ति जो माया सोई करैहै सो हे भाई ! मैं न बदौँगा जो खोदाय तेरी सुनति
करतो तौ पेटही ते कटी आउती ॥ २ ॥ सो हे पंडित ! आपनी आत्माकों
साहबकी शक्ति न मान्यो। अरु ब्रह्मसाहबको न जान्यो जनेऊ पाहिरिकै तुमतों
ब्राह्मणभये औ अपनी मेहरीको कहा पहिरायौहै जाते वह ब्राह्मणी भई सों
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