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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 414

( ३६६ ) बीजक कबीरदास ।
बाजै है अर्थात् पराबाणी उहैं तें निकसै है . सोई पश्यंती तें मध्यमा आइ वैख-
रीमें प्रकट होइ है । षटचक्रको बेधिकै कुण्डलिनी शक्ति नागिनी जायहै ताके
साथ त्रिगुण ते युक्त जो एक सगुणजीव है सो जायहै सो वाकी विधि आगे
लिखि आये हैं । सो वृषभ तो वहां नहीं चलै है औ कोल्हू जो कुंडलिनीशक्ति
सो मांजै कहे देह मांजिकै उठै है सो पांच हजार कुंभक कियो तब श्वासनते
तपित होइहै अथवा खेचरीतें सुधाबिंदु वाके ऊपर पर्यो ताकी शीतलता पाइकै
उठै है सो ब्रह्मांड में जाइकै अर्थात् जेतने रोज समाधि लगायो तेतने दिन रही
ताके साथ जीवहू गयो।सो कहै हैं किं,ब्रह्मांड जोरजोगुणहै ताको योगाग्निमें होमि
दियो सो रजोगुण जरयो तौ तमोगुण जरै है । अरु भक्ष जो जीवहै सो नाभीके
जलमें रह्यो तहांतें चलिकै गगन जो ब्रह्मांडहै तहां गाजै है कहै यह कहै है कि
महीं मालिक हौं ॥ १ ॥ २ ॥
नितै अमावस नितै ग्रहण होय राहु ग्रास नित दीजै ।
सुरभी भक्षण करै बेद मुख घनबरसै तन छीजै ॥ ३ ॥
पुहुमिक पानी अंबर भरिया यह अचरज को कीजै ।
त्रिकुटी कुंडल मधि मंदिर बाजै औघट अंबर भीजै ४
खेचरी की दृष्टि तीनहै तामें एक पूर्णिमाहै कहे सर्वत्र पूर्ण देखै है । औ
ऊर्ध्वदृष्टि प्रतिपदा है । औ अंतरदृष्टि अमावस है । सो जब अंतर खेचरी चढ़ी
औ काऊपूतरी आकाशमें वेधी कहे ऊर्ध्वदृष्टि प्रतिपदा में बेधी तब अंधकार अविद्या
ग्रहण ह्रैकै चैतन्यको छाइ लियो । अर्थात् प्रथम अंधकार देखोपर्यो और कछु न
देखि पर्यो । पुनि बिजुली ऐसी चमकी तब तारागण वीर्य है ताकी गति मालूम
भई।तब प्रथम सूर्य मण्डल पुनि चंद्र मण्डल देखोपर्यो ।सो वही ज्योतिमें लीन
रहैहैं समाधि लगी रहैहै जब समाधि उतरी तब जीवको अमावस भई तममें पर्यो
आइ । तब सूर्य प्रकाश देखत रह्यो ताको मायारूपी राहु ग्रसि लियो अथवा जब
नागिनिको सुधा पिआवैहै तब बहुत दिनकी समाधि लगैहै।अब जौन पुरुष रोज
समाधि लगावैहै औ उतरै है सो कहैहैं जब समाधि चढ़ाय लैगयो तब याको
अमावस ह्रैगयो पुनि तममें पर्यो औ नित्य ग्रहण होइहै वे चंद्रमा औ सूर्य दुइ