कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३७२ ) बीजक कबीरदास ।
फेरा न कियो कहैं यह शरीरमें नहीं पावैहै सो बीबी जो है साहबकी दई
सुरति सो बाहरहै कहे संसार मुख है रही है औ हरम कहे लौंडी जो है माया
सो महलमें है कहै सब शरीरन में है ताके बीचमें मियां जो है जीव ताको डेराहै
ताकों वह माया घेरे है ॥ ३ ॥
· नौमन सूत अरुझि नहिं सुरझै जन्म जन्म अरु झेरा ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ यहि पद करो निवेरा ॥४ ॥
सों नौमन कहे नित्यही नवीन जो मनहै अर्थात् मनके दिये नाना शरीर
होयहैं सो नाना कर्म नाना मत जे सूतहै तिनमें अरुझिकै सुरझै नहीं है सो
कबीरजी कहैहैं कि हे संतो! यह पद को निबेरा करो कहे पाँचौं शरीरमें अरुझो
जो है मन ताते भिन्नहोउ तौ तुम शरीरनते भिन्न ह्वैजाउ ॥ ४ ॥
इति पचासीवां शब्द समाप्त ।
अथ छियासीवां शब्द ॥ ८६ ॥
कबिरा तेरो घर कँदलामें या जग रहत भुलाना ।
गुरुकी कही करत नहिं कोई अमहल महल देवाना ॥ १॥
सकल ब्रह्ममें हंस कबीरा कागन चोंच पसारा ।
मन मत कर्म धरै सब देही नाद बिंदु विस्तारा ॥ २ ॥
सकल कबीरा बोलै बानी पानीमों घर छाया ।
लूट अनंत होत घट भीतर घटका मर्म न पाया ॥ ३ ॥
कामिनि रूपी सकल कबीरा मृगा चरिंदा होई ।
बड़ बड़ ज्ञानी मुनिवर थाके पकरि सकै नहिं कोई॥ ४ ॥
ब्रह्मा वरुण कुबेर पुरंदर पीपा प्रहलद चाखा ।
हिरणाकुश नख उदर विदारा तिनहुंक काल न राखा॥५॥