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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( २९२ ) बीजक कबीरदास ।
बूझहु पंडित करहु विचारी पुरुष अहै की नारी ॥ १ ॥
ब्राह्मण केरे ब्राह्मणी होती योगीके वर चेली ।
कलिमा पढ़ि पढ़ि भई तुरकिनी कलि में रहै अकेली ॥२॥
सो हे पंडित! तुम बूझौ औ विचारिकै काम करौ यहमाया पुरुषरूपहै कि
नारीरूपहै? यहमाया सबको लपेटि लियो है ॥ १ ॥ विद्या माया ब्राह्मणके तौ
ब्राह्मणी ह्वैकै बैठी है । ब्राह्मणकहैं हैं कि, हम ब्रह्मको जानै हैं ॥ "ब्रह्मजा-
नाति ब्राह्मणः" ॥ अरु घरमें ब्राह्मणी बैठायेरहै हैं, वाको स्त्रीको भाव करै हैं
बेटीसों बेटीको भाव, बहिनीसों भगिनीको भाव मानै हैं । सो कहो तो ब्रह्मभाव
कबभयो जो कहो जिनके स्त्री नहीं है तिनको तो ब्रह्मभाव ठीकहै तौ उनके
ब्रह्म जानपनीरूप ब्राह्मणीकी गरुरी बनी है । संयोगिनके तौ चेली ह्वै बैठी है
औ योगिनके योगिरूप ह्वै बैठी है। योगी महामुद्रा साधन करिकै वीर्यकी उलटी
गति कैदेइहैं । सो जब वृद्ध भये तब षोडशी कन्या एक घरमें रातिभरि राखिकै
संभोग करिकै उनको वीर्य लिंग द्वारते खैंचिकै कपारमें चढ़ाइ लेइहैं, तब आप
तरुणह्वै जाइहैं वह षोडशीकन्या मरिजाईहै। एतो बड़ो अनर्थकरै हैं। जे प्राणायाम
करिकै प्राणचढ़ाइ लै जाइहैं तिनके कुंडलिनी ह्वै बैठी हैं। औ मुसलमाननके जब
विवाह होइहै तब निगाह सों निकाह कै कलिमापढिकै तुरकिनी होइहै औ
मुसलमान होइहै । सो ये उपलक्षणहैं अर्थात् ब्राह्मणमें स्त्रीके साथ कर्मरूप
ह्वैकै औ योगिनके दशमुद्रा रूपह्वैकै औ मुसलमाननमें निकाह कलमा आदिकै
शरा अरूप ह्वैकै अकेली मायाही रहतभई साहबके काम ये एको नहीं हैं॥२॥
बर नहिं वरै ब्याह नहिं करई पुत्र जन्म होनि हारी ।
कारे मूड़े यक नहिं छाँड़े अवहूँ आदि कुवारी ॥ ३ ॥
वर कहे श्रेष्ठ जे हैं साहबके जाननवारे भक्त तिनको नहीं वरयो अर्थात्
उनको स्पर्श विद्या अविद्या ये दोनोंको नहीं है । अरु खसम ब्रह्म है सो व्याह
नहीं करैहै काहेते कि, धोखाकी भँवरी नहीं परै । औ मायाको पुत्र जगत् है
जाको गर्भ धारण करैरहै सो कारे कहे जिन के शिखाहै " हिंदू लोग " औ

शब्द । ( २९३ )
मूँड़े कहे जिनके शिखा नहीं है मुसलमान लोग तिनको एकऊ नहीं छोड़्यो ।
अबहूं भर वह आदिकहे आद्या जो मायाहै सो कुँवारीही बनी है अर्थात् हिंदू
मुसलमानको आपही बशकै लियो है इनके बश नहीं भई ॥ ३ ॥
मायिक न रहे जाइ न ससुरे सांई संग न सोवै ।
कह कबीर वे युगयुग जीवैं जाति पांति कुल खोवैं॥४
अरु मायिक जो है शुद्ध आत्मा जाके उत्पत्ति भईहै माया तहां तो रहतही
नहीं है वहां तौ जीवके साहबको अज्ञान रूप कारण मात्र रह्योहै । औ सासुर
जो है लोक प्रकाश ब्रह्म जहां जीव मान्यो है कि, ब्रह्म मैंही हों, सो धोखाहै ।
तहां नहीं जाइहै औ वही सांई कहे पतिहै काहेते कि, वही मायासबलित होइ
है तब जगत् होइ है ताके संग नहीं सोवैहै काहेते कि, वहतो धोखई है औ
वह माया धोखा है जो कछु वस्तु होइ तब न वाके संग सोवै । श्रीकबीरजी
कहैं कि, सब जगतको माया लपेटि लियो है । जे जीव साहब औ साहबकी
जाति आपको मानै हैं औ अपनी जाति पांति कुल खोवैं हैं सोई मायाते बचे हैं
औ युग युग जियै हैं और तो सबको माया खाइही लियो है अर्थात् उनहीं को
जनन मरण नहीं होयहै ॥ ४ ॥
इति चवालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ पैंतालीसवां शब्द ॥ ४५ ॥
कौन मुवा कहु पंडित जना।सो समुझाय कहौ मोहिंसना १॥
मूये ब्रह्मा विष्णु महेशा । पावती सुत मुये गणेशा ॥ २ ॥
मूये चन्द्र मुये रवि केता।मुये हनुमत जिन्ह बांधी सेता३॥
मूये कृष्ण मुये करतारा। यक न मुवा जो सिरजन हारा॥४॥
कहै कबीर मुवा नहिं सोई । जाको आवा गमन न होई॥५॥

( २९४ ) बीजक कबीरदास ।
जिनको जिनको यापदमें वर्णन करिआये तेते सब महाप्रलयमें लीन होइहैं ।
एक कहे सम अधिकते रहित जो साहव नहीं मुवा । औ सिरजनहार जों
समष्टि जीव सो नहीं मुवाहै अर्थात् सो रहिजायहै । और कौन नहीं मुवा
तिनको कबीरजी बतावैं हैं । जीवतो मरै नहीं है शरीरहीमरैहै सो जे जे देवतं-
नको मुवा कहिआये ते जौन रूपते साहबके समीप रहै हैं सो स्वरूपइनको नहीं
मुवै है पार्षद शरीरते बनै रहै ह यहां अपने अंशन्ते जगत् कार्यकरै है सो
पूर्व लिखिआये हैं ॥ ५ ॥
इति पैंतालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ छियालीसवां शब्द ॥ ४६ ॥
पंडित अचरज यक बड़ होई ।
यक मर मुये अन्न नहिं खाई यक मर सीझ रसोई ॥ १ ॥
करिकै स्नान तिलक करि बैठे नौ गुण कांध जनेऊ ।
हांडी हाड़ हाड थारी मुख अव षट कर्म बनेऊ ॥ २ ॥
धरम कथै जहँ जीव बधै तहँ अकरम करे मेरे भाई ।
जो तोहरे को ब्राह्मण कहिये तौ केहि कहिये कसाई ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो भरम भूलि दुनियाई ।
अपरम पार पार पुरुषोत्तम यह गति विरलै पाई ॥ ४ ॥
अब जे षट्कर्मी पंडित लोग बलिदान करिकै मांस खाइ हैं तिनको कहै हैं ॥
पंडित अचरज यक बड़ होई ।
यक मर मुये अन्न नहिं खाई यक मर सीझ रसोई ॥ १ ॥
करिकै स्नान तिलक करि बैठे नौ गुण कांध जनेऊ ।
हांड़ी हाड़ हाड़ थारी मुख अव षट कर्म बनेऊ ॥ २ ॥
हे पंडित ! एक बड़ो आश्चर्य होइ है । एक मरै है ताके मरेते कोई
अन्न नहीं खायहै अरु वाके छुयेते अशुद्ध ह्वै जाइहै, अरु एक जीवको मारि

शब्द । ( २९५ )
लै आवै हैं तौने मुर्दाको रसोईमें सिझवै हैं ॥ १ ॥ औ नौ गुणको जनेऊ
कांधे में डारिकै स्नान करिकै बड़ो बेदना ऐसो तिलक दै कै बैठै हैं । सो कबीरजी
कूटकरै हैं कि, अब षट्कर्म बनि परचो कि, हांडीमें हाड़ है थारीमें हाड़है
मुखमें हाड़ है । व षट् कर्म ब्राह्मणके ये हैं । पढ़े पढ़ावै दान देइ लेइ यज्ञ
करै यज्ञ करावै । इहां ये षट्कर्म करै हैं एक हँड़िया दूजे हाड़ तीजे थारी
चौथे हाड़ पांचौ मुख छठों हाड़ अब ये अब षट्कर्म बनि परचो ॥ २ ॥
धरम कथै जहँ जीव बधै तहँ अकरम कर मेरे भाई ।
जो तोहरेको ब्राह्मण कहिये तौ केहि कहिय कसाई ॥ ३ ॥
कह कबीर सुनो हो संतो भरम भूलि दुनिआई ।
अपरम पार पार पुरुषोत्तम यह गति विरलै पाई ॥ ४ ॥
जहां धर्मको कथैहै कि, या यज्ञहै, देवपूजन पितर श्राद्धहै याधर्म है तहँ
जीवनको मारै है । सो हे भाइउ ! जो करिबेलायक कर्म नहीं है सोऊ करैहैं
ऐसे जे तुम्हारे कर्म हैं तिनको, तो ब्राह्मण कहेंगे ब्रह्मके जनैया कहेंगे तो
कसाई काको कहेंगे ॥ ३ ॥ श्रीकबीरजी कहै हैं कि, ऐसे भ्रममें दुनियाँ भूलि
रही है । अपरमकहे परम नहीं ऐसी जो माया है ताते परब्रह्म है ताहूते पार
पुरुष समष्टि जीव हैं जाके अनुभवते ब्रह्म भयो है ताहूते उत्तम श्रीरामचन्द्र हैं
काहेते कि, वे विभु सर्वज्ञ हैं औ जीव अणु अल्पज्ञहै । ते श्रीरामचन्द्रकी जो
यहगति है ज्ञान सो कोई बिरलै पाई है अर्थात् कोई बिरला जान्यौ है कि,
सबते पर साहबई है । उनते सम औ अधिक कोई नहीं है । तामेंप्रमाण ॥
“सकारणकारणकारणाधिपोनचास्यकश्चिज्जनितानचाधिपः । नतस्य कार्यंकर-
णंचविद्यतेनतत्समश्चाभ्यधिकश्चदृश्यते ॥ इतिश्वेताश्वतरोपनिषदि ॥ समोन-
विद्यतेतस्यविशिष्टः कुतएवतु ॥ इति वाल्मीकीये । ” औकबीरौजीकोप्रमाण ॥
“साहब कहिये एकको दूजा कहो न जाइ । दूजा साहब जो कहैं, बाद
बिडंबन आइ ॥ जनन मरणते रहितहै, मेरा साहब सोय । मैं बलिहारी पीउकी,
जिन सिरजा सब कोय ॥ ४ ॥
इति छियालीसवां शब्द समाप्त ।

( २९६ ) बीजक कबीरदास ।
अथ सैंतालीसवां शब्द ॥ ४७ ॥
पंडित बूझि पियो तुम पानी ।
जा माटीके घरमें बैठे तामें सृष्टि समानी ॥ १ ॥
छपन कोटि यादव जहँ विनशे मुनि जन सहस अठासी ।
परग परग पैगम्बर गाड़े ते संरि माटी मासी ॥ २ ॥
मत्स्य कच्छ घरियार वियाने रुधिर नीर जल भरिया ।
नदिया नीर नरक वहि आवै पशु मानुष सब सरिया॥३॥
हाड़ झरी झरि गूद गली गलि दूध कहांते आवै ।
सो तुम पाँड़े जेंवन बैठे मटिअहि छूति लगावै ॥ ४ ॥
वेद किताव छोड़ि दिहु पांड़े ई सब मनके कर्मा ।
कहै कबीर सुनोहो पांड़े ई सब तुम्हरे धर्मा ॥ ५ ॥
जे दंभ करिकै बड़ो आचार करैहैं जिनको चिद्अचिद् साहब को रूप है
यहबुद्धि नहीं है ताको कहै हैं ।
पण्डित बूझि पियो तुम पानी ।
जा माटीके घरमें बैठे तामें सृष्टि समानी ॥ १ ॥
छपन कोटि यादव जहँ विनशे मुनि जन सहस अठासी।
परग परग पैगम्बर गाड़े ते सरिमाटी मासी ॥ २ ॥
सो हे पंडित! ज्ञानतो तिहारे है नहीं आचारकरौ हो सो तुम कहांको पानी
पियौ हौ। भला बूझिकै कहे बिचारिकै तौ पानी पियौ। जौने माटीके घरमें अर्थात्
पृथ्वीमें तुम बैठेहौ तौनमें सब सृष्टि समाइरहीहै ॥ १ ॥ औ जौनी पृथ्वीमें
छप्पन कोटि यादव औ अठासी हजार मुनि ये उपलक्षण हैं अर्थात सबजीवन-
के शरीर वही माटी में मिलि मिलिकै सारिगये अरु परग परगमें पैगम्बर गाड़ेहैं

शब्द । ( २९७ )
ते सब सरिकै माटी ह्वै रहेहैं तेहिते माटी मासी है कहे मांसमें मिलिरही है औ
माटी मासी कहे मधुकैटभके मांसकी आई ॥ २ ॥
मत्स्य कच्छ घरियार बियाने रुधिर नीर जल भरिया ।
नदिया नीर नरक वहि आवै पशु मानुष सब सरिया ॥३॥
हाड झरी झरि गूद गली गलि दूध कहांतै आवै ।
सो तुम पांडे जेवन बैठे मंटिअहि छूति लगावै ॥ ४ ॥
अरु नदियाके जलमें मत्स्य कच्छ घरियार बियाने कहे होयहैं औ रुधिर
नीर मल इत्यादिक वही नदियाके जलमें मिलिजाइ है औ पशु मानुष सँरिजा-
यहैं; ते वही पानी पियोहौ औ आचार करोहो ॥ ३ ॥ दूधो हाड़ते झरि झरि
गूदते गलिगलिकै लोहू भयो वही लोहूते दूध भयो ताहीको लैकै हे पंडित! तुम
जेवन बैठौहौ औ माटी जो मांसहै ताको छूति लगावो हौ कि,मांसबड़ो अपवित्र
है याको जे खाइहैं ते बड़ो निषिद्धकर्म करै हैं सो कहो तो वह दूध मांसते
कैसे भिन्नहै ॥ ४ ॥
वेद किताब छोडि दिहु पांडे ई सब मनके कर्मा ।
कहैं कबीर सुनोहो पांडे ई सब तुम्हरे धर्मा ॥ ५ ॥
सो हे पांडे! शुद्ध अशुद्ध तो वेद किताबते जानेजाइहैं ते वेद किताबकों तुम
छोड़िदियो ये जे सब कहिआये जे तुम धर्म करौहौ ते तौ सब तुम्हारे मनके
कर्म हैं आपने मनहींते ये सब तुम बनाइ लियोहै इनते तुम न निबहौगे। श्रीकबी-
रजी काकु करैहैं कि हेपांडे! बिचारिकै देखौ ये सब तुम्हारे धर्म हैं? अर्थात् नहींहै
तुम तौ साहबकेहौ । अथवा कबीरजी कहै हैं एते सब कर्म करौहौ अपने मनके
बनाये औ वेद किताबौके कहेते ये सब तुम्हारे धर्मकहे तुम्हार शरीरमा हैं ।
तेहिते शरीरते भिन्न ह्वैकै आपने स्वरूपको जानौगे तब आपने सांचे कर्मनको
जानौगे यह व्यंग्यहै ॥ ५ ॥
इति सैंतालीसवां शब्द समाप्त ।
१ कहीं कहीं मट्टी मांसको भी कहैहैं परन्तु यहां तो मिट्टीसे आशय है मनुष्य
शरीरते क्योंकि, दम्भ करिके आपजी चहे कर्म करतेहै लोरे दूसरे पवित्र मनुष्यनते
छूत मानतैहै ।

( २९८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ अड़तालीसवां शब्द ॥४८॥
पंडित देखो हृदय विचारी । कौन पुरुष को नारी ॥ १ ॥
सहज समाना घट घट बोलै वाको चरित अनूपा ।
वाको नाम कहा कहि लीजै ना वहि वरण न रूपा ॥२॥
तैं मैं काह करै नर बौरे क्या तेरा क्या मेरा ।
राम खोदाय शक्ति शिव एकै कहु धौं काहि निवेरा ॥३॥
वेद पुराण कुरान कितेवा नाना भांति बखानी ।
हिंदू तुरुक जैनि औ योगी एकल काहु न जानी ॥ ४ ॥
छः दरशनमें जो परवाना तासु नाम मन माना ।
कह कबीर हमहीं हैं बौरे ई सब खलक सयाना ॥ ५ ॥
पंडित देखो हृदय विचारी । कौन पुरुष को नारी १
सहज समाना घट घट बोलै वाको चरित अनूपा ।
वाको नाम कहा कहि लीजै ना वह वरणनरूपा २॥
हे पंडित! तुमतौ सारासारको विचार करौ हौ हृदयमें विचारि कै देखौ तो
कौन पुरुषहै कौन नारीहै वह आत्मा तो न पुरुष न नारी है ॥ १ ॥ जो कहौ
घटघटमें सहज जीव ब्रह्म समाइ रह्योहै वाको चरित्र अनूपहै सोई हमारो
स्वरूप है तो वाको नाम कहां कहि लीजै बाको तो न बर्ण है न रूपहै वह
तो धोखाहै ॥ २ ॥
तैं मैं काह करै नर बौरे क्या तेरा क्या मेरा ।
राम खोदाय शक्ति शिव एकै कहु धौं काहि निबेरा ३
औ जो तैं मैं कहौहौ कि, तैं मैं आहो, मैं तैं आहो एकही ब्रह्मतौ है तैं
मैं कहा करैहै । बिचारिदेखु तौ क्या तेराहै क्या मेराहै सब साहबका तौ

जो तैं साहब होइ तब तेरा होइ। रामखोदाय औ शक्ति शिव जैहैं तिनमें कहुयौं तैं
काको निबेरा कियो है कि, एक यह जगतको मालिक है। औ वही मैं हौं। अर्थात्
इनकी सामर्थ्य तोमें एकऊ नहीं देखिपरेहै ताते इनमें तैं कोई नहीं है ॥ ३ ॥
वेद पुराण कुरान कितेवा नाना भांति बखानी ।
हिंदू तुरक जैनी औ योगी एकल काहु न जानी ॥४॥
वही साहबको नाना नाम लैके कहैहैं सो वेद पुरान कुरान किताबमें वही
साहबको सबने परे नाना भांतिते नाना नामलैके बर्णन कियो है यही हेतुते
हिन्दू तुरक जैनी योगी एकल कहे एक नामकरिकै कोई नहीं जान्यो कि,
एक यही सिद्धांतहै यही सबको मालिकहै । अथवा एकल कहे जौने करते जोने
उपायते मैं मन वचनके परे साहबको जान्यो है सो कोई नहीं जान्यो ॥ ४ ॥
छः दरशनमें जे परवाना तासु नाम मन माना ।
कह कबीर हमहीं हैं बौरे ई सब खलक सयाना ॥ ५ ॥
छहउ दर्शनमें अरु जेते सब हिन्दू तुरुक आदि वर्णन करि आये तिन सबमें
जौन धोखा ब्रह्म को प्रमाण परैहै तौनेही को नाम सबके मनमें मानै है। कह-
ते तौ मन वचनके परे हैं परंतु कोई ब्रह्म कहिकै कोई अल्लाह कहिकै कोई
जीवात्मा कहिकै वाहीको सब मानै हैं। सो कबीरजी कहैहैं कि, सब खलक
सयाना है काहेते कि, कहते तो यह बात हैं कि, वहतो मन वचनमें आवते
नहीं है औ जे मन वचनमें आवै हैं तिन्हीं में फिरि लागे है ताते हमहीं बौरहाहैं
जो ऐसो कहैहैं कि, साहब आपही ते कृपा करिकै अनिर्वचनीय रामनाम स्फुरि-
त करि देइहैं ताहीके मिलनको उपाय बतावै हैं यह काकु करै हैं ॥ ५ ॥
इति अड़तालीसवां शब्द समाप्त ।
अथ उनचासवां शब्द ॥ ४९ ॥
बुझ बुझ पण्डित पद निर्वांना । सांझ परे कहँवां बस भाना १
नीच ऊँच पर्वत ठेला न भीत । बिन गायन तहँवा उठ गीत २

( ३०० ) बीजक कबीरदास ।
ओस न प्यास मंदिर नहीं जहँवां। सह स्रो धेनु दुहावै तहँवां ३
नितै अमावस नित संक्रांति। नित नित नवग्रह बैठे पांति ४
मैं तोहिं पूँछौं पण्डित जना। हृदया ग्रहण लागु केहि खना ५
कह कबीर यतनौ नहीं जान। कौन शब्द गुरु लागा कान६
अब योगिनको कहैं ।
बुझ बुझ पंडित पद निरवाना। सांझ परे कहँवां बस भाना १
नीच ऊँच पर्वत ठेला न भीत। बिन गायन तहँवां उठ गीत२
हे पंडित ! तुम वह निर्वाणपदको बूझोतो जो त्रिकुटीमें ध्यान लगाइकै भानु
कहे सूर्य देखोहौं । सो सूर्य सांझपरे कहे जब शरीर छूटिगयो तबकहां बसैहै?
॥ १ ॥ नीचते ऊंचेको कहे कुंडलिनीते गैबगुफामें जब आत्मा जाइहै तौनै
पर्बतमें न ठेलाहै न भीतिहै। औ बिना गायन तहंवां गीत उठैहै कहे अनहदकी
ध्वनि सुनिपरै है ॥ २ ॥
ओस न प्यास मंदिर नहीं जहँवां। सहस्रो धेनु दुहावै तहँवां ३
ओस जो वहां परे है कहे अमृत जो वहां झरे है ताको पान करिकैन प्यास
है जाइहै कहे पियास नहीं लगैहै । अर्थात् ओसन पियास नहीं जाइहै जो मानि-
राखेहैं कि, अमृत पीकै हम अमर ह्वैजाइँगे सो अमर न होउगे । औ जो गैब
गुफा पर्वतमें घरमानि राखैहैं सो वहाँतेरो मंदिर कहै घर नहीं है अर्थात् वहां
तो शून्यहै तहां सहस्र दलमें धेनु दुहावै है कहे धेनु जोहै गायत्री ताको अर्थ
जोहै वहदूध ज्ञान स्वरूप ब्रह्म ताको बिचार करैहै आपने को ब्रह्म मानै हैं जब
शरीर सरिजाइ तब गैबगुफा जरिजाइहै औ फिरि शरीर धारणकरै है ॥ ३ ॥
नितै अमावस नित संक्रांति। नित नित नव ग्रह बैठे पांति ४॥
औ तहां नित अमावस रहैहै चन्द्रमा सूर्यनके ओट ह्वैजाइ सो अमावस कहा-
वै है । सो यहांते आत्मा जाइकै ब्रह्मज्योतिमें लीन ह्वैजाइहै ताते नित
अमावस रहै है औ फिरि जब समाधि उतरी तब शंकामें परिगयो वही वाकों

शब्द । ( ३०१ )
नित संक्रांति है। औ नित नव ग्रह पांति जो है दुवार जामें ऐसो जो है यह
शरीर तौने की पांति बैठे है कहे इतना योग साधै है तऊ शरीर धारण करिबों
नहीं छूटै हैं ॥ ४ ॥
मैं तोहिं पूछौं पंडित जना। हृदया ग्रहण लागु क्यहि खना ५
कह कबीर इतनौ नहिं जाना।कौन शब्द गुरु लागा कान ६॥
: हे पंडित ! तुमसों हम पूछैं हैं कि, जब समाधि उतरि आवै है तब फिरि
माया तुमको ग्रहण करिलेइ है औ निर्वाण पद कहतहीहौ । सो निर्वाण पद
जो जाते तौ कैसे उलटि आवते औ कैसे नाना शरीर पावते सो देखतेहौ बूझते
नहींहौ,यह अज्ञानरूपी राहुते तुम्हारे ज्ञानरूपी चन्द्रमाको कब ग्रहणकियो॥५॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, इतनौ नहीं जानतेहौ कि शरीरके साधन यह ज्ञान
कियेते शरीर मिलैगो कि छूटैगो अर्थात् शरीरके साधन कियेते शरीरही मिलैगो
तेरे कानमें लागिकै गुरुवालोग कौनसो शब्दको उपदेशकियो है जाते परमपुरुष
श्रीरामचन्द्रको भूलि गेय ॥ ६ ॥
इति उनचासवां शब्द समाप्त ।
अथ पचासवां शब्द ॥ ५० ॥
बुझबुझ पंडितविरवा न होई।अधवस पुरुष अधा बस जोई १
बिरवा एक सकल संसारा।स्वर्ग शीश जर गयल पताला२
बारह पखुरी चौबिस पाता। घन बरोह लागी चहुँ घाता३
फलै न फुलै वाकिहै बानी। रैनिदिवस बिकार चुव पानी॥४॥
कहकबीरकछुअछलोनजहिया।हरिबिरवाप्रतिपालततहिया ५
बुझबुझपंडितविरवानहोई । अधवसपुरुषअधावसजोई॥ १॥
बिरवा एक सकल संसारा।स्वर्ग शीश जर गयलपताला २

( ३०२ ) बीजक कबीरदास ।
हे पंडित ! यह संसाररूपी वृक्षको जो तैं बूझि राखै है कहे मानि राखै है
सो तैं बूझतौ जितने बिचार होइहैं तिनको यह मिथ्याही है । हरिकेचिद्अचिद्
रूपसे सत्यहै। यह संसार वृक्ष आधा पुरुष है आधा प्रकृति है अर्थात् चित् पुरुष
जीव औ अचित् मायादिक इनहीते संपूर्ण जगत्है ॥ १ ॥ पुनि कैसोहै संसार-
रूपी बिरवा याको स्वर्गशीश कहे ब्रह्मांडको जो खपरा है सो शीश है अरु
याकी जर पातालमें गई है ॥ २ ॥
वारह पखुरी चौबिस पाता।घन बरोह लागी चहुँ घाता ॥३॥
फलै न फुलै वाकि है वानी।रैनि दिवस विकार चुव पानी॥४॥
औ बारह महीना जे हैं ते बारे पंखुरी हैं अर्थात् काल औ चौबिस तत्त्व
वाके चौबिस पातहैं औ घन कहे नाना कर्मनकी वासना तेई घन बरोह चारों
ओर लगीहैं ॥ ३ ॥ या संसाररूपी वृक्ष साहबको ज्ञान रूप फल नहीं फूलै
औ साहबको भक्तिरूप फल नहीं लगै है या संसारके बाहर भयेते होयहै औ
राति दिन बिकाररूप पानी चुवै है ॥ ४ ॥
कहकबीरकछुअछलोनजहिया।हरिविरवाप्रतिपालततहिया ५
सो कबीरजी कहै हैं कि, जहां हरि परम पुरुष श्रीरामचन्द्र जाके अंतःकर-
णमें भागवत धर्म रूपी बिरवनकी बाग प्रतिपालै हैं तिनको यह संसाररूपी
बिरवा अच्छो नहीं है । व्यंग यह है कि,माली जो होइहै सो कांटा वाला पेड़
निष्काम अलग कै देइहै इहां हरि संसार रूपी बिरवा अलग कै देइ है भागवत
धर्मरूप बिरवा श्रीकबीरजी रेखता में कह्यो ॥ “धर्मकी बाग फुलवारि फूली
रही शील संतोष बहुतक सोहाई । भक्तिका फूल कोड संत माथे धरे ज्ञान मत
भेद सतगुरु लखाई ॥ विवेक बिचार सोइ बाग देखन चले प्रेम फल पाइ तोरै
चखाई । पराहै स्वाद जब और भावै नहीं तजैगा माणकी बहवाई ॥ ५ ॥
इति पचासवां शब्द समाप्त ।

शब्द । ( ३०३ )
अथ इक्यावनवां शब्द ॥ ५१ ॥
बुझवुझपण्डितमनचितलाय।कवहिंभरलवैहैकवहिंसुखाय १
खन उवै खन डुबैखन अवगाहा।रतन नमिलै पावनहिं थाह२
नदिया नाहिं सरस वहै नीर । मच्छ न मरै केवट रहै तीर ३
कह कबीर यह मनका धोका।बैठा रहै चला चह चोखा४
बुझबुझपंडितमनीचितलाय।कबहिंभरलवैहैकवहिंसुखाय १
हे पंडित ! सारासारके बिचार करनवाले ते तो विवेकी कहावै हैं चित्त
लगाइकै यह मनको बूझि, तौ कबहूं भरलकहे कबहूं तो तैं आपनेको मानिले-
इहै कि, मैंही ब्रह्महौं आनंदते भरिजायहै औ कबहूं वहज्ञान बहिजायहै तब
सुखाइ जाइहै अर्थात् वह आनंद नहीं रहिजाइहै ॥ १ ॥
खन उवै खन डुबै खन अवगाह।रतननमिलैपाव नहिंथाह२
नदिया नाहि सरस वहै नीर । मच्छ न मरै केवट रहै तीर ३
तब क्षणमें संसारते मन ऊबिउठै है कहे बैराग्य ह्वैआवै है औ क्षणमें वही
मनरूपी नदी हिलै है बूडिजाय है अर्थात् संसारके विषयमें बूडिजाय है।
औ क्षणमें अवगाहैहै कहे नानामतमें बिचार करै है कि, संसार छूटिजाय सो
मनरूपी नदीकी थाह नहीं पावै है तेहिते रत्न जो है स्वस्वरूप सो नहीं मिलै है
विचारही करत रहिजायहै॥२॥सो मनरूपी नदियाहै नहीं जो तैं विचारकरै तू तो
मनके बाहर है परंतु सरस नीर सङ्कल्पबनै है। अब मच्छको मारनवालो केवट
ज्ञान तीर में बनै है परंतु काम क्रोधादिक मच्छ तेरे मारे नहीं मरैं हैं॥ ३ ॥
कह कबीर यह मनको धोखा। बैठा रहै चला चह चोखा ४
सो कबीरजी कहैहैं कि, नाना मतमें परिकै संसार छूटिबेको नहीं उपाय करौ
हौ औ चोखे कहे नीके चला चाहौहौ परंतु हौ बैठे कहे साहबके मिलिबेको उपाय
ये एकउ, नहीं हैं काहेते कि, पश्चिमको ग्राम नगीचऊ होइ औ तहांजाइबो चाहै औ
जसजस पूर्वको मेहनत करिकै मंजिलकरै तौ, तस तस दूरिही परतु जाइहै यह संसार
मनको धोखा मिथ्याहै सो मनते भिन्न हैकै साहबमें लगै तबहीं साहब मिलैंगे ४
इति इक्यावनवां शब्द समाप्त ।

( ३०४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ बावनवां शब्द ॥ ५२ ॥
बूझि लीजै ब्रह्मज्ञानी ।
घोरि घोरि वर्षा वर्षावै परिया बुंद न पानी ॥ १ ॥
चींटीके पग हस्ती बांधे छेरी बीगे खायो ।
उदधि माहिते निकसि छांछरी चौड़े गेह करायो ॥ २ ॥
मेढ़क सर्प रहै इक संगै बिल्ली श्वान विवाही ।
नित उठि सिंह सियारसों जूझे अद्भुत कथ्यो न जाही ॥ ३ ॥
संशय मिरगा तन वन घेरे पारथ वाना मेलै ।
सायर जरै सकल वन डाहै मच्छ अहेरा खेलै ॥ ४ ॥
कह कबीर यह अद्भुत ज्ञाना को यहि ज्ञानहिं बूझै ।
बिनु पंखै उड़िजाहि अकाशै जीवहि मरण न सूझै ॥ ५ ॥
बूझि लीजै ब्रह्मज्ञानी ।
घोरि घोरि वर्षा वर्षावै परिया बुंद न पानी ॥ १ ॥
हे ब्रह्मज्ञानी ! आप बूझिये तौ घोरिघोरि कहे नये नये ग्रन्थन को बनाइकै
कहे माया ब्रह्मजीव एकैमें मिलाइडारचो कि, एक ही ब्रह्म है । वही वाणी
शिष्यनके श्रवण में वर्षा ऐसो वर्षावोहै परन्तु तुम्हारे बानीरूप पानी को बुंदहू
न उनके पर्यो अर्थात् तनकऊं ज्ञान न भयो वे ब्रह्म कबहूं न भयो सो तुम्हारो
यह हवाल हैरह्यो है ॥ १ ॥
चींटीके पग हस्ती बांधे छेरी बीगै खायो ।
उदधि माहिंते निकसि छांछरी चौड़े गेह करायो ॥ २ ॥
चींटी कहिये बुद्धिको काहेते कि, सूक्ष्म होइ है कुशाग्रवर्त्ती शास्त्रमें कहै हैं ताके
पाइमें मतङ्गरूप जोमनहै ताको बांधिदियो मनबड़ा है। औ दुर्वारमतहै याते हाथीकहो

शब्द । ( ३०६ )
तब छेरी जो है माया सो बीगा जो है जीव ताको खाइ लियो जीवको बीगा काहेतें
कह्यो कि, जो जीव अपने स्वरूप को जाने तौ छेरी जो है माया ताको नाशकै देइ
सो छेरी मायही बीगा जीवको आपने पेटमें डारिलियो । अरु छेरी मायाको
कहै हैं तामें प्रमाण ॥ “अजामेकांलोहितशुक्लकृष्णां” इत्यादि । सो लोक
मकाश जो उदधि तहांतें निकरिकै चौड़ी छांछरी जो संसार तामें मच्छरूप
जीव घर मायाते बनवायो अर्थात् संसारी है गयो ॥ २ ॥
मेढुक सर्प रहै इक संगै बिल्ली श्वान बियाही ।
नित उठि सिंह सियारसों जूझै अदभुत कथो न जाही ३॥
वह कैसो संसारहै जहां मेढुक ( जीव ) औ सर्प ( काल ) एकैसंगरहै हैं ।
नाना शरीरंनको काल खात जाइहै पुनि पुनि शरीर होत जाइहै । अरु बिल्ली
जो है मानसी वृत्ति सो श्वान स्वानुभवानन्द ताको बिवाहीगई अर्थात् वाही
में लगिगई । वृत्तिकोबिल्ली काहेते कह्यो कि, बिल्ली जहां गोरस देखै है तहँ
जाइहै औ यह वृत्ति जो है सोऊ जहै रस जो है सुख सो देखैहै तहँ जाइहै ।
सो स्वानुभवानन्दमें बहुत सुख देख्यो याते वाहीको बिवाहीगई । तब नित-
उठिकै सिंह जो ज्ञान सो सियार अज्ञानते मारो जाइहै । जो कहो ज्ञान तो
अज्ञानको नाश करनवारो है अज्ञानते ज्ञान कैसे नाश होइहै ? सो वह जो
ब्रह्मज्ञान कियो कि, हम ब्रह्म हैं सो अद्भुत है कहिबेलायक नहीं है नेति कहैह
अर्थात् कोई जीव ब्रह्म नहीं भयो यह कौनेहू शास्त्र पुराणमें नहीं कह्यो कि,
फलानो जीव ब्रह्म है गयो याही ते मूलाज्ञानमें ठहराये हैं ॥ ३ ॥
संशय मिरगा तन बन घेरे पारथ बाना मेलै ।
सायर जरै सकल वन डाहै मच्छ अहेरा खेलै ॥ ४ ॥
येई दुइतुक अधिकसे जानेपरैहैं परन्तु पोथीमें लिखो लख्यो अर्थ करिदयो
सो शरीरबनको संशय जो मिरगा है सो घेरे है औ पारथ जे हैं गुरुवा लोग
ते संशयरूपी मृगाके मारिबेको बाण जो है नानाप्रकारको उपदेशरूप बाणी
ताको मेलैहैं सो उनको बाणीन ते संशय तो नहीं दूरि होइहै । संशय कहा
है सो कहै हैं सायर जो है बिबेकसागर सो जरिजाइ है औ नाना शरीर जे

( ३०६ ) बीजक कबीरदास ।
बन हैं ते लाय देइ हैं अर्थात् गुरुवनकी बाणी सुनि सुनिकै शिष्यलोग जब
और और जीवनको उपदेश कियो तब उनको सबको साहबको विवेकजरिजरि-
गयो औरैऔर में लगिगये विवेक करिकै साहबको ज्ञानजो हैबेको रहै सो न
भयो तब संसार समुद्रमें मच्छ जोहै काल सो अहेर खेलै है अर्थात् जीवनको
खाइ है ॥ ४ ॥
कह कबीर यह अद्भुत ज्ञाना को यहि ज्ञानहि बूझै ।
बिनु पंखे उड़ि जाहि अकाशै जीवहि मरण न सूझै ॥ ५॥
श्रीकबीरजी कहैं हैं कि, यह संसार अद्भुतहै औ ब्रह्म अद्भुत है इन दूनोंको
ज्ञान जिनको है कि, ये धोखा है ऐसो को है ? अर्थात् कोई नहींहै परन्तु जों-
कोई बिरला बूझनवारो होइ औ मन माया है दोनों धोखा हैं येई तहँ उड़ै
हैं नाना पदार्थनको स्मरण होइहै नाना योनि पावैहै संसारमें तिनको छोड़ि
एक परमपुरुष श्रीरामचन्द्रही को ह्वैरहै तौ ब्रह्म जो है आकाश ताते उड़ि
कहैं निकसिकै साहबके यहां पहुंचै जाइ जो कहो बिना पखना कैसे उड़ि-
जाय । सो यहां उपासना दुइप्रकारकी हैं एक बांदर कैसो बच्चा भजन करैहै
कि, बांदरको बच्चा अपनी माताको आपही धरे रहै है सो यहजीव नाना प्रका
रकै शास्त्रादिकनते विचार करिकै औ असांच मत खंडन करिकै आपही अपने
साहबको धरे रहै है भ्रम में नहीं परै है । औ दूसरी उपासना बिलारीके
बच्चाकीसीहै बिलारीको बच्चा और सबकी आशा तोरे माताकी आशा किये रहैहै
सों वह बिलारी अपने बच्चाको जहां सुपास देखै है तहां आपही उठाइ लैजाइहै।
तैसें यह जीव वेद शास्त्रको छोड़िकै न काहूके मतके खंडन करिबेकी सामर्थ्य है
न अपने मतके मंडन करिबेकी सामर्थ्यहै साहबको जानै है कि, मैं साहब का
हौं दूसरो मत सुनतही नहीं है सो जब सब पक्ष को छोड़िकै साहब कों
ह्वैरह्यो, तब याको साहबही हंसस्वरूप ह्वैकै अपने लोकको उठाइ लैजाइहै ॥५॥
इति बावनवां शब्द समाप्त ।

शब्द । ( ३०७ )
अथ तिरपन्वां शब्द ॥ ५३ ॥
गुरुमुख ।
वह विरवा चीन्है जो कोई। जरा मरण रहितै तन होई॥१॥
विरवा एक सकल संसारा। पेड़ एक फूटल तिनडारा ॥२॥
मध्यकेडार चारि फल लागा। शाखा पत्र गनतको बागा॥३॥
वेलि एक त्रिभुवन लपटानी। वांधेते छूटिहि नहिं प्रानी॥४॥
कह कबीर हम जात पुकारा। पण्डित होय सो करै विचारा ५
वह विरवा चीन्है जो कोई। जरा मरण रहितै तन होई॥१॥
जो बिरवाको आगे वर्णनकरै हैं ताको जो कोई चीन्है औ असार मानि
लेइ औ सार जो साहबहैं तिनको जानै सोपार्षद स्वरूप ह्वैजाइ औ जन्म मर-
णते रहित ह्वैजाइ ॥ १ ॥
बिरवा एक सकल संसारा । पेड़ एक फूटल तिन डारा ॥२॥
मध्यके डार चारि फल लागा। शाखा पत्र गनत को बागा॥३॥
सो एक बिरवा सब संसार है तौने बिरवाको पेड़ कहे मूल विराट् पुरुष है
तौनेमें ब्रह्मा विष्णु महेश तीनिडार फूट्यो है ॥ २ ॥ सो मध्यकी डार जे
विष्णुहैं तिनमें अर्थ धर्म काम मोक्ष येचारि फल लागत भये चारि फलके देवै-
या विष्णुह । सो जो कोई विष्णुका उपासक होइ सो चारों फलको पावै है ।
डारन जो डौरया कहै हैं ते शाखा कहावै हैं । सो ब्रह्मा विष्णु महेश जे तीनि
डौरै हैं तिनते नाना देव नाना मत भये। तेई शाखा हैं। तिनको को गनत बा-
गहै अर्थात् उनको अन्त कोई नहीं पायो औ सतोगुणी रजोगुणी तमोगुणी जे
नाना वासना होतभई तेई पत्र हैं ॥ ३ ॥
वेलि एक त्रिभुवन लपटानी। बाँधे ते छूटिहि नहिं प्रानी॥४॥
कह कबीर हम जात पुकारा। पंडित होय सो करै विचारा ५॥

( ३०८ ) बीजक कबीरदास ।

  • वृक्षमें बेलि लपटै है सो यह संसाररूपी वृक्षमें आशारूपी बेलि लपटि गई
    है तामें बँधिकै प्राणी छूटै नहीं है ॥ ४ ॥ साहब कहै हैं कि. हे कबीर !
    कहै जीव तोको संसार जातमें हम पुकारा है रामनामको जो पंडित होइ है
    बिचार करिलेइ अर्थात् असार जो रामनाममें जगत् मुख अर्थ ताको छोड़ि
    राममें सार जो मैं ताको जानिकै रामनाम जपिकै मेरे पास आवै ॥ ५ ॥
    इति तिरपनवां शब्द समाप्त ।
    अथ चौवनवां शब्द ॥ ५४ ॥
    सोईके सँग सासूर आई ।
    संग न सूती स्वाद न मानी गयो यौवन सपनेकी नाई ॥ १ ॥
    जना चारि मिलि लगन शोचाई जना पांचमिलि मंडपछाई।
    सखी सहेली मंगल गावै दुख सुख माथे हरदि चढ़ाई ॥ २ ॥
    नाना रूप परी मन भांवरि गांठि जोरि भई पति आई ।
    अरघे दैदै चली सुवासिनि चौकहि रांड़ भई सँग साईं ॥३॥
    भयो बिवाह चली बिन दूलह वाट जान समधी समुझाई।
    कह कबीर हम गौने जैवै तब कंतलै तूर बजाई ॥ ४ ॥
    यह जीव परमपुरुष श्रीरामचन्द्रकी शक्ति है सो जौनी भांतिते याको आपने
    स्वरूपको ज्ञान रह्यो है औ फिरि भयो है सो लिखै हैं ॥
    सांईके सँग सासूर आई ।
    सङ्ग न सूती स्वाद न मानी गयो यौवन सपने की नाई १
    परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके लोकको प्रकाश जो ब्रह्म है ताको सांई मानिकै
    ताही सङ्ग सासूर जो यह संसार है तहां आई । सासूर संसार काहेते ठहरयों
    कि, अहंब्रह्मबुद्धि संसारहीमें होइहै । जब संसारकेबाहिरे रहै है तबतो याको
    सुधिही नहीं रहैहै । जब महाप्रलय है जाइहै तब सत् जो है साहबके लोकको

शब्द । ( ३०९ )
प्रकाश ब्रह्म नाहीमें सब रहे हैं । जब उत्पत्तिको समय भयो सुरति पायो तब
आपनेको लोकप्रकाश ब्रह्म मान्यो तब मनभयो । मनते इच्छाभई । तब यह
ब्रह्मकहै हैं कि, मैं जीवात्मामें प्रवेश करिकै नामरूप करि हौं। सो जीवात्मामें प्रवेश
करिकै नाम रूप जीवात्माके करतभयो याहीते याको साँई मानिकै चित् शक्ति जीव
सासूर जो संसार तहां आवत भयो । सो वह ब्रह्मको खसम मानि लेबो धोखा-
है काहेते कि, वह तौ निराकारहै सो वाके संग न सोवत भई, न स्वाद पावत भई
नानारूप धरत भई तेई यौवन है जे सपने की नाई जातभये सो जौनी भांति
चितशक्ति जीव सांईके संग ससुरेमें आई सो लिखेहै अपनेको ब्रह्म मान्यो तब
संसार की उत्पत्ति भई तामें प्रमाण कबीरजीके शब्दमंगलको ॥ ( सो उत्पत्ति
बीजहै, शून्य प्रलय कर ठाउं । तन छूटे कह जाइहौ, अकह बजायो गाउँ ॥ १॥)
जना चार मिलि लगनशोचाई जना पांच मिलि मंडप छाई।
सखी सहेली मंगल गावैं। दुख सुख माथे हरदि चढ़ाई॥२॥
जना चार कहे मन बुद्धि चित्त अहंकार ये जे अंतःकरण चतुष्टय हैं तेई
मिलिकै लग्न शोचावतभे अर्थात् जीवको शरीरकी लग्न लगावतभे । औ जनापांचैं
कहें पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश येपांचौं तत्त्व मिलिकै मंडप छावत भये अर्थात्
शरीर बनावत भये । औ सखी सहेली जे हैं पांच कर्मेन्द्रिय ते मंगल गावैंहैं गाइबो
कहाहै कि, रूप रस गंध स्पर्श शब्द ये विषयको लेन लगे । और नाना प्रकारकी
जे पुण्य पापकी वृत्तिहैं तेई कुवांरी कन्याहैं सो नानाप्रकारके पुण्य पाप कराइ-
कै दुःख सुख की हरदी जीवरूप दुलहिनिके माथे चढ़ावै हैं ॥ २ ॥
नाना रूप परी मन भांवरि गांठी जोरि भई पति आई ।
अरघै दैदै चली सुवासिनि चौकहि रांड़ भई संग सांई॥३॥
औ नानारूप कहे नाना भांति की जे वासनाहैं तिनहीकी याके मनमें भांवरि
परिगई है । औ चित् अचित्की गांठी परिगई ताहीते ब्रह्मको पति आई कहे पति
आइ गई है अर्थात् ब्रह्मको पति मानिलियो है कि, वह ब्रह्म मैंहीं हौं । हेतु यहहै

( ३१० ) बीजक कबीरदास ।
कि, जब विवाहद्वै जाइहै तब स्त्री अर्द्धांगी ह्वैजाइहै औ सुवासिनि वे कहावैहैं जे या
कुलकी कन्या अनत बिवाही रहैहैं सो जब संसारमें जीव ब्रह्म फांसमें फँसिगयो
तब सुवासिनि जे हैं साहबके जनैया तिनको ब्रह्मसों विवाह नहीं भयो ते अरघ
दैके कहे उपदेश करिकै वाको लैचले सो यद्यपि याको चौका बनोहीहै मड़ये
के तर बैठीही है अर्थात् यद्यपि संसारमें शरीर धारण किये है परंतु तहँ राँढ़
ह्वैगई ब्रह्मको पतिमानि राख्योहै । सो बिचारा मरिगयो अर्थात् वाको धोखा-
समुझि लियो यहां रांड़ हैबो कहिआये औ सांच सांईको संग बनैहै यह जों
कह्यो सो साहब सर्वत्र बनैहै वह अहंब्रह्मको बिचार मिटिगयो ॥ ३ ॥
भयो बिवाह चलीबिनु दूलह वाट जात समधी समुझाई ३
कह कबीर हम गौने जैबे तरब कंतलै तूर बजाई ॥ ४ ॥
सोइ सत रहते विवाह भयो कहे इस तरहते संसारी भयो । औ पुनि बिन
दूलह चलतभई कहे अहंब्रह्म बुद्धि न रहिगई मुक्ति हैकै चित्शक्ति जीव साह-
बके पास जाइबेकी गैल लियो सो वह बाट जातमें समधी जो है शुद्ध समष्टि
जवि सो याको समुझावत भयो कि, जैसे हम शुद्ध हैं तैसे तुमहूं शुद्ध हौ ।
अर्थात् जब जीव साहबके लोक प्रकाशको बेधिकै साहबके लोकको चल्यो तब
यह समुझत भयो किं, जैसे ये शुद्ध रहे हैं तैसे हमहूं शुद्ध रहेहैं, यह बीचहीमें
धोखा भयो है। उनको देखिकै यह ज्ञान भयो यही उनको समुझाइबो है । सो कबीर
जो है कायाको बीर जीव सो कहैहै कि, मन बचनके परे जो साहब के ऊपर
दूसरो साहब नहीं है जासों हमारो विवाह ह्वैबेको नहीं है । वह हमारो सदा
कौं कंत है । तहां हम गवनजाइहै अर्थात् तहांको हम गवन करेंगे । अरु वाही
कंतको लैके कहे पाइकै तरिजाब । औरे कंतको लैके न तरेंगे । औ तहँ परम
मुक्ति रूपी तूर बजावेंगे । अर्थात् और ईश्वरनमें लागे औ आपनेको ब्रह्म माने
मुक्तिरूपी तूर न बाजैगो अर्थात् संसार औ सब उपासना औ ब्रह्म ह्वैजाइबो
ये सब तुरिकै साहबके पास जाइकै अर्थात् डंकादैके जाइगो ॥ ४ ॥
इति चौवनवां शब्द समाप्त ।

शब्द । ( ३११ )
अथ पचपनवां शब्द ॥ ५५ ॥
नलको ढाढ़स देखो आई । कछु अकथ कथा है भाई ॥ १ ॥
सिंह शार्दुल यक हर जोतिनि सीकस बोइनि धाना ।
बनकी भलुइया चाखुर फेरै छागर भये किसाना ॥ २ ॥
कागा कपरा धोवन लागे बकुला किररै दांता ।
माछी मूड़ मुड़ावन लागी हमहूं जाव वराता ॥ ३ ॥
छेरी बाघहि ब्याह होतहै मंगल गावै गाई ।
बनके रोझ धै दाइज दीन्हो गोह लोकंदै जाई ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो जो यह पद अर्थावै ।
सोई पँडित सोई ज्ञाता सोई भक्त कहावै ॥ ५ ॥
जिनको सद्गुरु मिले तिनको या भांतिउद्धार है गयो औ जिनको सद्गुरु
नहीं मिले जे सद्गुरुको नहीं मान्यो तिनको गुरुवा लोग और और मतमें
लगाइदेइ हैं वे साहब को नहीं जाने हैं सो कबीरजी कहै हैं ॥
नलको ढाढ़स देखो आई । कछु अकथ कथा है भाई ॥ १ ॥
साहब कहते हैं कि, हे भाई! हेसंतौ! ढाढ़सदेखो यहजीव मेरो अंशहै सो
मोको नहीं जानै है और औरमें लागिकै खराब होइ है नाना दुःखसहै है मोकों
जानिकै दुःख नहीं त्यागकरै है बड़ो ढाढ़सी है । सो हे भाइउ ! ढाढ़स करिकै
जौनेके लिये जामें यह लगै है सो ब्रह्म अकथ कथा है कहिबे लायक नहीं है ।
वह ब्रह्म विचार झूठा है वहां कछु प्राप्ति नहीं है सो अकथ कथा कहै हैं ॥ १ ॥
सिंहशार्दुल यकहरजोतिनि सीकस बोइनि धाना ।
वनकी भलुइया चाखुरफेरै छागरभयेकिसाना ॥ २ ॥
यहां सिंह जो है जीव शार्दूल जो है मन येई दोऊ बैल हैं । कर्म जो हैं
सोई हर संसार सीकस भूमि है कहे ऊषर भूमि है । अजा कहावै है माया सोई