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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 766 में से

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पृष्ठ 352

( ३०२ ) बीजक कबीरदास ।
हे पंडित ! यह संसाररूपी वृक्षको जो तैं बूझि राखै है कहे मानि राखै है
सो तैं बूझतौ जितने बिचार होइहैं तिनको यह मिथ्याही है । हरिकेचिद्अचिद्
रूपसे सत्यहै। यह संसार वृक्ष आधा पुरुष है आधा प्रकृति है अर्थात् चित् पुरुष
जीव औ अचित् मायादिक इनहीते संपूर्ण जगत्है ॥ १ ॥ पुनि कैसोहै संसार-
रूपी बिरवा याको स्वर्गशीश कहे ब्रह्मांडको जो खपरा है सो शीश है अरु
याकी जर पातालमें गई है ॥ २ ॥
वारह पखुरी चौबिस पाता।घन बरोह लागी चहुँ घाता ॥३॥
फलै न फुलै वाकि है वानी।रैनि दिवस विकार चुव पानी॥४॥
औ बारह महीना जे हैं ते बारे पंखुरी हैं अर्थात् काल औ चौबिस तत्त्व
वाके चौबिस पातहैं औ घन कहे नाना कर्मनकी वासना तेई घन बरोह चारों
ओर लगीहैं ॥ ३ ॥ या संसाररूपी वृक्ष साहबको ज्ञान रूप फल नहीं फूलै
औ साहबको भक्तिरूप फल नहीं लगै है या संसारके बाहर भयेते होयहै औ
राति दिन बिकाररूप पानी चुवै है ॥ ४ ॥
कहकबीरकछुअछलोनजहिया।हरिविरवाप्रतिपालततहिया ५
सो कबीरजी कहै हैं कि, जहां हरि परम पुरुष श्रीरामचन्द्र जाके अंतःकर-
णमें भागवत धर्म रूपी बिरवनकी बाग प्रतिपालै हैं तिनको यह संसाररूपी
बिरवा अच्छो नहीं है । व्यंग यह है कि,माली जो होइहै सो कांटा वाला पेड़
निष्काम अलग कै देइहै इहां हरि संसार रूपी बिरवा अलग कै देइ है भागवत
धर्मरूप बिरवा श्रीकबीरजी रेखता में कह्यो ॥ “धर्मकी बाग फुलवारि फूली
रही शील संतोष बहुतक सोहाई । भक्तिका फूल कोड संत माथे धरे ज्ञान मत
भेद सतगुरु लखाई ॥ विवेक बिचार सोइ बाग देखन चले प्रेम फल पाइ तोरै
चखाई । पराहै स्वाद जब और भावै नहीं तजैगा माणकी बहवाई ॥ ५ ॥
इति पचासवां शब्द समाप्त ।